असम की राजनीति का गणित बड़ा दिलचस्प है. यहां कई बार ऐसा हुआ है कि वोट प्रतिशत में मामूली बढ़त सीटों में बड़ी जीत में बदल गई. 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और विपक्षी महाजोत के बीच कुल वोट शेयर में सिर्फ करीब 1 फीसदी का अंतर था (45% बनाम 44%). लेकिन सीटों में ये मामूली अंतर 25 सीटों की बड़ी बढ़त में बदल गया, एनडीए को 75 सीटें मिलीं और महाजोत 50 पर सिमट गया.
ये पहली बार नहीं था. 2016 में तो एनडीए को कुल मिलाकर विपक्ष से कम वोट मिले थे (42% बनाम विपक्ष के 57%), फिर भी उसने 126 में से 86 सीटें जीत लीं और दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाई.
अब बड़ा सवाल 2026 का है, क्या वही पैटर्न फिर दोहराएगा? या इस बार बदले समीकरण तस्वीर बदल देंगे? असल खेल रैलियों से ज्यादा गठबंधन के गणित में छिपा है. खासकर बीपीएफ (BPF) किसके साथ जाती है और विरोध के वोट किस दिशा में जाते हैं.
बदला-बदला गठबंधन का खेल
2026 से पहले तीन बड़े घटनाक्रम असम की सियासत का गणित बदल सकते हैं.
1. बीपीएफ की घर वापसी
बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) फिर से एनडीए में शामिल हो गई है. 2016 में वह बीजेपी की सहयोगी थी और 12 सीटें जीती थीं. 2021 में उसने महाजोत का दामन थामा, लेकिन सिर्फ 4 सीटें ही जीत पाई.
अब उसके एनडीए में लौटने से बोडोलैंड क्षेत्र में विपक्ष की पकड़ कमजोर पड़ सकती है. 2021 में भी वहां की 16 आदिवासी सीटों में से 14 एनडीए ने जीती थीं. अब बीपीएफ की वापसी से एनडीए की स्थिति और मजबूत मानी जा रही है.
2. कांग्रेस-AIUDF गठबंधन खत्म
2021 का महाजोत अब वैसा नहीं रहा. कांग्रेस ने एआईयूडीएफ (AIUDF) से गठबंधन तोड़ लिया है. 2021 में एआईयूडीएफ ने लोअर असम के बंगाली मूल के मुस्लिम बहुल इलाकों में 15 सीटें जीती थीं और करीब 10 लाख वोट हासिल किए थे.
अगर इस बार दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इन सीटों पर बीजेपी विरोधी वोट बंट सकते हैं और नुकसान विपक्ष को ही होगा.
3. 'तीन गोगोई' का नया मोर्चा?
कांग्रेस के गौरव गोगोई, रायजोर दल के अखिल गोगोई और असम जातीय परिषद (AJP) के लुरिनज्योति गोगोई मिलकर एक नया मोर्चा बनाने की कोशिश में हैं.
बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने एजेपी और रायजोर दल को करीब 11-11 सीटें देने का प्रस्ताव रखा है. लेकिन सीट बंटवारे को लेकर खासकर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में मतभेद बने हुए हैं. उधर, कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने फरवरी में इस्तीफा दे दिया था. हालांकि पार्टी आलाकमान उन्हें मनाने में जुटा है.
इसी बीच, असम बीजेपी अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने साफ किया है कि एनडीए सभी 126 सीटों पर चुनाव लड़ेगा. हालांकि सहयोगियों के बीच सीट बंटवारा अभी तय नहीं हुआ है.
एजेपी क्यों है अहम?
2021 में असम जातीय परिषद (AJP) ने 82 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा और करीब 7 लाख वोट (3.7%) हासिल किए. लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई. रायजोर दल ने भी डेढ़ लाख वोट लिए. सीट भले न आई हो, लेकिन इन वोटों ने खेल जरूर बिगाड़ा. 126 में से 44 सीटों पर तीसरे उम्मीदवारों के वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे. इनमें से 10 सीटों पर तो एजेपी के वोट अकेले ही एनडीए की जीत के अंतर से ज्यादा थे.
