कांग्रेस-सपा और भाजपा... 2027 से पहले कैसे सबको याद आने लगे बसपा के कांशीराम

उत्तर प्रदेश में भले ही अगले साल विधानसभा चुनाव है, लेकिन उससे पहली ही सियासी समीकरण सेट किए जाने लगे हैं. बसपा संस्थापक कांशीराम की जंयती को इस बार सपा से लेकर कांग्रेस और बीजेपी तक ने मनाने का फैसला किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि सबको कांशीराम याद आने लगे हैं.

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राहुल गांधी और अखिलेश यादव को याद आए कांशीराम (Photo-ITG) राहुल गांधी और अखिलेश यादव को याद आए कांशीराम (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 2:08 PM IST

बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है, जिसे कांग्रेस ने परिवर्तन दिवस के रूप मानने जा रही है. कांग्रेस 15 मार्च को दिल्ली में कांशीराम को लेकर एक बड़ा कार्यक्रम कर रही है तो उससे पहले  13 मार्च को लखनऊ के इंदिर गांधी प्रतिष्ठान में प्रोग्राम रखा है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे और बहुजन संवाद करेंगे. 

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कांग्रेस ही नहीं समाजवादी पार्टी भी इस बार कांशीराम की जयंती को बहुत बड़े स्तर पर उत्तर प्रदेश भर में जिला स्तर पर मना रही है. अखिलेश यादव ने कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है. बीजेपी ने 15 दलित महापुरुषों की जयंती-पूण्यतिथि मनाने का कैलेंडर तैयार किया था, जिसमें बसपा संस्थापक कांशीराम का नाम भी शामिल है. 

कांशीराम की जयंती को बसपा हर साल की तरह इस बार भी मना रही है. बसपा ने 15 मार्च को यूपी के 12 मंडल के नेताओं और कार्यकर्ताओं को लखनऊ और 6 मंडल के लोगों को नोएडा स्थित दलित प्रेरणा स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है. बसपा का कांशीराम की जयंती मनाना समझ में आता है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस से लेकर सपा और बीजेपी तक को कांशीराम कैसे याद आने लगे?

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कांशीराम की जयंती पर कांग्रेस का बहुजन संवाद
कांशीराम ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज कांग्रेस के विरोध में शुरू किया और बसपा के उदभव के बाद से कांग्रेस सियासी हाशिए पर पहुंच गई. इसके बाद भी कांग्रेस ने पिछले साल से कांशीराम की जयंती मानना शुरू किया है, 2024 में दलित गौरव के तौर पर मनाया तो इस बार परिवर्तन दिवस के रूप में मनाने जा रही है. इस बार कांशीराम की जयंती के उपलक्ष्य में होने वाले कार्यक्रम में राहुल गांधी भी लखनऊ में शिरकत करेंगे. 15 मार्च को दिल्ली में भी कांग्रेस के मुख्यालय में कांशीराम की जंयती पर कार्यक्रम आयोजित किया जाए. 

कांग्रेस के यूपी संगठन मंत्री अनिल यादव ने बताया कि कांशीराम को किसी एक दल के नेता के रूप में नहीं देखना चाहिए. कांशीराम ने दलित-शोषित और पीड़ितों को राजनीतिक दशा और दिशा दिखाने का काम किया है. इसीलिए कांग्रेस ने 13 मार्च को लखनऊ में कांशीराम की जयंती पर एक कार्यक्रम रखा है, जिसमें राहुल गांधी बहुजन संवाद यानि दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के साथ बातचीत करेंगे. कांग्रेस ने कांशीराम के विचारों व संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है.कांग्रेस ही इकलौती पार्टी है जो कांशीराम की विचारधारा को आगे ले जा सकती है.

