स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दो देशों के बीच, फिर ईरान की दादागिरी ही क्यों चलती है? सेना-हथियार जानिए किसके पास कितने

इन दिनों स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे ज्यादा चर्चा में है. ईरान के लिए यह हुकूम का इक्का साबित हो रहा है. हालांकि, इस समुद्री रास्ते पर ईरान के अलावा ओमान का भी हक है. फिर भी होर्मुज पर ईरान का दबदबा ज्यादा है और अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद ईरान ने इसे लगभग बंद कर रखा है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर उस 'चोक पॉइंट' पर ईरान का पलड़ा भारी क्यों है.

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 स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर है ईरान का पलड़ा भारी (Photo - AP) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर है ईरान का पलड़ा भारी (Photo - AP)

सिद्धार्थ भदौरिया

  • नई दिल्ली,
  • 27 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 4:05 PM IST

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग चार सप्ताह से बाधित है. इस वजह से पूरी दुनिया में तेल-गैस को लेकर अफरा-तफरी मची हुई है. जबकि, संकरे समुद्री रास्ते पर सिर्फ ईरान का हक नहीं है. यह समुद्री मार्ग ईरान और ओमान के जलक्षेत्र के बीच बंटा हुआ है. यानी इस पर ओमान और ईरान दोनों का एक समान रूप से अधिकार है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दोनों देश अपनी तटरेखा से 12 समुद्री मील तक स्थानीय समुद्री जलक्षेत्र पर नियंत्रण रखते हैं.  फिर भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का ज्यादा प्रभाव है. इसकी कई वजहें हैं, लेकिन प्रमुख कारण ईरान की सैन्य ताकत का ओमान से ज्यादा प्रभावी और शक्तिशाली होना है. 

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ईरान की सैन्य शक्ति ओमान से कहीं ज्यादा 
ग्लोबल मिलिट्री नेट की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान वैश्विक सैन्य सूचकांक में 13वें स्थान पर है. सैन्य रूप से इसकी स्थिति ओमान से कहीं अधिक मजबूत है. क्योंकि ओमान इस इंडेक्स में 54वें पायदान पर आता है.ईरान के पास 650,000 सक्रिय सैनिक हैं, जबकि ओमान के पास 47,000 हैं, जो ओमान के सैनिकों की संख्या से 14 गुना अधिक है. ईरान के पास 350,000 रिजर्व सैनिक और 40,000 अर्धसैनिक बल हैं. 

ईरान रक्षा पर 8 अरब डॉलर खर्च करता है, जबकि ओमान 6 अरब डॉलर खर्च करता है. वायु सेना में, ईरान के पास 627 विमान हैं, जिनमें 286 लड़ाकू जेट शामिल हैं, जबकि ओमान के पास 126 विमान हैं, जिनमें 35 लड़ाकू विमान शामिल हैं. वहीं अगर समुद्री बेड़े की बात करें तो ईरान के पास 97 जहाज हैं, जबकि ओमान के पास 21 जहाज हैं. इसमें भी ईरान के पास 6 पनडुब्बियां शामिल हैं और ओमान के पास कोई सबमरीन नहीं है.  ईरान और ओमान की सैन्य शक्ति की तुलना से साफ है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का प्रभाव ज्यादा क्यों हैं. अब बारी आती है उन दूसरे पक्षों की जो ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर और भी ज्यादा प्रभावी बनाता है.  

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चोकपॉइंट पर ताक लगाए बैठा है ईरान
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक,  स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर कई मायनों में ईरान का पलड़ा भारी है. इसमें ईरान की भौगोलिक स्थिति इसके पक्ष में है. शिपिंग एनालिटिक्स फर्म वोर्टेक्सा के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अपने सबसे संकरे बिंदु पर लगभग 24 मील चौड़ा है और लगभग सारा यातायात दो मुख्य शिपिंग लेन से होकर गुजरता है जो इससे भी अधिक संकरी हैं. 

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज (आईआईएसएस) में नौसेना बलों और समुद्री सुरक्षा के सीनियर फेलो निक चाइल्ड्स बताते हैं कि इसे चोकपॉइंट कहना एक सही कारण है. दुनिया भर में ऐसे कई चोकपॉइंट हैं. लेकिन आप यह तर्क दे सकते हैं कि यह एक अनूठा और चुनौतीपूर्ण चोकपॉइंट है, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं हैं. 

रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट थिंक टैंक के जर्नल संपादक केविन रोलैंड्स ने कहा कि खुले महासागर में मार्ग बदलने का विकल्प हमेशा मौजूद होता है, लेकिन किसी संकरे मार्ग या संकीर्ण समुद्र में यह विकल्प असंभव है. इसका मतलब यह है कि ईरान को अपने लक्ष्यों को ढूंढने की जरूरत नहीं है. वह बैठकर इंतजार कर सकता है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के किनारे है ईरान की 1,000 मील लंबी तटरेखा
उन्होंने कहा कि इससे प्रभावी रूप से एक 'किल जोन' बन जाता है, जिसमें हमले की चेतावनी का समय कुछ ही सेकंड का हो सकता है. इसके अलावा, ईरान के पास लगभग 1,000 मील लंबी तटरेखा है, जहां से वह जहाज-रोधी मिसाइलें दाग सकता है. ये मिसाइल बैटरियां हमेशा एक्टिव रहती हैं, जिससे इन्हें नष्ट करना कठिन हो जाता है और खाड़ी की लंबी तटरेखा का मतलब है कि ईरान होर्मुज पर काफी दूर तक हमला कर सकता है.

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ब्रिटेन की रॉयल नेवी स्ट्रेटेजिक स्टडीज सेंटर के पूर्व प्रमुख रोलैंड्स ने सीएनएन को बताया कि उत्तरी, ईरानी हिस्से में समतल मैदान नहीं है. वहां पहाड़ियां, पर्वत, घाटियां, शहरी क्षेत्र और अपतटीय द्वीप हैं. इन सभी के कारण आने वाले खतरे का पता लगाना अधिक कठिन हो जाता है और ईरान के लिए मोबाइल हथियार प्रणालियों को छिपाना आसान हो जाता है. 

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रोलैंड्स के अनुसार, जटिल खतरों का मतलब यह है कि जहाजों को एस्कॉर्ट करने के लिए किसी भी ऑपरेशन को संभवतः टैंकरों के आगे और पीछे यात्रा करने वाले युद्धपोतों के पारंपरिक काफिले से कहीं आगे जाने की आवश्यकता होगी. उन्होंने कहा कि यह अधिक संभावना है कि नौसैनिक अभियान में उपग्रहों, गश्ती विमानों और हवाई ड्रोनों से निगरानी सहित बहुस्तरीय रक्षा रणनीति अपनाई जाए. जहाज एक विशिष्ट मार्ग अपना सकते हैं जिसे बारूदी सुरंगों से मुक्त कर दिया गया हो.

ईरान को अपनी भौगोलिक स्थिति का ऐसे मिलेगा फायदा
इसके अलावा भी ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अन्य नौसैनिक शक्तियों से ज्यादा मजबूत इसलिए है, क्योंकि इसके अपरंपरागत युद्ध तरीकों, जिनमें सस्ते ड्रोन और समुद्री माइंस शामिल हैं.इसकी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाते हुए किसी भी जहाज या युद्धपोत पर सटीक हमला कर सकते हैं और अमेरिका या अन्य देशों के लिए जहाजों की रक्षा करना या उस चोकपॉइंट से जहाजों को सैन्य रूप से सुरक्षित करना कठिन हो जाता है.

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चाइल्ड्स ने कहा कि अमेरिका ईरान की कई पारंपरिक नौसैनिक क्षमताओं को कमजोर करने में कामयाब रहा है. लेकिन सबसे बड़ा खतरा अभी भी ईरान के गैर-पारंपरिक हथियारों से है, जैसे ड्रोन, तेज गति से हमला करने वाले छोटे जहाज और यहां तक ​​कि विस्फोटकों से भरी मानवरहित नौकाएं. अगर ईरान बारूदी सुरंगें बिछाने का फैसला करते हैं, तो उन्हें एक साधारण सी दिखने वाली नाव  से भी फेंका जा सकता है.हालांकि अमेरिका ने ईरान की प्रमुख पनडुब्बियों का संभवतः हिसाब लगा लिया है, फिर भी संभवतः 'छोटी पनडुब्बियों' के बारे में सोचना बाकी है.

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ईरान ने फारस की खाड़ी में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास और ओमान की खाड़ी में कम से कम 19 जहाजों पर हमला किया है. ब्रिटेन, फ्रांस और बहरीन सहित अमेरिका के सहयोगी देश भी जलमार्ग में अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी की सुरक्षा के लिए प्लानिंग कर रहे हैं, लेकिन यह आसान नहीं होगा.

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