प्राइवेट स्कूल फेवरेट, 1.3 करोड़ गिरा सरकारी स्कूलों में दाखिला

सर्व शिक्षा अभि‍यान पर 1.16 लाख करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूलों की नहीं सुधरी हालत. सरकारी स्कूलों में घटा एडमिशन का आंकड़ा, जबकि बढ़ रही है निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या...

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निजी स्कूलों में बढ़ती फीस को देखते हुए सरकार लगातार सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने में लगी हुई है. स्कूलों में पढ़ाई की लचर व्यवस्था और टीसर्च के गैरजिम्मेदाराना रवैये को आड़े हाथ लेते हुए कुछ राज्य सरकारें टीचर्स के रंग-बिरंगे कपड़ों से लेकर उनके मोबाइल इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा रही हैं. कुछ राज्यों में तो यह भी दावा किया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई और कैंपस की साफ-सफाई पर काफी काम किया गया है और अब पहले जैसी स्थ‍िति नहीं है.

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पर हालिया अध्ययन की रिपोर्ट कुछ और ही हाल बयां करती है. अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार साल 2010 से 2016 तक भारत के 20 राज्यों के सरकारी स्कूलों में होने वाले एडमिशन में 1.3 करोड़ की गिरावट आई है. जबकि निजी स्कूलों में इसी दौरान 1.75 करोड़ नये छात्रों ने एडमिशन लिया है.

रिपोर्ट की मानें तो पिछले 5 वर्षों के दौरान लाख कोशिशों और बड़े स्तर पर खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में हर साल गिरावट दर्ज की जा रही है. जबकि अक्सर विवादों में फंसे रहने के बावजूद निजी स्कूलों में औसत दाखिले में हर साल इजाफा हो रहा है.

यह अध्ययन लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन में एजुकेशन एंड इंटरनेशनल डेवेलपमेंट की प्रोफेसर गीता गांधी किंगडन ने किया है.

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गीता गांधी के मार्च 2017 रिसर्च पेपर के अनुसार भारत में सरकारी स्कूल के शिक्षकों को चीन के शिक्षकों के मुकाबले 4 गुणा ज्यादा सैलरी मिलती है. बावजूद इसके सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार नहीं दिख रहा है. इसके कारण औसत दाखिला पिछले 5 साल में प्रति स्कूल 122 से 108 घटा है.

वहीं दूसरी ओर गैर सरकारी स्कूलों या निजी स्कूलों में इस दौरान दाखिले में प्रति स्कूल औसतन 202 से 208 की बढ़ोतरी हुई है.

हालांकि डिस्ट्र‍िक इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (DISE) और शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो स्कूल जाने वाले भारतीय बच्चों में 65 फीसदी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं. यानी देश के 20 राज्यों के 11.3 करोड़ बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं.

फिर क्या वजह है कि भारत के सरकारी स्कूलों, जहां गरीब बच्चों को 14 साल की उम्र तक नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है, फिर भी छात्र महंगे निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं.

DISE के आंकड़ों को आधार मानकर अध्ययन में उन बच्चों के माता-पिता से जब इसका कारण पूछा गया तो उनका जवाब था कि निजी स्कूलों में सरकारी स्कूलों के मुकाबले शिक्षा का स्तर ठीक है.

रिपोर्ट में प्रोफेसर गीता गांधी ने कहा है कि प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के सीखने समझने का स्तर सरकारी स्कूलों के मुकाबले बेहतर पाया गया.

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सर्व शिक्षा अभि‍यान पर 1.16 लाख करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद साल 2009 से 2014 के बीच quality of learning में गिरावट देखी गई है.

5 में 1 से भी कम प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को ट्रेन्ड पाया गया. यहां तक कि देश की राजधानी और पर कैपिटा इनकम के अनुसार देश के सबसे धनी राज्य दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आधे से ज्यादा शिक्षक अस्थाई अनुबंध पर रखे गए हैं. ऐसे में अस्थाई शिक्षक पढ़ाई को लेकर फुल-टाइम टीचर्स की तरह गंभीरता नहीं दिखाते.

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