आज ही अयातुल्ला रुहुल्लाह खुमैनी लौटे थे ईरान, इस्लामिक क्रांति की जीत का मना था जश्न

आज ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ लोगों में आक्रोश फैला हुआ है. लोग सड़कों पर उतरकर सुप्रीम लीडर खामेनेई को शासन से हटाने की मांग कर रहे हैं. जबकि, आज से करीब 47 साल पहले इसी इस्लामिक गणराज्य के लिए वहां क्रांति हुई. इस क्रांति के जनक अयातुल्ला रहुल्लाह खुमैनी आज ही के दिन 1 फरवरी, 1979 को 15 साल के निर्वासन के बाद ईरान लौटे थे.

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आज ही ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी वापस लौटे थे (Photo - AP) आज ही ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी वापस लौटे थे (Photo - AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:54 AM IST

आज का दिन ईरान के इतिहास के लिए काफी महत्वपूर्ण है. क्योंकि, आज ईरान में जिस इस्लामिक गणराज्य और वहां के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के खिलाफ लोगों में उबाल है. कभी इसी इस्लामिक गणराज्य की स्थापना और इस्लामिक क्रांति की जीत का जश्न मनाया गया था. आज ही वो दिन है जब इस्लामिक क्रांति के बाद उसके जनक और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रुहुल्लाह खुमैनी की ईरान वापसी हुई थी. अली खामेनेई उन्हीं के उत्तराधिकारी हैं.

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अयातुल्ला खुमैनी 1 फरवरी, 1979 को 15 साल के निर्वासन के बाद ईरान लौटे थे. इनके लौटने से दो सप्ताह पहले ही शाह और उनका परिवार देश छोड़कर भाग गए थे. इसके बाद उत्साहित ईरानी क्रांतिकारी खुमैनी के नेतृत्व में एक कट्टरपंथी इस्लामी सरकार स्थापित करने के लिए आगे बढ़े थे. 

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में जन्मे रुहोल्लाह खुमैनी एक इस्लामी विद्वान के पुत्र थे.वे शिया थे, जो ईरानियों की बहुसंख्यक आबादी द्वारा पालन की जाने वाली इस्लाम की शाखा है. और जल्द ही उन्होंने क़ोम शहर में शिया इस्लाम के औपचारिक अध्ययन में अपना जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया. एक धर्मनिष्ठ धर्मगुरु के रूप में, वे शिया समुदाय में लगातार आगे बढ़ते गए और उन्होंने अनेक शिष्य बना लिए. 

1941 में, ब्रिटिश और सोवियत सेनाओं ने ईरान पर कब्ज़ा कर लिया और मोहम्मद रजा पहलवी को ईरान का दूसरा आधुनिक शाह बनाया. नए शाह के पश्चिमी देशों से घनिष्ठ संबंध थे और 1953 में ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंटों ने उनके एक लोकप्रिय राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को सत्ता से हटाने में उनकी मदद की. मोहम्मद रजा ने कई पश्चिमी विचारों को अपनाया और 1963 में अपनी "श्वेत क्रांति" शुरू की, जो एक व्यापक सरकारी कार्यक्रम था, जिसमें भूमि पुनर्वितरण के नाम पर धार्मिक जागीरों को कम करने, महिलाओं के लिए समान अधिकार और अन्य आधुनिक सुधारों की मांग की गई थी.

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1964 में ईरान से किया गया था निष्कासित
खुमैनी, जिन्हें शिया धर्म की उच्च उपाधि "अयातुल्लाह" से जाना जाता था, शाह के पश्चिमीकरण कार्यक्रम की खुलेआम निंदा करने वाले पहले धार्मिक नेता थे. क़ोम स्थित अपने फाजिये मदरसे से भेजे गए जोशीले संदेशों में, खोमैनी ने शाह को उखाड़ फेंकने और एक इस्लामी राज्य की स्थापना का आह्वान किया. 1963 में मोहम्मद रजा ने उन्हें कैद कर लिया, जिसके कारण दंगे भड़क उठे, और 4 नवंबर 1964 को उन्हें ईरान से निष्कासित कर दिया गया.

