उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव एक साल बाद है, लेकिन सियासी समीकरण बनाने की कवायद अभी से शुरू हो गई है. दलित और अतिपिछड़े समुदाय के बीच राजनीतिक चेतना जगाने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है. ऐसे में कांशीराम के बहाने कांग्रेस अपने खिसके हुए जनाधार को वापस लाने और मायावती के दलित वोटबैंक को छीनने का प्लान बना लिया है.
कांशीराम को लेकर कांग्रेस ने लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में शुक्रवार को एक कार्यक्रम रखा है, जिसे बहुजन संवाद का नाम दिया गया है. इस कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे और दलित-अतिपिछड़े समुदाय के साथ संवाद करेंगे. इस दौरान राहुल गांधी कांशीराम के विचारों और संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प दिलाएंगे.
कांग्रेस ने 2025 में कांशीराम की जयंती को दलित गौरव के रूप में मनाया था जबकि इस बार सामाजिक परिवर्तन दिवस के तौर पर मना रही है. ऐसे में कांशीराम के बहाने राहुल गांधी 'बहुजन संवाद' कर सामाजिक न्याय के एजेंडे को धार देते नजर आएंगे, लेकिन सवाल यही है कि कांग्रेस क्या मायावती के दलित वोटबैंक में सेंधमारी कर सकेगी?
कांशीराम के बहाने राहुल का बहुजन संवाद
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर नजर आते हैं. जाति जनगणना,
आरक्षण और दलित-पिछड़ों के मुद्दे को संसद से सड़क तक उठा रहे हैं. इसी कड़ी में कांशीराम के नाम पर होने वाले कांग्रेस के कार्यक्रम में राहुल गांधी शिरकत करेंगे और उनकी राजनीतिक विरासत और विचार को आगे बढ़ाने की कवायद कर सकते हैं.
कांशीराम की जयंती को कांग्रेस सामाजिक परिवर्तन दिवस के रूप में मना रही है. कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. राजेन्द्र पाल गौतम और कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल जय हिंद ने लखनऊ में कांशीराम की जयंती के तौर पर मनाने की रूप रेखा बनाई है, जिसमें राहुल गांधी सामाजिक न्याय के मुद्दे को धार देकर उत्तर प्रदेश में दलितों का विश्वास जीतने का दांव चलेंगे.
कांशीराम की राजनीति से दलित कांग्रेस से हुए दूर
आजादी के बाद से लंबे समय तक कांग्रेस का कोर वोटबैंक दलित समुदाय हुआ करता था, लेकिन अस्सी के दशक में बसपा के सियासी उदय के बाद से दलित समाज उत्तर भारत के राज्यों से पूरी तरह छिटक गया है. कांग्रेस से दलित समुदाय को दूर करने का काम कांशीराम ने किया.
कांशीराम ने अपनी सियासी पारी का आगाज कांग्रेस के विरोध में शुरू किया और दलित समाज में राजनीतिक और सामाजिक चेतना ऐसी जगाई जगाई कि कांग्रेस हाशिए पर पहुंच गई. बसपा की क्या पहचान, 'नीला झंडा और हाथी निशान'… यह नारा दलित गांव में गूंजने लगा था. दलित समाज के बीच बसपा की यही पहचान थी और सियासी ताकत. दलित समुदाय बसपा का मुख्य वोटबैंक बन गया, जिसके सहारे मायावती चार बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं और कांग्रेस सियासी वनवास पर चली गई.
कांग्रेस ने एक बार फिर दलित समाज के विश्वास को हासिल करने के लिए कांशीराम को अपना सियासी हथियार बनाने का दांव चला है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह प्रयास पार्टी की उस बड़ी कोशिश का हिस्सा है, जिसके तहत वह अपने उस पुराने दलित जनाधार से फिर से जुड़ना चाहती है, जिस पर बसपा से उदभव से पहले कभी उसका कब्जा था.
कांग्रेस क्या दलित वोटबैंक को मायावती से छीन पाएगी?
कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि बसपा के लगातार कमजोर होने के बाद से फिलहाल दलित वोटर कहीं स्थाई तौर पर नहीं जुड़ा है. कांग्रेस को लगता है कि पार्टी अपने पुराने दलित वोट बैंक को फिर अपनी ओर खींच सकती है. कांग्रेस को लगता है कि दलित मतदाता अब किसी अन्य विकल्प की तलाश में हैं. इसीलिए सपा और कांग्रेस कांशीराम की जयंती मनाकर खुद को उनके असली उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की तैयारी में है.
यूपी कांग्रेस संगठन मंत्री अनिल यादव कहते हैं कि कांशीराम को किसी एक दल के नेता के रूप में नहीं देखना चाहिए. राहुल गांधी कांशीराम के विचारों व संघर्ष को आगे बढ़ाने काम कर रहे हैं. कांग्रेस इस समय देश की इकलौती पार्टी है जो कांशीराम की विचारधारा को आगे ले जा सकती है.कांग्रेस नेताओं का कहना है कि कांशीराम के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को लेकर हमारे नेता राहुल गांधी चल रहे हैं.
कांशीराम शुरू से कहते रहे हैं , 'जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी. इस बात को राहुल गांधी इन दिनों हर मंच से उठा रहे हैं, जिसके जरिए दलित और ओबीसी के विश्वास को जीतने की रणनीति मानी जा रही है. राहुल की बात को मायावती बखूबी समझ रही हैं, जिसके लिए कांग्रेस के कांशीराम प्रेम को छलावा बता रही हैं.
मायावती दलित समाज को इस बात के लिए लगातार आगाह कर रही हैं कि कांग्रेस से दूर रहें. मायावती जानती हैं कि अगर मुस्लिम वोटों की तरह दलित समुदाय भी कांग्रेस की तरफ वापस चला गया तो फिर उनकी राजनीतिक उभार दोबारा नहीं हो सकेगा. दलित वोटर जरूर 2024 के चुनाव में राहुल गांधी के आरक्षण और संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ गए हैं, लेकिन अभी भी कांग्रेस पर पहले की तरह आंख बंद करके विश्वास नहीं कर पा रहे हैं.
कुबूल अहमद