क्या आपने कभी सुना है कि किसी देश का राष्ट्रपति अपने ही कैबिनेट के मंत्रियों को नियुक्त न कर पाए? ईरान में इस वक्त यही हो रहा है. मिडिल ईस्ट में जारी भीषण जंग के बीच, तेहरान की गलियों से जो खबरें आ रही हैं, वे किसी 'पॉलिटिकल थ्रिलर' से कम नहीं हैं. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान एक तरफ हैं और दूसरी तरफ है इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) एक ऐसी सेना, जो सेना से कहीं बढ़कर है. आखिर क्या है इस मिलिट्री काउंसिल का पावर गेम जिसने राष्ट्रपति को सिर्फ एक चेहरा बनाकर रख दिया है? कैसे होती है इसमें नियुक्ति, क्या है जरूरी योग्यताएं?
IRGC vs आर्टेश: ये हैं ईरान की दो सेनाओं का गणित
ईरान में रक्षा का ढांचा दुनिया के बाकी देशों से अलग है. यहां दो स्वतंत्र सेनाएं काम करती हैं. आर्टेश पारंपरिक सेना है जिसका काम सरहदों की रक्षा करना है.
दूसरी है IRGC (रेवोल्यूशनरी गार्ड) जो 1979 की क्रांति के बाद बनी है. ये फोर्स 'सुप्रीम लीडर' की ढाल है. इसका काम देश की सीमाओं से ज्यादा 'इस्लामिक विचारधारा' को बचाना है. आज IRGC न सिर्फ सेना है, बल्कि ईरान की सबसे बड़ी बिजनेस टाइकून और राजनीतिक ताकत भी है.
क्या है भर्ती का प्रोसेस
IRGC में शामिल होना ईरान के युवाओं के लिए रसूख का रास्ता है लेकिन इसमें भर्ती होना आसान नहीं.
बसीज का नेटवर्क: IRGC अपनी ज्यादातर भर्तियां 'बसीज' (स्वयंसेवक बल) से करती है. जो युवा बचपन से ही इस वैचारिक ढांचे में ढले होते हैं, उन्हें प्राथमिकता मिलती है.
आइडियोलॉजिकल स्क्रीनिंग: शारीरिक फिटनेस के साथ-साथ उम्मीदवार की 'सुप्रीम लीडर' और इस्लामिक क्रांति के प्रति वफादारी का कड़ा टेस्ट होता है.
करियर के फायदे: इसके सदस्यों को समाज में विशेष रियायतें, हाउसिंग और रिटायरमेंट के बाद सरकारी तेल और निर्माण कंपनियों में बड़े पदों पर नियुक्त किया जाता है.
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समझिए 'पॉलिटिकल डेडलॉक' का नया संकट
ताजा मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान में एक 'मिलिट्री काउंसिल' सक्रिय हो गई है. अधिकारों का हनन की बात करें तो राष्ट्रपति पेजेशकियान की तरफ से प्रस्तावित खुफिया मंत्री और अन्य अहम पदों के नामों को IRGC के कमांडर अहमद वहीदी ने खारिज कर दिया है. वजह यह है कि IRGC का मानना है कि युद्ध जैसे हालात में सुरक्षा तंत्र पर सिर्फ उनका कब्जा होना चाहिए.
समझिए IRGC का पावर पिरामिड
यह सीधे 'सुप्रीम लीडर' अयातुल्ला अली खामेनेई को रिपोर्ट करती है.
कुद्स फोर्स का काम ईरान की सीमाओं के बाहर (जैसे लेबनान, सीरिया, यमन) प्रभाव बढ़ाना है.
आर्थिक रसूख की बात करें तो ईरान की जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा IRGC के नियंत्रण वाली कंपनियों से आता है.
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