ग्राउंड रिपोर्ट: दुकानें बंद, काम ठप्प.. चुनावी शोर के बीच खामोश क्यों है बंगाल का यह इलाका

बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के हरल गांव में पटाखा उद्योग ठप पड़ा है, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है. चुनाव के दौरान मतदाता सूची से कई लोगों के नाम गायब होने की समस्या ने स्थानीय निवासियों में निराशा और भय का माहौल पैदा कर दिया है.

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हरल की पहचान लंबे समय से पटाखों से जुड़ी रही है. (Photo: ITG) हरल की पहचान लंबे समय से पटाखों से जुड़ी रही है. (Photo: ITG)

मौसमी सिंह

  • चंपाहाटी,
  • 25 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 4:19 PM IST

चुनाव के मौसम में नेता मतदाताओं के चारों ओर मंडराते हैं और उन्हें देवताओं की तरह पूजने लगते हैं. लेकिन बंगाल के दक्षिण 24 परगना ज़िले के हरल गांव में तस्वीर कुछ अलग ही दिखाई दे रही है. यहां कभी पटाखों की जगमगाहट से त्योहारों को रोशन करने के लिए मशहूर चंपाहाटी आज अजीब सी खामोशी में डूबा हुआ है. दुकानें बंद हैं, कामकाज ठप पड़ा है और आवाजें भी जैसे दब सी गई हों.

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पश्चिम बंगाल में दक्षिण 24 परगना समेत 142 विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे चरण का मतदान हो रहा है, ऐसे में आजतक की टीम इस खामोशी के पीछे छिपे रहस्य को समझने के लिए हरल पहुंची.

हरल की पहचान लंबे समय से पटाखों से जुड़ी रही है. पीढ़ियों से लोग इसी व्यवसाय से अपना जीवन यापन करते आए हैं. लेकिन आज इसकी संकरी गलियों में घूमते हुए, हलचल की बजाय सन्नाटा पसरा हुआ है. दुकानें बंद हैं, घरों के अंदर औजार बेकार पड़े हैं. कई महीनों से काम ठप्प पड़ा है. 

विश्वनाथ मंडल नाम के एक व्यक्ति बताते हैं कि 6-7 महीने हो गए, कुछ नहीं हुआ. वो बताते हैं कि यही हमारी रोजी-रोटी थी. अब सब कुछ बंद है. हमें कहा गया है, अभी काम बंद कर दो, चुनाव के बाद फिर से शुरू होगा. वरना छापेमारी होगी.

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नाम गायब, पहचान गायब
 



यह संकट सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि चुनावी भी है. गांव के कई कोनों में लोग अधिकारियों के आसपास जमा होकर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मतदाता सूची से उनके नाम क्यों गायब हो गए हैं. एक स्थानीय मतदाता सूचना अधिकारी (बीएलओ) का कहना है, लोग यहां रहते हैं, लेकिन उनके नाम गायब हैं, हमें नहीं पता क्यों. अधिकारी कहते हैं कि उचित दस्तावेज जमा नहीं किए गए, लेकिन लोग जोर देकर कहते हैं कि उन्होंने सब कुछ दे दिया है. कई लोगों के लिए, यह उलझन अब खामोश निराशा में बदल गई है. 

एक निवासी अनिमा कहती हैं, मैंने अपना आधार कार्ड, अपने पिता के दस्तावेज, तीन-चार बार जमा किए, फिर भी मेरा नाम हटा दिया गया. हम जन्म से यहीं रहते आए हैं. एक अन्य निवासी शक्ति भी इसी तरह की निराशा व्यक्त करती हैं. 

आजीविका ठप, भय का माहौल

हरल में पटाखे बेचना महज एक मौसमी पेशा नहीं है, बल्कि यह आजीविका का आधार है. लेकिन आज यह आधार टूट चुका है. फायरक्रैकर कॉन्ट्रैक्टर प्रहलाद हास्कर कहते हैं, चालीस हज़ार लोग सीधे तौर पर इस काम से जुड़े हैं. हमारे पास लाइसेंस तो हैं, लेकिन उन लाइसेंसों के तहत हमें पटाखे बनाने की इजाजत नहीं है. कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं. हम पर्यावरण मानकों और ध्वनि सीमा का पालन करते हैं, फिर भी हमें परेशान किया जाता है. 

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इस अनिश्चितता ने कई लोगों को अपना धंधा छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. पटाखों की दुकानों की जगह अब निवासी सब्ज़ी के स्टॉल या छोटे साइबर कैफ़े चलाने की कोशिश कर रहे हैं. किसी भी तरह से पेट भरने के लिए. 

एक दुकानदार दिलीप मंडल पूछते हैं, “हम क्या करें? पहले आग लगी, फिर चुनाव आ गए. ये सब कैसे चलेगा? मेरा एक बच्चा है, इसलिए मैंने एक कंप्यूटर लगा लिया है. नेता कहते हैं कि चुनाव के बाद दुकानें खुल जाएंगी, लेकिन हमें एक स्थायी समाधान चाहिए. हम इस तरह बार-बार दुकानें खोल और बंद नहीं कर सकते.”

वादों पर टिकी उम्मीदें

आस-पास ही सरकार समर्थित एक पटाखा निर्माण केंद्र बनने की चर्चा है, जिसमें दमकल कर्मियों जैसी सुरक्षा सुविधाएं होंगी. स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर यह समय पर बनकर तैयार हो जाता है, तो इससे राहत मिल सकती है. एक निर्माता देबाशीष मंडल कहते हैं, "साढ़े चार महीने से काम रुका हुआ है. पचास हजार लोग इस पर निर्भर हैं. अगर यह केंद्र जल्दी बन जाता है, तो इससे हमें सहारा मिलेगा." हालांकि, फिलहाल यह उम्मीद अधूरी ही है.

चुनाव का मौसम आमतौर पर शोरगुल भरा होता है. वादे, रैलियां और मांगें खूब गूंजती हैं. लेकिन हरल गांव अपनी खामोशी के लिए अलग खड़ा है. कभी पूरे बंगाल में उत्सवों की रौनक बिखेरने वाला यह गांव अब अंधकार में डूबा हुआ है.

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