नोएडा के बहुचर्चित रंगदारी और धमकी केस में सत्र न्यायाधीश गौतमबुद्धनगर अतुल श्रीवास्तव की अदालत ने आरोपी गैंगस्टर रवि काना को अग्रिम जमानत दे दी है. अदालत ने 35 हजार रुपS के निजी मुचलके और एक जमानती की शर्त पर गिरफ्तारी की स्थिति में रिहाई का आदेश पारित किया. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आरोपी 7 दिन के भीतर विवेचक के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करे.
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी किसी भी गवाह को प्रभावित न करे और न्यायालय की अनुमति के बिना देश न छोड़े. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि बहस के समय किसी प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी करना उचित नहीं है. गैंगस्टर रवि काना के अधिवक्ता द्वारा पुलिस आयुक्त के खिलाफ की गई टिप्पणी अपमानजनक है और तर्क रखते समय ऐसी बातों से बचना चाहिए.
अभियोजन के मुताबिक, वादी शैलेन्द्र शर्मा ने 14 जनवरी 2026 को सेक्टर-63 कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई थी. उन्होंने बताया कि सेक्टर-63 में रिनोक्स ग्रुप के नाम से उनका कार्यालय है और वह बिल्डर का कार्य करते हैं. शिकायत में कहा गया है कि सह आरोपी पंकज पाराशर साल 2021 से 2024 के बीच उनके प्रोजेक्ट्स की वीडियो बनवाकर वायरल करने और बंद कराने की धमकी देता रहा.
वादी का आरोप है कि दबाव में आकर उन्होंने अलग-अलग माध्यमों से करीब 20 लाख रुपए दिए. 14 अगस्त 2023 को 10 लाख रुपए, 20 अक्तूबर 2023 को 11.96 लाख रुपए और 8 जनवरी 2024 को 1.12 लाख रुपए आरटीजीएस और एनईएफटी के जरिए रेनबो मीडिया के खाते में ट्रांसफर किए गए. इसके अलावा पांच लाख रुपए नकद देने, 23 कंप्यूटर और दो लैपटॉप खरीदवाने का भी जिक्र है.
शिकायत में यह भी आरोप है कि पंकज पाराशर के कहने पर रवि काना ने कई बार जान से मारने की धमकी दी. जिला शासकीय अधिवक्ता ब्रह्मजीत भाटी ने अग्रिम जमानत का विरोध किया. उन्होंने कहा कि आरोपी आदतन अपराधी है और उसके खिलाफ पहले भी कई मुकदमे दर्ज हैं. वादी द्वारा दी गई धनराशि के बैंक स्टेटमेंट और अन्य दस्तावेज विवेचना में शामिल हैं.
अभियोजन ने यह भी दलील दी कि अग्रिम जमानत आवेदन के समर्थन में शपथ पत्र दाखिल नहीं किया गया, जबकि आवेदन पर आरोपी के हस्ताक्षर हैं. उन्होंने जमानत याचिका खारिज करने की मांग की. आरोपी के अधिवक्ता ललित मोहन गुप्ता ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल की नोएडा पुलिस आयुक्त से व्यक्तिगत रंजिश है और उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाया गया है.
उन्होंने कहा कि आरोपी ने न तो कोई रंगदारी मांगी और न ही जान से मारने की धमकी दी. बचाव पक्ष का दावा है कि आरोपी को स्वयं अपनी जान का खतरा है. उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ भय में डालने का स्पष्ट आरोप नहीं है. अन्य धाराएं साधारण प्रकृति की प्रतीत होती हैं.
सत्र अदालत से राहत मिलने के बाद नोएडा पुलिस अब इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है. सूत्रों के अनुसार अभियोजन अधिकारियों से परामर्श लिया जा रहा है और अग्रिम जमानत निरस्त कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने बी-वारंट के बावजूद आरोपी को जेल से छोड़े जाने के आरोप पर स्पष्टीकरण तलब किया था.
अरुण त्यागी