भारत के Andaman and Nicobar Islands में रहने वाली जारवा जनजाति दुनिया की सबसे अलग-थलग रहने वाली जनजातियों में से एक मानी जाती है. इनके बारे में अक्सर कहा जाता है कि ये बाहरी लोगों को देखते ही हमला कर देते हैं, लेकिन इसके पीछे भी एक खास वजह है. जारवा जनजाति हजारों सालों से अंडमान के जंगलों में रह रही है. ये लोग आज भी अपनी पारंपरिक जीवनशैली अपनाए हुए हैं और आधुनिक दुनिया से दूरी बनाकर रखते हैं. इनकी आबादी बहुत कम है और ये शिकार, मछली पकड़ने और जंगल के फल-फूल पर निर्भर रहते हैं.
बाहर के लोगों पर नहीं करते भरोसा
जारवा लोग बिना वजह हिंसक नहीं होते, बल्कि वे अपने क्षेत्र और जीवन की रक्षा के लिए ऐसा करते हैं. ये लोग बाहरी दुनिया पर भरोसा नहीं करते. पहले बाहरी लोगों के संपर्क से बीमारियां और खतरे बढ़े थे. इसलिए वे अपने इलाके में आने वाले अजनबियों को खतरा मानते हैं. अपनी सुरक्षा के लिए वे तीर-कमान से हमला भी कर सकते हैं. भारत सरकार जारवा जनजाति की सुरक्षा और उनकी संस्कृति को बचाने के लिए उनके क्षेत्र में आम लोगों के जाने पर सख्त रोक लगाती है. इससे उनकी पारंपरिक जीवनशैली और अस्तित्व सुरक्षित रहता है. जारवा लोग दूसरे लोगों को देखकर बिना कारण नहीं मारते, बल्कि वे अपनी सुरक्षा और अपनी जमीन की रक्षा के लिए ऐसा करते हैं. वे बाहरी दुनिया से दूर रहकर अपने तरीके से जीवन जीना चाहते हैं.
धनुष-बाण से शिकार करते हैं जारवा लोग
जारवा लोग अंडमान द्वीप के घने जंगलों में रहते हैं. ये ज्यादातर दक्षिण और मध्य अंडमान के इलाकों में पाए जाते हैं. ये शिकार और जंगल से मिलने वाले फल-फूल पर निर्भर रहते हैं. धनुष-बाण से शिकार करना इनकी मुख्य पहचान है.जारवा लोग भारत की एक बेहद प्राचीन और अलग-थलग रहने वाली जनजाति हैं. ये मुख्य रूप से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के जंगलों में रहते हैं और बाहरी दुनिया से बहुत कम संपर्क रखते हैं. ये आधुनिक जीवन से दूर पारंपरिक तरीके से जीवन जीते हैं. सरकार ने इनके क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया है, ताकि उनकी संस्कृति सुरक्षित रह सके. जारवा जनजाति की आबादी बहुत कम है, करीब 400–500 लोगों के आसपास मानी जाती है.
हजारों साल पुरानी जनजाति
जारवा जनजाति को दुनिया की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक माना जाता है. माना जाता है कि इनके पूर्वज हजारों साल पहले अफ्रीका से आए थे और तब से ये द्वीपों में ही रह रहे हैं. इनकी संस्कृति और परंपराएं आज भी काफी हद तक वैसी ही हैं.
जीवनशैली और खान-पान
जारवा लोगों की जीवनशैली पूरी तरह जंगल पर निर्भर है. ये शिकार करके और जंगल से मिलने वाले फल-फूल खाकर जीवन बिताते हैं. धनुष-बाण से शिकार करना इनकी मुख्य पहचान है. ये मछली पकड़ना, जंगली जानवरों का शिकार करना और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना जानते हैं. ये आधुनिक कपड़े या तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते.
क्यों है खास यह जनजाति
जारवा जनजाति भारत की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है. उनकी अलग जीवनशैली, परंपराएं और प्रकृति के साथ सामंजस्य उन्हें दुनिया की अनोखी जनजातियों में शामिल करती है.
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