खुमैनी इराक की सीमा के पार स्थित शियाओं के पवित्र शहर अन नजफ में बस गए और अपने उपदेशों की रिकॉर्डिंग भेजते रहे, जिनसे उनके छात्र और अनुयायी लगातार प्रेरित होते रहे. सरकार में मौलवियों की भागीदारी को हतोत्साहित करने वाली परंपरा को तोड़ते हुए, उन्होंने ईरान पर शासन करने के लिए शिया नेताओं का आह्वान किया.

1970 के दशक में, मोहम्मद रजा ने पूर्व-इस्लामी फारसी राजशाही की 2,500वीं वर्षगांठ का भव्य समारोह आयोजित करके और इस्लामी कैलेंडर को फारसी कैलेंडर से बदलकर ईरान में इस्लामी कट्टरपंथियों को और भी अधिक क्रोधित कर दिया. इससे खुमैनी के लिए समर्थन बढ़ता गया. 1978 में, ईरान के प्रमुख शहरों में शाह विरोधी व्यापक प्रदर्शन हुए. निम्न और मध्यम वर्ग के असंतुष्ट सदस्यों ने कट्टरपंथी छात्रों का साथ दिया और खुमैनी ने शाह को तत्काल सत्ता से हटाने का आह्वान किया. दिसंबर में सेना ने विद्रोह कर दिया और 16 जनवरी, 1979 को शाह भाग गया.

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1 फरवरी 1979 को खुमैनी विजयी होकर तेहरान पहुंचे और उन्हें ईरानी क्रांति के नेता के रूप में सम्मानित किया गया. धार्मिक उत्साह चरम पर था, उन्होंने अपनी सत्ता को मजबूत किया और ईरान को एक धार्मिक राज्य में बदलने का प्रयास किया. 4 नवंबर 1979 को, उनके निर्वासन की 15वीं वर्षगांठ पर, छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और कर्मचारियों को बंधक बना लिया. खुमैनी की सहमति से, कट्टरपंथियों ने शाह की ईरान वापसी की मांग की और  52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा. शाह की जुलाई 1980 में मिस्र में कैंसर से मृत्यु हो गई.

दिसंबर 1979 में, एक नए ईरानी संविधान को मंजूरी दी गई, जिसमें खुमैनी को ईरान का आजीवन राजनीतिक और धार्मिक नेता नामित किया गया. उनके शासनकाल में, ईरानी महिलाओं को समान अधिकारों से वंचित कर दिया गया और उन्हें बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया. पश्चिमी संस्कृति पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और पारंपरिक इस्लामी कानून और उसके अक्सर क्रूर दंडों को फिर से लागू कर दिया गया. विपक्ष को दबाने में, खोमेनी शाह की तरह ही निर्दयी साबित हुए, और उनके एक दशक के शासनकाल के दौरान हजारों राजनीतिक असंतुषों को फांसी दे दी गई.

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1980 में, इराक ने ईरान के तेल उत्पादक प्रांत खुज़ेस्तान पर आक्रमण किया. शुरुआती बढ़त के बाद, इराकी आक्रमण को विफल कर दिया गया. 1982 में, इराक स्वेच्छा से पीछे हट गया और शांति समझौते की मांग की, लेकिन खुमैनी ने फिर से लड़ाई शुरू कर दी. इसके बाद गतिरोध बना रहा और इराक में हजारों युवा ईरानी सैनिकों की मौत हुई. 1988 में, खुमैनी अंततः संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के लिए सहमत हो गए.

3 जून 1989 को अयातुल्ला खुमैनी के निधन के बाद, उनके अंतिम संस्कार में 20 लाख से अधिक शोक संतप्त लोग शामिल हुए. अली खामेनेई सर्वोच्च नेता बने. 1990 के दशक की शुरुआत में ईरान में धीरे-धीरे लोकतंत्रीकरण शुरू हुआ. 1997 में हुए स्वतंत्र चुनाव में हुआ, जिसमें उदारवादी सुधारवादी मोहम्मद खातमी राष्ट्रपति चुने गए.

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