JNUSU चुनाव: आपसी फूट की वजह से कमज़ोर हुआ लेफ़्ट? छात्रों के लिए कैसे मुफ़ीद होंगे जीते हुए कैंडिडेट्स

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में AISA के नीतीश कुमार को JNUSU अध्यक्ष, DSF की मनीषा को उपाध्यक्ष और DSF की ही मुंतेहा फ़ातिमा को महासचिव पद के लिए चुना गया है. वहीं, एबीवीपी के वैभव मीणा जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव पद पर फ़तह हासिल किए हैं.

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मोहम्मद साक़िब मज़ीद

  • नई दिल्ली,
  • 29 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 6:48 AM IST

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) चुनाव में कांटे की टक्कर में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फ्रंट (AISA-DSF) के लेफ्ट अलायंस ने सेंट्रल पैनल के चार में से तीन पदों पर फ़तह हासिल की है. वहीं, ​​अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के खाते में एक पद आया है.

चुनाव में AISA के नीतीश कुमार को JNUSU अध्यक्ष, DSF की मनीषा को उपाध्यक्ष और DSF की ही मुंतेहा फ़ातिमा को महासचिव पद के लिए चुना गया है. वहीं, एबीवीपी के वैभव मीणा जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव पद पर फ़तह हासिल किए हैं.

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‘बिहार, हरियाणा और जयपुर की विजय...’

प्रेसिडेंट का पद पर जीत हासिल वाले नीतीश कुमार (26) स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में तीसरे साल के PhD स्कॉलर हैं. वे बिहार के अररिया जिले के शेखपुरा के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

वहीं उपाध्यक्ष पद जीतने वाली मनीषा (27) सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडीज में PhD की छात्रा हैं. वे हरियाणा के एक मजदूर वर्ग के दलित परिवार से हैं. मनीषा बताती हैं, "मैं अपने परिवार की पहली लड़की हूं, जिसने दिल्ली में क़दम रखा और जेएनयू में पीएचडी करने का ख़्वाब देखा."

महासचिव पद पर परचम लहराने वाली मुंतेहा फ़ातिमा (28), सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज में PhD स्कॉलर हैं. वे बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली हैं. पटना शहर से जेएनयू तक का मुंतेहा का सफ़र आर्थिक तंगी और सामाजिक दबाव की जद्दोदहद से भरा रहा है. वे बताती हैं- “हम जिस बैकग्राउंड से आते हैं, वहां राजनीति में आने से डर लगता है. मेरी अम्मी ने कई बार कहा कि इन सब में मत पड़ो, भविष्य खराब हो सकता है.''

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संयुक्त सचिव पद पर विजयी वैभव मीणा (27), हिंदी साहित्य में PhD स्कॉलर हैं. वे राजस्थान के करौली जिले के आदिवासी किसान के बेटे हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी की फीस भरने के लिए पार्ट टाइम जॉब किया और शिक्षा हासिल करने का संकल्प लिया.

स्टूडेंट्स के लिए कैसे मुफ़ीद होंगे विजेता?

AISA के नीतीश कुमार aajtak.in के साथ बातचीत में कहते हैं, “कैंपस में ऐसा कैंपेन चल रहा था, जो जेएनयू की बेहतरी के लिए कम था. स्टूडेंट्स ने इसको रिजेक्ट किया है. AISA हमेशा से संघर्षों की राजनीति करता रहा है. हर वक़्त स्टूडेंट्स की छोटी-बड़ी समस्याओं में खड़ा रहा है. संघर्ष में जो खड़ा होता है, स्टूडेंट्स उसी को चुनते हैं. हमारी सबसे पहली मांग यही है कि यूजीसी से जो भी फंड आ रहा है, वो जेएनयू के हिस्से में आए.”

वे आगे कहते हैं कि शिक्षा में अमीर और ग़रीब की खाई को तोड़ा जाए, सभी एक समान पढ़ाई कर सकें. जेएनयू अगर पब्लिक यूनिवर्सिटी है, तो सरकार इसके फंड्स में कटौती नहीं करे. इन्फ्रास्ट्रक्चर अच्छा हो, एंट्रेंस मॉडल इन्क्लूसिव हो.

