4 अक्टूबर 1582. रात हुई. यूरोप सोने चला गया. अगले दिन सुबह हुई तो तारीख 5 अक्टूबर 1582 नहीं थी. बल्कि ये 15 अक्टूबर था. 4 अक्टूबर से सीधा 15 अक्टूबर. पूरे 10 दिन का गोलमाल. क्रिश्चयन दुनिया में हाहाकार मच गया. मजदूरों ने "खोए हुए" दिनों के लिए पूरी सैलरी की मांग की, खगोलविदों ने कहा- हमारे रिसर्च और रिकॉर्ड बेकार हो गए. प्रोटेस्टेंट देशों ने सदियों तक इसका विरोध किया, और इसे कैथोलिकों की मनमानी बताया.
इंग्लैंड 1752 तक अड़ा रहा, जब "हमें हमारे 11 दिन वापस दो" के नारों के साथ वहां दंगे भड़क उठे. रूस 1918 तक और ग्रीस ने 1923 तक इस बदलाव को स्वीकार नहीं किया.
ये उस कैलेंडर की कहानी है जिसकी तारीखों पर आज लगभग पूरी दुनिया चलती है. हमारा अंग्रेजी कैलेंडर. जिसे ग्रेगोरियन कैलेंडर भी कहा जाता है. सदियां गुजर गईं ये 10 दिनों का घोटाला अभी भी कायम है. 10 दिनों को हड़पने का ये ऐतिहासिक फैसला वैज्ञानिक वजहों से नहीं, बल्कि धार्मिक और राजनीतिक निर्णय था.
पहले जूलियन कैलेंडर फिर अंग्रेजी कैलेंडर
आज जिस अंग्रेजी कैलेंडर से दुनिया चलती वो 4 अक्टूबर 1582 को ही लागू हुआ था. इससे पहले यूरोप में जूलियन कैलेंडर चलता था. जूलियन कैलेंडर को जूलियस सीजर ने 45 ईसा पूर्व में लागू किया था. वह रोमन गणराज्य का राजा था.
लेकिन खगोलविदों, वैज्ञानिकों और काल गणना करने वाले पादरियों को एहसास हुआ कि ये कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा की गति के साथ मैच नहीं करता है.
बता दें कि ठीक इसी समय भारत में अलग अलग तरीकों से काल गणना हो रही थी. तब उत्तर और मध्य भारत में विक्रम संवत का इस्तेमाल हो रहा था. इसे राजा विक्रमादित्य ने शुरू किया था और इस कैलेंडर को 57 ईसा पूर्व से शुरू माना जाता है.
वहीं दक्षिण और पश्चिम भारत में शक संवत का प्रचलन था. इसे 78 ईस्वी से शुरू माना जाता है. हालांकि शुभ-अशुभ निर्धारण के लिए सूर्य-चंद्र चक्र पर आधारित पंचाग का बड़े पैमाने पर प्रचलन था. इसके अलवा मुगल काल में हिजरी कैलेंडर भी आधिकारिक था.
अब बात जूलियन कैलेंडर के खामियों की. जिस जूलियन कैलेंडर से यूरोप संचालित हो रहा था. उसकी गड़बड़ियों ने यूरोप के त्योहारों का चक्र बिगाड़ दिया था.
11 मिनट के खेल ने बिगाड़ दिया यूरोप का फेस्टिवल
दरअसल जूलियन कैलेंडर में एक वर्ष में 365.25 दिन माना गया था. और हर चार साल पर एक लीप डे जोड़ा जाता है. हमें भी यही बताया गया है. लेकिन प्रकृति, जैसा कि अक्सर होता है, ज़्यादा जटिल निकली.
मौसमों के चक्र को दिखाने वाला असली ट्रॉपिकल साल लगभग 365.2422 दिन का होता है, जो जूलियन कैलेंडर के साल से लगभग 11 मिनट कम है. लेकिन इस 11 मिनट ने यूरोप का पूरा सिस्टम ही बदल दिया.
ये 11 मिनट जमा होते रहे. जिससे कैलेंडर हर 400 साल में लगभग तीन दिन पीछे खिसक गया.
इस 11 मिनट की कटौती ने कैसे यूरोप का कैलेंडर बिगाड़ दिया अब ये समझिए.