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कांशीराम की जयंती को सपा पीडीए दिवस मनाएगी
समाजवादी पार्टी ने 15 मार्च को बसपा संस्थापक कांशीराम की 91वीं जयंती को बड़े पैमाने पर मानने का प्लान बनाया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के नेताओं को निर्देश दिया है कि 15 मार्च को कांशीराम की जयंती को प्रदेश के सभी जिले में 'बहुजन दिवस' या पीडीए (पिछड़ा,दलित और अल्पसंख्यक) दिवस के रूप मनाए. सपा ने इसे यूपी के सभी जिलों और लखनऊ पार्टी दफ्तर में कांशीराम की जयंती मनाने के लिए प्रचार-प्रसार भी शुरू कर दिया है. 

अखिलेश यादव के दिशा-निर्देश को लेकर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल ने पार्टी के सभी जिला अध्यक्षों,सांसदों, विधायकों,पूर्व सांसदों और विधायकों और पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों को कांशीराम जयंती के संबंध में सूचित कर दिया है. उन्होंने साफ-साफ कहा है कि कांशीराम ने अपने पूरे जीवन को हमेंशा दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच एकता और भाईचारे के लिए समर्पित कर रखा था. ऐसे में उनके जयंती को बहुजन समाज दिवस या पीडीए दिवत कहा जाता है. 

बीजेपी के सियासी एजेंडे में भी कांशीराम शामिल
बीजेपी ने 15 दलित महापुरुषों का कैलेंडर तैयार कराया है. इनकी जयंती-पूण्यतिथि के कार्यक्रमों से इस समाज के लोगों से वर्षों भर मुलाकात का कार्यक्रम तैयार किया है. इनमें कांशीराम से लेकर संत रविदास तक शामिल हैं. योगी सरकार में मंत्री असीम अरुण के नेतृत्व में बीजेपी ने दलित महापुरुषों के दर्शन,विचार और योगदान पर फोकस करने का प्लान किया है. बीजेपी जिस तरह दलित समुदाय के बीच भावनात्मक कनेक्ट बढ़ाने की कवायद में है, उससे जाहिर है कि कांशीराम भी उनके सियासी एजेंडे के हिस्सा हैं. 

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कांशीरम की जयंती मनाने का बीजेपी का सीधे तौर पर कोई कार्यक्रम अभी सामने आया नहीं है, लेकिन जिस तरह प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने 15 जनवरी को जाटव समाज से आने वाले पूर्व राष्ट्रीय महासचिव दिवाकर सेठ के घर पहुंचकर खिचड़ी का प्रसाद चखा. प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह ने बीते वर्ष सभी जिलों में अनुसूचित मोर्चे के साथ मीटिंग कर जमीन मजबूत किया. ऐसे में कांशीराम की जयंती पर बीजेपी प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष रूप से कोई न कोई कार्यक्रम रखेगी. 

2027 से पहले सबको कांशीराम क्यों आ रहे याद? 
उत्तर प्रदेश में होने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पहले बसपा संस्थापक कांशीराम सपा से लेकर कांग्रेस और बीजेपी तक को याद आने लगे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कांशीराम ने यूपी सहित देशभर में दलित और अति पिछड़े समुदाय के बीच राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया है. बसपा का गठन किया और यूपी में सफल राजनीति का प्रयोग किया, जिसके मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की सीएम रहीं. 

बसपा चुनाव दर चुनाव कमजोर होती जा रही है, जिसके चलते सपा से लेकर कांग्रेस और बीजेपी तक की नजर मायावती के कोर वोटबैंक पर है. कांशीराम के बहाने सभी दलों की कोशिश दलित समाज के साथ भावनात्मक रिश्ता कायम रखने की है. सपा से लेकर कांग्रेस तक दलित समाज को यह संदेश देने की कोशिश में है कि वह कांशीराम का सम्मान और सियासी अहमियत देने में किसी तरह से पीछे नहीं है. 