DSF की मुंतेहा फ़ातिमा कहती हैं, “हम JNU की प्रोग्रेसिव फ़ोर्सेज को यूनाइट करेंगे और स्टूडेंट्स के मुद्दों पर मुसलसल लड़ते रहेंगे. हम लोग को मिलकर स्ट्रगल करना है और प्रोग्रेसिव पॉलिटिक्स को पुश करते रहना है. हमें ऐसे समाज की तरफ़ बढ़ना है, जहां पर सभी के हक़ बराबर हों.”

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मुंतेहा फ़ातिमा आगे  कहती हैं, “फीस बढ़ाई जा रही है, स्कॉलरशिप देर से आती है, एंट्रेंस एग्जाम में बदलाव लाया गया, प्राइवेटाइजेशन की कोशिश हो रही है. हमारी कोशिश होगी कि हम इन मुद्दों को लेकर एडमिनिस्ट्रेशन पर दबाव बना सकें. हम नहीं चाहेंगे कि जिस तरह से जामिया मिल्लिया इस्लामिया में स्टूडेंट्स के प्रोटेस्ट को जिस तरह से दबाया जा रहा है, वो यहां भी हो.”

DSF की मनीषा कहती हैं, “हमारी लड़ाई कैंपस और इसके लोकतंत्र को बचाने की होगी. मौजूदा वक़्त में जिस तरह से फ़ासिस्ट ताक़ते मज़बूत होती जा रही हैं, ऐसे वक़्त में स्टूडेंट्स ने सेंट्रल पैनल में दो महिलाओं पर यक़ीन जताया. ये नतीजा जेएनयू के प्रोग्रेसिव होने की बात को पुख़्ता करता है.”

ABVP के वैभव मीणा कहते हैं, “जेएनयू के छात्रों ने कैंपस के मुद्दों पर की गई राजनीति को सपोर्ट किया. स्टूडेंट्स ने इस बार कैंडिडेट्स और विचार को समझा है और मैंडेट दिया है. हम अपने मेनिफेस्टो और वादों पर काम करेंगे, क्योंकि अगले चुनाव में यही हमारा आधार बनेगा. लेफ्ट के स्टडेंट लीडर्स चुनाव जीतने के बाद कैंपस भूल जाते हैं. हम कैंपस के मुद्दों के लिए काम करेंगे.”

लेफ़्ट में दरार की वजह से ABVP के हिस्से आई एक सीट?

जेएनयू में इस बार के छात्रसंघ चुनाव में लेफ़्ट की यूनिटी में दरार देखने को मिली. इसका नतीजा ये रहा कि वामपंथ की सियासत करने वाले छात्र संगठन दो हिस्सों में बंट गए. चुनाव होने से पहले ABVP की तरफ़ से प्रेसिडेंट पद के लिए मैदान में उतरीं शिखा स्वराज ने aajtak.in के साथ बातचीत में कहा था कि लेफ़्ट यूनिटी में दरार से हमें फ़ायदा होगा.

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चुनाव नतीजे आने के बाद ABVP के वैभव मीणा लेफ़्ट में दरार से फ़ायदा मिलने की बात को ख़ारिज करते हैं. वे कहते हैं, “लेफ्ट यूनिटी जैसी कोई चीज़ नहीं होती है, वह एक अवसरवादी अलायंस है. वे लोग इस बार प्रेसिडेंट पोस्ट के लिए दो हिस्सों में आए थे लेकिन ABVP को हराने के लिए वो साथ थे. ABVP के कैंडिडेट्स को हराने के लिए उनका हमेशा अघोषित गठबंधन रहता है. हम लोग अपनी मेहनत से जीतकर आए हैं. उनका गठबंधन हुआ या नहीं हुआ, इससे हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.”

