नॉदर्न नॉर्वे जहां गर्मियों में मिडनाइट सन की घटना बहुत आम बात है. यहां आर्कटिक टाउन और गांवों में रह रहे लोग आधी रात में चांद के बजाय सूरज से आंखमिचौली के आदी हो चुके हैं. उन्हें अचानक सूरज की तेज रोशनी, चिड़ियों का चहचहाने लगना कुछ भी अजीब नहीं लगता. हाल ही में आर्कटिक रेखा पर बसे एक देश से गुजर रहे इंडियन परिवार ने आधीरात में रोशनी देखी तो ये उनके लिए अचंभे की बात थी, उन्होंने वहां की फोटो भी सोशल मीडिया पर डालीं. लेकिन, वाकई इसके पीछे की दिलचस्प वजह आपको भी हैरान कर सकती है. साथ ही इसका इंसानी जेहन पर पड़ रहा असर भी जानें.
मिडनाइट सन बस एक प्रचलित नाम है, असल में इसे इसे मिडनाइट लाइट यानी 'मध्यरात्रि प्रकाश' के नाम से जाना जाता है. खासकर आर्कटिक सर्कल के ठीक नीचे के शहरों में. उदाहरण के लिए ट्रॉनहैम सिटी जो कि आर्कटिक सर्कल के नीचे करीब सौ मील की दूरी पर है, लेकिन गर्मियों के संक्रांति के आसपास कुछ हफ्ते के लिए यहां आधी रात को काफी तेज प्रकाश होता है. इतना प्रकाश कि आप आराम से बैठकर पढ़ाई कर सकते हैं या बिना लाइट ऑन किए आप अपना कोई जरूरी घरेलू काम निपटा सकते हैं. इस टाइम भी अलग अलग होता है. जैसे उत्तरी नॉर्वे के सबसे बड़े शहर ट्रोम्सो में लोग हर साल लगभग दो महीने तक मिडनाइट घटना का अनुभव करते हैं. ये समय 20 मई से 22 जुलाई का होता है. वहीं उत्तरी केप मिडनाइट सन बस कुछ हफ्तों तक दिखाई देता है, ये करीब 14 मई से 29 जुलाई के बीच का समय होता है.
अभी वैज्ञानिक ठीक से इस बात का पता नहीं लगा पाए हैं कि आखिर कौन से न्यूरोट्रांसमीटर इससे प्रभावित होते हैं. एक मीडिया रिपोर्ट में मून नॉर्वे के एक शोधार्थी ने इस पर लिखा है कि मैंने गर्मियों में देश के उत्तर के चारों ओर बड़े पैमाने पर यात्रा की. मैंने महसूस किया है रात में होने वाली ये रोशनी इंसान के दिमाग और उसकी बॉडी क्लॉक पर बहुत बुरा असर डालती है. वहीं नार्वे में मिडनाइट सन की रोशनी से बचने के लिए ज्यादातर होटलों में रात में काले पर्दे इस्तेमाल किए जाते हैं. लोग घरों में भी इसी तरह के इंतजाम करते हैं, मसलन आई मास्क भी इसी का हिस्सा है.