यह कोई 'अप्रैल फूल' का मजाक नहीं था. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने घोषणा कर दी कि एनडीए अभिनेता विजय के समर्थन से तमिलनाडु में सरकार बनाएगी. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि द्रमुक (DMK) समर्थक टीवी चैनल 'सन न्यूज' ने इस बयान को प्रमुखता से दिखाया, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि अभिनेता-राजनेता की पार्टी 'तमिलगा वेट्टरी कड़गम' (TVK) केवल परोक्ष रूप से एनडीए की मदद करने के लिए चुनावी मैदान में है.
डीएमके की 2026 के तमिलनाडु चुनाव जीतने की रणनीति यह है कि वह भाजपा को एनडीए की रसोई में पकाए जा रहे राजनीतिक सांभर का मास्टरशेफ बता दे. द्रमुक जे. जयललिता के दौर की अन्नाद्रमुक (AIADMK) और एडप्पादी पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक के बीच अंतर स्पष्ट कर रही है, और पलानीस्वामी पर "भाजपा की कठपुतली" होने का आरोप लगा रही है.
अपने दावे को पुख्ता करने के लिए, द्रमुक प्रमुख एम.के. स्टालिन और उनके बेटे व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने इस बात की ओर इशारा किया है कि कैसे पलानीस्वामी और गठबंधन के अन्य सभी नेताओं को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आवास पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ी. इसका उद्देश्य शाह के उस दावे को केवल कागजी या दिखावटी साबित करना है जिसमें उन्होंने अन्नाद्रमुक को तमिलनाडु में एनडीए का नेता बताया था, जबकि हकीकत में ऐसा लग रहा था जैसे भाजपा ही सारे फैसले ले रही है.
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DMK की बयानबाजी के पीछे क्या रणनीति
क्या द्रमुक (DMK) की यह बयानबाजी केवल चुनावी माहौल को गरमाने के लिए की जा रही बयानबाजी है या इसके पीछे कोई रणनीति काम कर रही है? दरअसल, यह 2026 के चुनाव को एक सोची-समझी घेराबंदी के तहत पेश करने की कोशिश है, जिसमें मुकाबला द्रमुक के नेतृत्व वाले 'तमिल गौरव' और एनडीए के नेतृत्व वाले 'दिल्ली के प्रभाव' के बीच दिखाया जा सके.
ईपीएस (EPS) को भगवा पार्टी के 'जागीरदार' के रूप में पेश करके, द्रमुक तमिलनाडु में व्याप्त हिंदी-विरोधी और हिंदुत्व-विरोधी भावनाओं का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है और जितनी बार भाजपा नेता यह जोर देते हैं कि 4 मई को तमिलनाडु में एनडीए की सरकार बनेगी, उतनी ही बार यह संदेह गहरा जाता है कि भाजपा ऐसी शासन व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए दबाव डालेगी.
तमिल भाषा में अपमान के लिए एक शब्द है 'अदिमई' (Adimai), जिसका अर्थ 'गुलाम' होता है. चूंकि द्रमुक का पूरा तंत्र लगातार स्टालिन को एक ऐसे मजबूत नेता के रूप में पेश करता है जो केंद्र से लोहा लेने का साहस रखता है, इसलिए ईपीएस को एक 'आज्ञाकारी' नेता के रूप में ब्रांड करने की कोशिश उनकी राजनीतिक कद-काठी को छोटा करने के लिए की जा रही है.
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इतना ही नहीं, द्रमुक (DMK) अब अन्नाद्रमुक (AIADMK) की 'द्रविड़ साख' को भी चुनौती दे रही है. पलानीस्वामी जैसे नेता के लिए, जो खुद को लगातार जयललिता के करीब दिखाते रहे हैं, ये कटाक्ष उन्हें बैकफुट पर धकेल रहे हैं. ईपीएस (EPS) ने भाजपा के साथ अपनी नई नजदीकी का बचाव करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के साथ करुणानिधि की तस्वीरें दिखाकर यह जताने की कोशिश की है कि द्रमुक भी कभी भाजपा की दोस्त थी. लेकिन यह तर्क काम नहीं आ रहा, क्योंकि वह भाजपा एक अलग ब्रांड की भाजपा थी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस चक्कर में ईपीएस के हाथ से द्रमुक के शासन के ट्रैक रिकॉर्ड पर आक्रामक होने का अवसर भी छिन रहा है.