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कांशीराम को सपा अपनाने की कोशिश 2022 के चुनाव के बाद से ही शुरू कर दिया था तो कांग्रेस 2024 के बाद से अपना फोकस किया है. यूपी में दलित समुदाय का 20 फीसदी से ज्यादा वोट है तो अतिपछड़े वर्ग 35 फीसदी हैं. कांशीराम ने दलित और अतिपिछड़े वर्ग को यूपी की सियासत में नया मुकाम दिया है. 

मायावती की लगातार चुनाव हारने के चलते सपा और कांग्रेस को लगता है कि दलित मतदाता अब किसी अन्य विकल्प की तलाश में हैं. इसीलिए सपा और कांग्रेस कांशीराम की जयंती  मनाकर खुद को उनके असली उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की है. अखिलेश यादव के पीडीए प्लान और राहुल गांधी के सामाजिक न्याय की काट के लिए बीजेपी सोशल इंजीनियरिंग पर नए सिरे से होमवर्क कर रही है और दलित वोटों को साधने के लिए कांशीराम से लेकर तमाम दलित महापुरुषों को अपने एजेंडे में शामिल किया. 

2027 की सियासी डगर कितनी मुश्किल? 
बीजेपी 2027 में सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है तो सपा अपनी सियासी वनवास को खत्म करने की कवायद में है. ऐसे में कांग्रेस अपने खोए हुए जनाधार को दोबारा से पाने की कोशिश में है. 2024 में सपा और कांग्रेस की सियासी केमिस्ट्री और पीडीए फॉर्मूले ने बीजेपी का सारा गेम बिगाड़ दिया था. सपा और कांग्रेस ने जिस दांव से 2024 की जंग में बीजेपी पर भारी पड़े थे, उसे 2027 के चुनाव में और भी मजबूत बनाने की कवायद में है, जिसके लिए कांशीराम के हितैशी के तौर पर खुद को पेश करने का प्लान बनाया है. 

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अखिलेश यादव 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत कांशीराम की विरासत को भुनाना चाहती है, ताकि 1990 के दशक की तरह दलित और ओबीसी (पिछड़ों) का एक मजबूत गठबंधन तैयार किया जा सके. कांशीराम ने दलितों को वोट की ताकत समझाई थी, इसलिए सभी पार्टियां उनकी विरासत को अपनाकर यह दिखाना चाहती हैं कि वे शोषितों और हाशिए पर पड़े समुदायों के वास्तविक शुभचिंतक हैं. 

यूपी में 21 फीसदी दलित वोटर हैं, कांशीराम की जंयती मनाने का फैसला दलित समाज के विश्वास को जीतने की कोशिश है, क्योंकि सपा इस बात को समझती है कि यादव-मुस्लिम वोटों के सहारे बीजेपी से सत्ता नहीं छीन सकती है. कांशीराम के जरिए दलित और अपिछड़े वर्ग के वोटबैंक को अपने साथ जोड़ने में सफल हो जाती है तो सपा को पास एक बड़ा सियासी आधार हो जाएगा. 

2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का कोर वोटबैंक दलित समुदाय का वोट भी सपा को पहले से ज्यादा मिला. दलित मतदाताओं का झुकाव जिस तरह से सपा की तरफ हुआ है, उससे अखिलेश यादव के हौसले बुलंद हो गए हैं. यूपी की राजनीति में अखिलेश अपना सियासी वोटों का आधार 32 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी प्लस ले जाने की है. अखिलेश यादव की नजर बसपा के वोटबैंक पर है, जिसे साधने की कवायद कर रहे हैं. 

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कांग्रेस नेताओं का कहना  है कि कांशीराम के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को लेकर हमारे नेता राहुल गांधी चल रहे हैं. कांशीराम शुरू से कहते रहे हैं , 'जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी. इस बात को राहुल गांधी इन दिनों हर मंच से उठा रहे हैं, जिसके जरिए दलित और ओबीसी के विश्वास को जीतने की स्टैटेजी मानी जा रही है. इस बात को मायावती बाखूबी समझ रही है, जिसके लिए सपा और कांग्रेस के कांशीराम प्रेम को छलावा बता रही हैं.

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