जूलियन कैलेंडर 45 ईसा पूर्व में लागू किया गया था. गुजरते-गुजरते 1500वीं सदी चल रही थी. कुल मिलाकर लगभग 1600 साल गुजर चुके थे.
1570 से वसंत विषुव (Spring equinox) जो ईस्टर की तारीख तय करने के लिए बहुत जरूरी था 21 मार्च से खिसककर लगभग 11 मार्च पर आ गया था. इससे पहले यूरोप 21 मार्च को ईस्टर मनाता था.
वसंत विषुव वह खगोलीय घटना है जब सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते हुए पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर आ जाता है. इस रोज दिन और रात की लंबाई लगभग बराबर होती है, जिसका मतलब है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच का समय समान होता है.
1500वीं सदी में जब कैलेंडर की गलती की वजह से किसान मौसम के हिसाब से फसलें नहीं बो पा रहे थे, और चर्च का सबसे पवित्र दिन पवित्र घटनाओं से मेल नहीं कर रहा था. जिस ईस्टर को ईसाई अब तक सामान्य रूप से 21 मार्च को मना रहे थे वो खिसक कर नजदीक ही आता जा रहा था.
लीप वर्ष का कठिन गणित
इस गलती को दूर करने के लिए आए इटली के खगोल शास्त्री एलोइसियस लिलियस. उन्होंने समाधान सुझाया. इस कैलेंडर को फिर से सही करने के लिए 10 दिन छोड़ दिए जाएं, यानी की गायब कर दिए जाएं और लीप ईयर के नियम को बेहतर बनाया जाए. नए कैलेंडर में 10 दिन गायब कर दिया गया.
नई व्यवस्था में जो वर्ष 4 से डिवाइड होते थे वे अभी भी लीप ईयर रहेंगे, लेकिन सदी वाले साल जैसे 1700 या 1800 लीप वर्ष नहीं होंगे. जब तक कि वे 400 से भी डिवाइड न हों. जैसे 1600 या 2000. यही वजह है कि वर्ष 1700 और 1800 लीप वर्ष नहीं हैं, जबकि 1600 और 2000 लीप वर्ष हैं.
इन्हीं बदलावों के साथ पोप ग्रेगरी XIII ने 4 अक्टूबर 1582 को ग्रगोरियन कैलेंडर लागू किया था. ग्रेगोरियन 1572 से 1585 तक कैथोलिक चर्च का प्रमुख था और इटली के रोम में पापल स्टेट्स का शासक था. इसी कैलेंडर में 4 अक्टूबर के बाद सीधे 15 अक्टूबर आया था.
अब मार्च नहीं, जनवरी था साल का पहला महीना
इस नए ग्रगोरियन कैलेंडर के साथ ही जनवरी साल का पहला महीना हो गया, जबकि जूलियन कैलेंडर में मार्च साल का पहिला और फरवरी आखिरी महीना था.
इस कैलेंडर के अवैज्ञानिक तरीके की आलोचना करते हुए भारत के रिसर्चर तीर्थेंदु गांगुली कहते हैं, "इन गायब तारीखों के लिए कोई एक्सप्लेनेशन नहीं दिया गया. जाहिर है, पोप ग्रेगरी XIII कैलेंडर को "ठीक" कर रहे थे (भगवान ही जाने कैसे!). इसके अलावा,वह यह भी नहीं बता पाए कि नया साल जनवरी से क्यों शुरू होना चाहिए. गणितज्ञों और खगोलविदों से दूर रहने का उनका दिखावटी रवैया ही ग्रेगोरियन कैलेंडर को गैर-वैज्ञानिक बनाता है. विज्ञान समझदारी और तर्क का रास्ता अपनाता है, न कि किसी कट्टर तानाशाह की मनमानी का."
इस तरह हम देखते हैं कि ग्रेगोरियन कैलेंडर को 1582 में पोप ग्रेगरी XIII द्वारा ईसाई चर्च के लिए बनाया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य ईस्टर जैसे धार्मिक त्योहारों की तारीखों को सही ढंग से तय करना था, न कि वैज्ञानिक सटीकता का पालन करना.
26 सेकेंड अभी भी गड़बड़ है हमारा अंग्रेजी कैलेंडर
ग्रेगोरियन कैलेंडर एक सौर कैलेंडर है, लेकिन यह पृथ्वी के वास्तविक सौर वर्ष (365.2422 दिन) से पूरी तरह सामंजस्य नहीं रखता. इसमें हर 4 साल में एक लीप वर्ष (366 दिन) जोड़ा जाता है, फिर भी इसमें खामियां हैं.