हिंदुत्ववादी भाजपा द्वारा 'बैकसीट ड्राइविंग' का डर दिखाकर अन्नाद्रमुक पर हमला करना, दरअसल एक बड़ा अल्पसंख्यक वोट बैंक एकजुट करने की भी कोशिश है. द्रमुक इस बात को अच्छी तरह जानती है कि विजय ईसाई वोटों का एक बड़ा हिस्सा काट सकते हैं, जो अन्यथा द्रमुक के खाते में जाता. "कठपुतली" वाली यह ब्रांडिंग इन दोनों समुदायों को द्रमुक के साथ बने रहने के लिए मजबूर कर सकती है, भले ही उनमें से कुछ के पास 2021 के बाद से शासन की गुणवत्ता से असंतुष्ट होने के कारण हों. स्टालिन यही संदेश फैलाना चाहते हैं कि "अन्नाद्रमुक को वोट देने का मतलब है भाजपा को अंदर आने देना." विजय पर अठावले की टिप्पणी भी अंततः अल्पसंख्यक वोटों के एक बड़े हिस्से को पाने की टीवीके (TVK) की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएगी.
स्टालिन के एक तीर से कई निशाने
भाजपा के वर्चस्व का डर पैदा करने से डीएमके को हिंदी भाषा के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाने का मौका भी मिलता है. स्टालिन की उस भविष्यवाणी को ही ले लीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि तमिलनाडु का नाम बदलकर 'दक्षिण प्रदेश' किया जा सकता है. तमिलनाडु में तीन भाषा प्रणाली एक विवादास्पद मुद्दा है और डीएमके ने हिंदी को गुपचुप तरीके से थोपने के कथित प्रयासों पर कड़ा रुख अपनाया है. ऐसे में स्टालिन एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं. भाषाई गौरव एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है और तमिल आत्मसम्मान की भावना को हवा देकर वे एनडीए खेमे में फूट डाल सकते हैं और ईपीएस को अपना रुख स्पष्ट करने के लिए मजबूर कर सकते हैं, अन्यथा एआईएडीएमके भाजपा की कठपुतली के रूप में दिखाई देगी.
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सत्ता में पांच साल रहने के बाद, निश्चित रूप से सत्ता-विरोधी लहर अपना काम कर रही है. भाजपा को चर्चा के केंद्र में लाकर, द्रमुक को केंद्र सरकार के कामकाज को भी एक चुनावी मुद्दा बनाने का अवसर मिल जाता है. इसके अलावा, ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए एनडीए को 'डबल इंजन सरकार' के रूप में पेश करना मुश्किल होगा. यह एक ऐसा नारा है जिसे वह अन्य सभी राज्यों में प्रमुखता से उछालती रही है.
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द्रविड़ साख बनाम दिल्ली का समझौता
इसके पीछे एक और गणित भी काम कर रहा है. विजय लगातार 2026 के चुनाव को 'द्रमुक बनाम टीवीके' (DMK vs TVK) के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. द्रमुक से जुड़े एक राजनीतिक सलाहकार ने मुझे बताया कि एनडीए का खराब प्रदर्शन उनकी क्लाइंट पार्टी (द्रमुक) के लिए बुरी खबर हो सकती है. चूंकि विजय का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है, इसलिए स्टालिन यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि चुनावी विमर्श में पलानीस्वामी भी बने रहें, ताकि द्रमुक-विरोधी वोट समान अनुपात में बंट जाएं और अंततः चुनावी गणित द्रमुक की जीत में मदद करे.
हाल के घटनाक्रमों को भी इसमें बखूबी इस्तेमाल किया गया है. साल 2023 में, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई द्वारा अन्नादुराई और जयललिता के खिलाफ की गई टिप्पणियों से नाराज होकर अन्नाद्रमुक एनडीए से बाहर हो गई थी. हालांकि भाजपा ने पलानीस्वामी को मनाने के लिए अन्नामलाई को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर उनकी 'बलि' दे दी, लेकिन समझौते के बाद से दोनों कई मौकों पर एक ही मंच पर देखे गए हैं. अन्नादुराई पर किए गए अपमानजनक कटाक्षों को नजरअंदाज करने की पलानीस्वामी की इस इच्छा का फायदा द्रमुक के डिजिटल अभियान द्वारा उठाया जा रहा है. आने वाले दिनों में, 23 अप्रैल की तैयारी के दौरान पलानीस्वामी के इस 'यू-टर्न' को और भी बड़ा हथियार बनाया जा सकता है.
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टी एस सुधीर