Beat Report: वोटिंग से काउंटिंग तक... जानिए कैसे अभेद्य किले में कैद रहती है EVM

भारत में चुनाव प्रक्रिया के दौरान EVM और VVPAT की सुरक्षा अत्यंत कड़ी और पारदर्शी होती है. मतदान से पूर्व 'मॉक पोल' से लेकर स्ट्रांग रूम की सीलबंदी तक, हर चरण में उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं.

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वोटिंग मशीन चुनाव के बाद कड़ी सुरक्षा के पहरे में रहती है. (Photo-ITG) वोटिंग मशीन चुनाव के बाद कड़ी सुरक्षा के पहरे में रहती है. (Photo-ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 01 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:01 PM IST

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव संपन्न कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है और इस प्रक्रिया की धुरी है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और VVPAT. इन मशीनों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि मतदान शुरू होने से लेकर मतगणना के दिन तक, ये मशीनें एक ऐसी कड़ी और पारदर्शी प्रक्रिया से गुजरती हैं, जिसमें सेंध लगाना नामुमकिन है.

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चुनाव नियम और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के मुताबिक मतदान और मतगणना की पूरी प्रक्रिया पवित्रता और पारदर्शिता से होनी लाजिमी है. इस प्रक्रिया में सभी उम्मीदवारों के अधिकृत प्रतिनिधि शामिल होते हैं और अपने हस्ताक्षर के साथ हर चरण की पवित्रता और मर्यादा को अभिप्रमाणित करते हैं.

मतदान शुरू होने से पूर्व सभी प्रत्याशियों के प्रतिनिधि फॉर्म 17 ए के जरिए ईवीएम के सही होने मॉक मतदान के जरिए मशीन के सही रूप से काम करने की तसल्ली के बाद अपने दस्तख़त करते हैं. फॉर्म 17 पर मशीन का नम्बर सहित सभी बारीक जानकारियां भी फॉर्म पर दर्ज होती हैं. दिन भर मतदान के बाद जब वेटिंग बंद हो जाती है तो ईवीएम भी सभी उम्मीदवारों के एजेंट्स के दस्तखत के बाद सीलबंद कर दी जाती है. इस बात की तस्दीक भी एजेंट्स करते हैं.

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फिर मशीनों को जब स्ट्रांग रूम में बंद किया जाता है तब भी हरेक प्रत्याशी के अधिकृत मतगणना प्रतिनिधि वहां फॉर्म 17 में दर्ज ईवीएम के नम्बर सहित सभी जानकारियों से मिलान करने के बाद दस्तखत करते हैं. मशीनें तीन स्तरीय सुरक्षा घेरे में रहती हैं. अंदरूनी घेरे में मशीनें रखी जाती हैं. वहां एक बार मशीनें रखे जाने और रूम की सीलबंदी हो जाने के बाद ये तभी खुलती है जब मतगणना के लिए उन्हें बाहर ले जाया जाता है.

कड़ी सुरक्षा में रहती हैं वोटिंग मशीन

 कभी स्ट्रांग रुम के अन्दर कोई दुर्घटना हो जाए और सील खोलनी अपरिहार्य हो जाए तो भी सभी उम्मीदवारो के नुमाइंदों और जिला निर्वाचन अधिकारियों की उपस्थिति में उनके हस्ताक्षर की साक्षी में ही खुलता और बंद होता है.

कुछ ऐसे अवसर आए हैं जब स्ट्रांग रूम में शॉर्ट सर्किट से आग लगने की घटनाओं के बाद इसी प्रक्रिया के साथ स्ट्रांग रूम खोला और फिर सीलबंद किया गया. मतगणना की सुबह भी स्ट्रांग रूम की सील खुलते समय भी उम्मीदवारों के एजेंट्स वहां सभी मशीनों के नम्बर मिलवा कर मतगणना रूम में भेजने की तस्दीक करते हैं. यानी हर कदम पर उम्मीदवारों के हाजिर प्रतिनिधि प्रक्रिया के साक्षी रहते हैं और अपने हस्ताक्षर से उसकी तस्दीक भी करते हैं.

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मशीनों को रखने के लिए 'स्ट्रांग रूम' का चयन किया जाता है, जो एक अभेद्य किले जैसा होता है. यहां सुरक्षा का तीन स्तरीय (Three-tier) घेरा होता है:

आंतरिक घेरा: यहां वास्तविक स्ट्रांग रूम होता है, जिसकी सुरक्षा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जिम्मे होती है. यहां जवान 24 घंटे मुस्तैद रहते हैं.  उन पर भी सीसीटीवी की निगरानी दिन रात रहती है. जवान न सो सकता है न बैठ सकता है. दो-दो घंटे पर शिफ्ट बदलती है.

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मध्यम घेरा: यहां अर्धसैनिक बल तैनात होते हैं और इसी क्षेत्र में उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के लिए टेंट लगे होते हैं. सामने बड़े बड़े स्क्रीन पर सीसीटीवी फुटेज दिन रात आती रहती है. उनकी बैटरी आदि बदलने की सूचना भी सभी उम्मीदवार प्रतिनिधियों के साथ शेयर की जाती है.

बाहरी घेरा: यहां राज्य पुलिस की तैनाती होती है. अंदर घुसने के लिए उम्मीदवार प्रतिनिधियों को उम्मीदवार की ओर से जारी अधिकृत पत्र के साथ निर्वाचन आयोग की ओर से QR कोड युक्त पास यानी आईकार्ड जारी होता है.

स्ट्रांग रूम की सीलबंदी के वक्त भी एजेंट मौजूद रहते हैं. यदि किसी आपात स्थिति (जैसे शॉर्ट सर्किट) में रूम खोलना पड़े, तो वह भी जिला निर्वाचन अधिकारी और सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति और लिखित सहमति के बाद ही संभव है.
 

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