मौसम के साथ कैलेंडर को सिंक करने के लिलियस और ग्रेगोरियन की कथित कोशिशों के बावजूद, ये इंग्लिश कैलेंडर अभी भी 26 सेकंड पीछे है. हर एक वर्ष में 26 सेकेंड पीछे. इसका नतीजा ये हुआ है कि 1582 में ग्रेगरी द्वारा अपना कैलेंडर पेश करने के बाद से कई घंटों का अंतर आ गया है. साल 4909 तक ग्रेगोरियन कैलेंडर सौर वर्ष से पूरे एक दिन आगे हो जाएगा.
या इसे यूं कहें कि इस 26 सेकेंड की वजह से हर 3300 सौ साल में एक दिन की गड़बड़ी हो जाएगी. अगर दुनिया इसी कैलेंडर पर चलती रही तो कभी समय आएगा जब हमारी भावी पीढ़ियों को एक बार फिर से त्योहारों को बेमेल मौसम में मनाना पड़ सकता है.
दरअसल पृथ्वी की कक्षा सूर्य के चारों ओर पूर्ण वृत्त नहीं, बल्कि अण्डाकार है. ज्वार भाटा जैसी खगोलीय घटनाओं के कारण पृथ्वी की घूर्णन गति बहुत कम मगर शिथिल हो रही है. लेकिन ग्रेगोरियन कैलेंडर में इन खगोलीय विशेषताओं का ख्याल नहीं रखा गया है.
एक सटीक कैलेंडर को वेधशाला-आधारित समायोजन (जैसे ईरानी सोलर हिजरी या वैदिक पंचांग) की जरूरत होती है, न कि निश्चित नियमों की. आलोचक कहते हैं कि यदि हम इसे जारी रखें, तो कभी भविष्य में हमें होली सर्दियों में और दिवाली गर्मियों में मनाना पड़ सकता है.
इसके विपरीत, भारतीय कैलेंडर गणितीय रूप से अधिक सटीक है क्योंकि यह गणितज्ञों और खगोलविदों द्वारा निरंतर समायोजित होता रहता है.
महीनों की असमान लंबाई
ग्रेगोरियन कैलेंडर में महीनों की लंबाई 28, 29, 30 या 31 दिनों की होती है, जो किसी प्राकृतिक खगोलीय चक्र यानी कि सौर या चंद्र चक्र पर आधारित नहीं है.
उदाहरण के लिए फरवरी में 28 या 29 दिन होते हैं, जबकि जुलाई और अगस्त में 31 दिन, यह रोमन सम्राटों जूलियस सीजर और ऑगस्टस के राजनीतिक फैसलों से आया है, न कि वैज्ञानिक गणनाओं से.
भारत में मार्च से जनवरी में कब मनाया जाने लगा नया साल
1751 ईस्वी तक ग्रेगोरियन कैलेंडर को मानने वाले लोग मार्च में नया साल मनाते थे. अंग्रेजी शब्द मार्च जिसके नाम पर इस महीने का नाम पड़ा है, का मतलब है "आगे बढ़ना या चलना शुरू करना", जो नए साल की शुरुआत का प्रतीक है.
रिसर्चर तीर्थेंदु गांगुली कहते हैं कि, 'यह ध्यान देने वाली बात है कि अंग्रेजी साहित्य में चॉसर की कैंटरबरी टेल्स (1340-1400 ईस्वी) से लेकर शेक्सपियर के सॉनेट्स (1567-1616 ईस्वी) तक अप्रैल महीने का जिक्र बार-बार खुशी और त्योहारों के मौसम के रूप में किया गया है.
19वीं सदी ईस्वी तक यूरोप के कई छोटे क्षेत्रों में अप्रैल में नया साल मनाया जाता था. हालांकि किंग जॉर्ज II के कहने पर 1750 ईस्वी में ब्रिटिश संसद में एक बिल पास किया गया जिसने नए साल की शुरुआत की गिनती में एक बड़ा बदलाव किया, इसे मार्च से जनवरी में बदल दिया. इसी के साथ भारत में भी ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत हो गई. भारत में ब्रिटिश अपने आधिकारिक कामों के लिए इसी कैलेंडर का इस्तेमाल करने लगे.
पन्ना लाल