वहीं, मनीषा कहती हैं, “सेंट्रल पैनल में हमने जो एक सीट खोई है, हम इसे एबीवीपी की कामयाबी नहीं मानते हैं, क्योंकि स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज में देखिए तो क़रीब 2300 स्टूडेंट्स के बीच एक भी उनके काउंसलर की जीत नहीं हुई है.”

इसके अलावा, नीतीश कुमार कहते हैं, “लेफ्ट में फूट की वजह से प्रोग्रेसिव वोट बंटे, बिखराव का ही नतीजा रहा कि ABVP का एक कैंडिडेट जीतकर आया. लेकिन हम ये क़तई नहीं भूल सकते कि ABVP एक मज़बूत ताक़त की वजह से इस कैंपस में है. इस बार क्लासरूम के स्पेस में भी ABVP मज़बूत हुआ है.”

कैंपस में महिलाओं के मुद्दे पर मनीषा और मुंतेहा की पैनी नज़र

मुंतेहा फ़ातिमा कहती हैं, “JNU के स्टूडेंट्स वीमेन लीडरशिप के बारे में हमेशा बात करते हैं और स्टूडेंट्स ने सेंट्रल पैनल के लिए दो महिलाओं को चुना है. हम लड़कियां अपने सेक्युलर हक़ों के लिए तो लड़ ही सकते हैं, संविधान ने हमें इसका अधिकार दिया है. कैंपस में फीमेल रिसर्च स्कॉलर्स का रेशियो कम होता जा रहा है. PhD में फीमेल्स को डिप्राइवेशन प्वाइंट्स मिलते थे, इससे बहुत फ़र्क़ पड़ता है, इसके लिए भी हमारी लड़ाई जारी रहेगी.”

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वे आगे कहती हैं कि फ़ीमेल PhD स्कॉलर्स को चौथे-पांचवें साल में सिंगल सीटर रूम मिलता है. हमारी मांग होगी कि मेल स्टूडेंट्स की तरह उन्हें भी दूसरे साल में दिया जाए.

मनीषा कहती हैं, ”महिलाओं की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. रात में लाइब्रेरी से लौटते वक़्त उनके साथ छेड़खानी होती है, ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं.”

मुंतेहा बताती हैं कि कैंपस में लगातार सेक्सुअल हरासमेंट के मामले बढ़ रहे हैं. इससे लड़ने के लिए GSCASH (Gender Sensitization Committee against Sexual Harassment) बॉडी थी, उसको ख़त्म कर दिया गया है, जिसको सुप्रीम कोर्ट ने भी अच्छा माना था. हम GSCASH को बहाल करवाने की भी कोशिश करेंगे.

इन मुद्दों पर लेफ़्ट और ABVP की एक राय

जेएनयू एडमिनिस्ट्रेशन ने कैंपस में चीफ प्रॉक्टर ऑफिस (CPO) मैन्युअल लागू कर रखा है. एडमिनिस्ट्रेश का दावा है कि CPO का मक़सद कैंपस में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियमों और दिशा निर्देशों को लागू करना है. वहीं, विश्विद्यालय के स्टूडेंट्स का आरोप है कि इसके ज़रिए उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है. ग़ौर करने वाली बात है कि कैंपस के अंदर COP मैन्युअल एक ऐसा मुद्दा जिस पर लेफ़्ट और एबीवीपी एक राय रखते हैं.

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AISA के नीतीश कुमार कहते हैं, “मुद्दे तो बहुत सारे हैं, जिस पर कॉमन ग्राउंड हो सकता है, इसमें एक CPO मैन्युअल है, जिसके ज़रिए प्रोटेस्ट करने वाले स्टूडेंट्स पर FIR दर्ज़ कर दी जाती है. ABVP और लेफ़्ट दोनों CPO मैन्युअल के ख़िलाफ़ बोलते हैं लेकिन जब हम प्रोटेस्ट करेंगे और बोलेंगे कि ये नियम RSS-BJP के द्वारा लाया गया है, तो वहां पर ABVP शांत हो जाएगा.”

