एंटीलिया विस्फोटक मामले में आरोपी पूर्व मुंबई पुलिस अधिकारी रियाज़ुद्दीन काज़ी की बर्खास्तगी को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने अहम टिप्पणी की है. सोमवार को अदालत ने कहा कि वह पहले बर्खास्तगी के आदेश को विस्तार से देखेगी. अदालत यह भी जांच करेगी कि क्या सभी कानूनी मानकों का पालन किया गया था या नहीं. काज़ी 2021 के एंटीलिया बम धमकी मामले में आरोपी बनाए गए हैं, जिसकी जांच एनआईए कर रही है. कोर्ट ने साफ किया कि मामले में जल्दबाजी नहीं की जाएगी. अब पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण किया जाएगा. इसके बाद ही आगे का फैसला होगा.
इस बेंच ने की सुनवाई
इस मामले की सुनवाई जस्टिस एम.एस. कर्णिक और जस्टिस एस.एम. मोडक की खंडपीठ ने की. यह बेंच काज़ी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. काज़ी उस समय मुंबई पुलिस की क्रिमिनल इंटेलिजेंस यूनिट में असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे. 12 अप्रैल 2021 को उन्हें निलंबित किया गया था. इसके बाद मई 2021 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. अब उन्होंने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी है. अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं.
क्या था एंटीलिया बम कांड?
2021 में उद्योगपति मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) के घर ‘एंटीलिया’ के बाहर जिलेटिन की छड़ें मिली थीं. इस घटना से पूरे मुंबई शहर में सनसनी फैल गई थी. बाद में इस मामले में कई पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया था. इसी दौरान कारोबारी मनसुख हिरेन की संदिग्ध मौत भी सामने आई. इन दोनों घटनाओं की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी गई थी. काज़ी भी इसी केस में आरोपी बनाए गए. फिलहाल, मामला ट्रायल स्टेज पर है.
महाराष्ट्र प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का फैसला
काज़ी की बर्खास्तगी को पहले महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण (MAT) में चुनौती दी गई थी. 19 सितंबर 2025 को MAT ने राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराया. ट्रिब्यूनल ने माना कि सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) का सहारा लेकर सही कदम उठाया. यानी बिना विभागीय जांच के बर्खास्तगी को जायज बताया गया. इसके बाद काज़ी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब हाईकोर्ट इस आदेश की समीक्षा कर रहा है.
क्या है अनुच्छेद 311(2)(b)
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311(2)(b) एक अपवाद प्रावधान है. सामान्य तौर पर किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले विभागीय जांच जरूरी होती है. लेकिन इस अनुच्छेद के तहत विशेष परिस्थितियों में बिना जांच के भी कार्रवाई की जा सकती है. राज्य ने इसी प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए काज़ी को सेवा से हटाया था. MAT ने भी इसे उचित ठहराया था। अब हाईकोर्ट यह देखेगा कि क्या इस प्रावधान का इस्तेमाल सही तरीके से हुआ.
काज़ी की याचिका में क्या मांग?
पूर्व पुलिस अधिकारी काज़ी की ओर से अधिवक्ता दिव्या शेट्टी ने याचिका दायर की है. इसमें मांग की गई है कि मामले को दोबारा अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास भेजा जाए। साथ ही काज़ी के खिलाफ औपचारिक आरोपपत्र (चार्जशीट) जारी कर विभागीय जांच कराई जाए. उनका कहना है कि बिना सुनवाई का मौका दिए बर्खास्त करना गलत है. वे चाहते हैं कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिले. अदालत से इसी राहत की मांग की गई है.
बचाव पक्ष की दलीलें
काज़ी की ओर से अधिवक्ता रविंद्रनाथ शेट्टी ने कोर्ट में कहा कि जब मामला सामने आया तो सभी आरोपियों पर गंभीर आरोप लगा दिए गए. लेकिन बाद में जब चार्जशीट दाखिल हुई तो साफ हुआ कि काज़ी पर सिर्फ साजिश और सबूत मिटाने का आरोप है. उन्होंने कहा कि काज़ी को सुनवाई का मौका दिए बिना बर्खास्त कर दिया गया. साथ ही जमानत देते समय हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना था कि उन पर केवल साजिश का आरोप बनता है. बचाव पक्ष ने कहा कि पुलिस आयुक्त ने जल्दबाजी में आदेश पारित किया.
राज्य सरकार ने मांगा समय
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा है. अदालत ने राज्य, पुलिस महानिदेशक और पुलिस आयुक्त को चार सप्ताह का समय दिया है. इसके बाद काज़ी को दो सप्ताह का समय दिया गया है ताकि वे अपना प्रत्युत्तर दाखिल कर सकें. अदालत ने कहा कि सभी जवाब आने के बाद ही आगे की सुनवाई होगी. इससे साफ है कि मामला अभी निर्णायक चरण में नहीं है.
अगली सुनवाई की तारीख
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जवाब और प्रत्युत्तर दाखिल होने के बाद मामले पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी. अगली सुनवाई 20 अप्रैल को तय की गई है. उस दिन अदालत यह देखेगी कि बर्खास्तगी आदेश में क्या-क्या पहलुओं पर विचार किया गया था. यदि अदालत को कोई खामी मिलती है तो आदेश पर असर पड़ सकता है. फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों की तैयारी में जुट गए हैं.
केस का व्यापक असर
एंटीलिया बम कांड पहले ही देशभर में चर्चा का विषय रहा है. इसमें पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे थे. ऐसे में काज़ी की बर्खास्तगी और उस पर कानूनी लड़ाई का असर व्यापक हो सकता है. अगर हाईकोर्ट MAT के फैसले को पलटता है तो यह अन्य मामलों में भी मिसाल बन सकता है. वहीं यदि राज्य का फैसला बरकरार रहता है तो अनुच्छेद 311(2)(b) के इस्तेमाल को मजबूती मिलेगी. अब सबकी नजर 20 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी है.
विद्या