अगर ये वोट विपक्षी उम्मीदवार को मिल जाते तो 10 सीटों का नतीजा बदल सकता था. यह सिर्फ एक अनुमान है, लेकिन इससे ये समझ आता है कि अगर एजेपी औपचारिक रूप से कांग्रेस के साथ आ जाए और वोट ट्रांसफर हो जाएं, तो समीकरण बदल सकते हैं. लेकिन अगर 'तीन गोगोई' का मोर्चा नहीं बनता और एजेपी फिर अकेले लड़ती है, तो 2021 की तरह बीजेपी विरोधी वोट फिर बंट सकते हैं खासकर अपर असम में, जहां कांग्रेस कमजोर है.
भूगोल वही, सियासत वही
असम की राजनीति क्षेत्रीय आधार पर बंटी हुई है.
अपर असम: यहां एजेपी और रायजोर दल को अच्छा समर्थन मिला था. अगर विपक्ष एकजुट होता है तो यहां दो दर्जन सीटों पर मुकाबला कड़ा हो सकता है.
लोअर असम: यहां कांग्रेस-एआईयूडीएफ तालमेल से 2021 में 25 सीटें मिली थीं. अगर दोनों अलग लड़ते हैं तो 5–10 सीटों का नुकसान संभव है.
विपक्ष के सामने गणित
2021 में महाजोत को 50 सीटें मिली थीं. बहुमत के लिए 64 चाहिए. यानी 14 सीटों का शुद्ध फायदा जरूरी है. वहीं विपक्ष के पास दो रास्ते हैं. पहला प्रोटेस्ट वोट जोड़ना जो एजेपी के 7 लाख वोट अगर सही तरीके से ट्रांसफर हुए तो 8-10 सीटें पलट सकती हैं. दूसरा है लोअर असम न गंवाना क्येांकि कांग्रेस-एआईयूडीएफ अलग लड़े तो नुकसान तय है.
समस्या ये है कि विपक्ष को दोनों काम एक साथ करने होंगे. वरना एक जगह फायदा और दूसरी जगह नुकसान, नतीजा शून्य.
एनडीए की रणनीति आसान है, नई सीटें जीतने की जरूरत नहीं, सिर्फ मौजूदा सीटें बचानी हैं. बीपीएफ की वापसी से आदिवासी इलाकों में उसका आधार मजबूत है. उसे सिर्फ उन 10 सीटों पर खास ध्यान देना होगा जहां 2021 में जीत का अंतर कम था.
परिसीमन का नया फैक्टर
2023 में असम में परिसीमन हुआ. सीटों की कुल संख्या 126 ही रही, लेकिन कई सीमाएं बदली गईं. सबसे छोटी सीट अमरी (वेस्ट कार्बी आंगलोंग) में करीब 1 लाख मतदाता हैं, जबकि सबसे बड़ी दलगांव (दरांग) में 3.15 लाख से ज्यादा. यानी तीन गुना का अंतर. राज्य में कुल मतदाता करीब 2.5 करोड़ हैं.
सीमाएं बदलने से 2016 और 2021 के आंकड़ों की सीधी तुलना आसान नहीं रही. कई मौजूदा विधायक नए मतदाता क्षेत्रों का सामना करेंगे.
असम में एक फीसदी का वोट अंतर 25 सीटों में बदल सकता है. इतिहास यही कहता है. 2026 में भी तस्वीर रैलियों से नहीं, बल्कि गठबंधन के गणित से तय होगी. बीपीएफ का फैसला, कांग्रेस-एआईयूडीएफ का अलगाव और एजेपी की भूमिका, यही असली गेमचेंजर हैं. अब देखना है कि क्या इस बार छोटा वोट अंतर फिर से बड़ी जीत में बदलेगा, या विपक्ष सच में 'कोड' तोड़ पाएगा.
दीपू राय