ABVP के वैभव मीणा कहते हैं, “पिछले साल जब हम (ABVP) धरने पर बैठे तो कार्यकर्ताओं पर क़रीब साढ़े चार लाख रुपए का फ़ाइन आया. हम लोग सिर्फ़ स्टूडेंट्स की आवाज़ उठाने के लिए एडमिन अधिकारियों के पास जाते हैं और हम पर फ़ाइन आ जाता है. ये ग़लत है, ये सारी चीज़ें कैंपस में नहीं होनी चाहिए. छात्रों की आवाज़ के दबाने के लिए एडमिनिस्ट्रेशन जिस तरह से तानाशाही का रवैया अपनाता है, हम उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएंगे. हम CPO मैन्युअल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएंगे और पूरे दम-खम के साथ इसको हटवाएंगे.”

वहीं, DSF की मनीषा कहती हैं, “हम अपने संवैधानिक अधिकार के तहत एडमिनिस्ट्रेशन से बात करने की कोशिश करते हैं. अगर हमारी बातें नहीं सुनी जाती हैं, तो हम प्रोटेस्ट शुरू करते हैं. प्रोटेस्ट को दबाने के लिए CPO मैन्युअल लाया गया, जिसके तहत हम पर फ़ाइन लगाया जाता है और डराने की कोशिश की जाती है. इसलिए हम एडमिन और एबीवीपी के नेक्सस को चैलेंज करते हैं.”

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JNU की पहचान और क्रिटिकल थिंकिंग बचाने में लगे स्टूडेंट लीडर्स…

नीतीश कुमार कहते हैं कि मौजूदा वक़्त में हमें प्रोटेस्ट नहीं करने दिया जा रहा है. अगर यूनिवर्सिटी के अंदर प्रोटेस्ट होता है, तो एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ़ से फ़ाइन आ जाता है. डायलॉग के स्पेसेज़ कम किए जा रहे हैं. JNU का आइडिया है कि गांव के मज़दूर का लड़का, दिल्ली की अमीर घर से आई हुई लड़की से ढाबे पर आकर कॉन्फिडेंस के साथ बात कर पाता है. सरकार नहीं चाहती है कि ये हो सके और एक-दूसरे में ट्रस्ट बढ़ पाए. जेएनयू यही बेहतर करने की कोशिश हमेशा से करता रहा है. हमारी कोशिश होगी कि ये सब बरक़रार रहे.

वैभव मीणा कहते हैं, “जेएनयू अपनी बौद्धिकता के लिए जाना जाता है और आगे भी जाना जाता रहेगा. हम उसको बचाने के लिए काम करेंगे. कैंपस में कई तरह की Talk हुआ करती थीं, उसको फिर से शुरू करवाने की कोशिश करेंगे. जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अंबेडकर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जैसे देश के तमाम संस्थानों में अगर स्टूडेंट्स लोकतांत्रिक तरीक़े से अपनी मांग रखेंगे और एडमिनिस्ट्रेशन उनकी आवाज़ों को दबाने की कोशिश करेगा, तो ABVP हमेशा छात्रों के साथ खड़ा नज़र आएगा. इन सभी विश्वविद्यालयों में ABVP की यूनिट ऐसे मौक़ों पर खड़ी रही है और आगे भी खड़ी रहेगी.”

वैभव आगे कहते हैं, “हम ये भी तय करेंगे कि कैंपस में इंटेलेक्चुअलिटी के नाम पर देश विरोधी गतिविधियां न हों. हम कोशिश करेंगे कि देश को तोड़ने वाली राजनीति यहां से खत्म हो.”

मनीषा कहती हैं, “UAPA जैसे क़ानून के ज़रिए उमर ख़ालिद और शरजील इमाम जैसे लोगों को प्रोटेस्ट की वजह से जेल में बंद करके रखा गया है. हम इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं. हमारी मांग रहेगी कि हर तरह के पॉलिटिकल प्रिजनर्स को रिहा किया जाना चाहिए.”

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