असम में विधानसभा चुनाव की कवरेज के लिए जब मैं दिल्ली से गुवाहाटी एयरपोर्ट पर उतरा, तो मन में कई सवाल थे. आखिर किन मुद्दों और कहानियों पर काम किया जाए, जिससे चुनावी रंग पूरी तरह से उभरकर सामने आए? सबसे पहला ख्याल आया असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का इंटरव्यू करने का.
कुछ जानकार लोगों से बातचीत के बाद पता चला कि मुख्यमंत्री अगले दिन असम की 'दूसरी राजधानी' कहे जाने वाले डिब्रूगढ़ में रहेंगे. तभी मन में एक और विचार आया कि अगर डिब्रूगढ़ जाना ही है, तो वहां के चाय बागान श्रमिकों पर भी एक जमीनी स्टोरी जरूर की जाए.
सबसे पहले मैंने गुवाहाटी से डिब्रूगढ़ जाने के लिए कैब बुक की और अपने सहयोगी अंकित सिंह से कहा कि हमें तुरंत निकलना होगा. रास्ता देखा तो पता चला कि यह लगभग 10 से 12 घंटे का लंबा सफर है. दोपहर करीब 3 बजे हम गुवाहाटी से निकले. रास्ते में थोड़ा आगे बढ़ने पर अरुणाचल प्रदेश की ओर जाने वाला मार्ग भी नजर आया. लगातार हो रही हल्की-फुल्की बारिश ने मौसम को बेहद सुहावना बना दिया था. लंबा सफर होने की वजह से हमने रास्ते के लिए कुछ खाने-पीने का सामान ले लिया और ड्राइवर से जल्द से जल्द डिब्रूगढ़ पहुंचाने का अनुरोध किया.
इसी दौरान मैंने असम की राजनीति को समझने की कोशिश शुरू की. यह जानने की कोशिश की कि आखिर इस बार बीजेपी इतने आत्मविश्वास में क्यों है? कुछ रिपोर्ट्स और चर्चाओं के बाद यह समझ आया कि कांग्रेस की नेतृत्व क्षमता कहीं न कहीं कमजोर नजर आ रही है और बीजेपी को भरोसा है कि पिछले 5 वर्षों में किए गए कामों के आधार पर जनता उन्हें दोबारा मौका देगी.
कुछ दूर चलने के बाद काजीरंगा नेशनल पार्क (Kaziranga National Park) का कॉरिडोर आया. यहां एक खास बात पता चली कि इस क्षेत्र में गाड़ियों की स्पीड लिमिट सिर्फ 20 किमी/घंटा होती है, ताकि सड़क पार करते समय वन्यजीवों को कोई नुकसान न पहुंचे. 'Welcome to Kaziranga Corridor' का बोर्ड पढ़ते ही मन में उत्साह भर गया. हमने ड्राइवर से गाड़ी रोकने की बात की, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. ड्राइवर का कहना था कि यहां रुकना सख्त मना है, क्योंकि इससे जानवरों को खतरा हो सकता है. शाम हो चुकी थी और अंधेरा छा गया था, लेकिन आंखें असम की शान, गैंडे (राइनो) को ढूंढ रही थीं. ड्राइवर ने बताया कि गैंडे आसपास तो होते हैं, लेकिन अंधेरे में सड़क पर नहीं आते. कई घंटों के सफर के बाद आखिरकार हम डिब्रूगढ़ पहुंचे और होटल में चेक-इन किया.
अगली सुबह हम डिब्रूगढ़ से करीब 2 किलोमीटर दूर एक चाय बागान पहुंचे. हमारा मकसद वहां काम करने वाली महिला श्रमिकों से बातचीत करना और उनके जीवन पर स्टोरी करना था. असम के चुनावों में चाय बागान के श्रमिक सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण तय करने वाली एक मजबूत आवाज भी हैं. वहां पहुंचने पर पता चला कि अगर महिलाओं से बात करनी है, तो सुबह 6 बजे आना होगा, क्योंकि सभी महिलाएं तड़के ही काम पर निकल जाती हैं. यह जानकर हमने अगले दिन की योजना बनाई और वहां से निकलकर उस स्थान की ओर बढ़े, जहां मुख्यमंत्री का रोड शो शुरू होना था.
धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी. हर बार की तरह इस बार भी महिला समर्थकों की भारी उपस्थिति थी. तभी खबर मिली कि मुख्यमंत्री पहुंच चुके हैं. कुछ ही देर में 'हिमंता बिस्वा सरमा जिंदाबाद' के नारे गूंजने लगे. सुरक्षाकर्मियों ने मीडिया से एक तरफ खड़े होने को कहा. इस बीच महिला समर्थक असमिया गीत गाने और उस पर नृत्य करने लगीं. फिर बीजेपी का थीम सॉन्ग बजने लगा. लाउडस्पीकर की आवाज इतनी तेज थी कि हम एक-दूसरे की बात भी नहीं सुन पा रहे थे.
करीब 10 मिनट बाद मुख्यमंत्री का काफिला वहां पहुंचा. उनके आते ही समर्थकों का उत्साह चरम पर पहुंच गया. हर कोई उनकी एक झलक पाने, हाथ मिलाने और 'मामा आई लव यू' कहने के लिए बेताब था. मुख्यमंत्री गाड़ी से उतरे और उस छोटे ट्रक पर चढ़ने लगे, जिससे रोड शो होना था. लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि उनके लिए वहां तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया. समर्थकों की भीड़ के बीच से गुजरते हुए वे आखिरकार ट्रक पर चढ़े और रोड शो शुरू हुआ.
हमने सुरक्षाकर्मियों से इंटरव्यू की बात की, तो उन्होंने कहा कि गाड़ी के पीछे चलते रहें, मौका मिल जाएगा. रोड शो के दौरान इतनी भीड़ थी कि एक कदम चलना भी मुश्किल हो रहा था. करीब डेढ़ से दो किलोमीटर पैदल चलने के बाद अचानक मुख्यमंत्री के एक सहयोगी ने आवाज लगाई, 'पियूष भाई, ऊपर आ जाओ.' यह हमारे लिए बड़ा मौका था. हम तुरंत ट्रक पर चढ़ गए, जहां मुख्यमंत्री मौजूद थे.
ऊपर पहुंचते ही हमने देखा कि कई बीजेपी नेता मुख्यमंत्री के आसपास खड़े थे. थोड़ी जगह बनाकर हमने कैमरा सेट किया और इशारे से इंटरव्यू की अनुमति मांगी. लेकिन मुख्यमंत्री लगातार समर्थकों से मिलते रहे, किसी से हाथ मिलाना, किसी का गिफ्ट लेना... चारों तरफ फूलों की बारिश हो रही थी और माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में डूबा था. तभी उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'अरे पियूष, तुम कब आए? चलो जल्दी इंटरव्यू कर लो.'
इंटरव्यू शुरू हुआ, लेकिन बीच-बीच में समर्थक उनका हाथ पकड़ लेते और वे भी उसी आत्मीयता से जवाब देते. करीब 5 मिनट का इंटरव्यू पूरा हुआ. अब चुनौती थी ट्रक से नीचे उतरने की. भीड़ इतनी थी कि उतरना भी एक संघर्ष बन गया. जैसे ही उतरने की कोशिश करते, भीड़ धक्का देकर वापस ऊपर कर देती. आखिरकार सुरक्षाकर्मियों की मदद से हम नीचे उतर पाए.
धीरे-धीरे रोड शो आगे बढ़ता गया और अंत में समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री एक राजनीतिक बैठक के लिए रवाना हो गए. यह सिर्फ एक रोड शो नहीं था, बल्कि असम की राजनीति, जनसमर्थन और जमीनी हकीकत को करीब से देखने का एक अनुभव था.
पीयूष मिश्रा