आज के दौर में सोशल मीडिया सिर्फ छुट्टियां मनाने या जिम की तस्वीरें डालने की जगह नहीं रह गया है. अब आपकी टाइमलाइन नई नौकरी की घोषणाओं, सर्टिफिकेट्स और प्रोजेक्ट की कामयाबी से भरी रहती है. इसने कामकाजी जीवन को एक 'पब्लिक डिस्प्ले' बना दिया है.
जेन ज़ी (Gen Z) के लिए इस बदलाव ने एक नई तरह की घबराहट को जन्म दिया है, जिसे 'करियर फोमो' कहा जा रहा है. यह अपनी प्रोफेशनल लाइफ में दूसरों से पीछे छूट जाने का डर है. अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वाकई जेन-जी एक दूसरे की तरक्की को देखकर जलन महसूस करते हैं या अपनी तुलना दूसरों से करते हैं.
क्या है करियर फोमो?
मनोवैज्ञानिक रूप से इसे दूसरों की उपलब्धियों को ऑनलाइन देखकर होने वाली प्रतिक्रिया के रूप में समझा जा सकता है. इससे युवाओं में तुलना, आत्म-संदेह और 'सबसे आगे निकलने' की जल्दबाजी पैदा होती है. इसके लक्षण अक्सर बिना सोचे-समझे नौकरी बदलना, बहुत ज्यादा काम करना या बिना किसी दिशा के सिर्फ नए कोर्स करते रहने के रूप में सामने आते हैं. इसके मूल में बस एक ही डर है कि क्या मैं काफी कर रहा हूं?
रिसर्च क्या कहती है?
एक अध्ययन के अनुसार, लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म्स का डिजाइन ही तनाव बढ़ाता है. लाइक्स, एंडोर्समेंट और प्रोफाइल व्यूज जैसे आंकड़े युवाओं को लगातार अपना मूल्यांकन करने पर मजबूर करते हैं. लोग न केवल अपनी प्रोफाइल, बल्कि अपनी पूरी पहचान को एक 'परफेक्ट प्रोफेशनल' की तरह पेश करने के दबाव में रहते हैं. इससे अक्सर 'इम्पोस्टर सिंड्रोम' और कम आत्मसम्मान जैसी समस्याएं पैदा होती हैं.
Gen Z की जुबानी: 'क्या मैं पीछे रह गई?'
निशिता सिन्हा (24 वर्ष), टीचर का कहना है मुझे कई बार करियर फोमो होता है. मेरी एक दोस्त ने हाल ही में अपनी एकेडमी खोली है. मैं भी वही चाहती थी, लेकिन अभी भी किसी और के यहाँ काम कर रही हूँ. उसकी सफलता मुझे खुद पर शक करने पर मजबूर कर देती है."
सौम्या सिंह (23 वर्ष), पेशे से पत्रकार हैं. वो कहती हैं कि दूसरों की उपलब्धियां देखकर ऐसा लगता है जैसे मैं कुछ बड़ा मिस कर रही हूं. यह जलन नहीं, बल्कि एक तरह की असफलता का अहसास है. कीर्ति गुप्ता (21 वर्ष) का कहना है कि मैंने तो लिंक्डइन खोलना ही बंद कर दिया है. नौकरी होने के बावजूद दूसरों की पोस्ट देखकर ऐसा लगता है जैसे मैं कुछ नहीं कर रही.
क्या यह सच में बीमारी है?
करियर काउंसलर भावना भारद्वाज का मानना है कि इसे सिर्फ फोमो (FOMO) कहना गलत होगा. वह कहती हैं कि आज की पीढ़ी बहुत जागरूक है और सोच-समझकर फैसले लेती है. हालांकि, वे हर चीज 'फास्ट ट्रैक' पर चाहते है यानी जल्द परिणाम और जल्द सफलता. उनके अनुसार, इसका समाधान लगातार सीखने और धैर्य रखने में है.
वहीं करियर काउंसलर प्रीथा अजीत कहती हैं कि हमें यह स्वीकार करना होगा कि कोई भी परफेक्ट नहीं है. हर व्यक्ति की क्षमता और परिस्थितियां अलग होती हैं.
वैसे करियर फोमो इस बात का आईना है कि आज की दुनिया में सफलता को कैसे देखा और दिखाया जाता है. सोशल मीडिया पर हमें सिर्फ माइल स्टोन दिखते हैं, उसके पीछे का संघर्ष और अनिश्चितता नहीं. Gen Z के लिए चुनौती यही है कि वे अपनी महत्वाकांक्षा और धैर्य के बीच संतुलन बनाएं और यह समझें कि करियर का विकास कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं होता.
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