बड़े शहरों की उंची-ऊंची आसमान छूती इमारतों में बनते माचिस के डिब्बे जैसे घर, दो फ्लैटों की दूरी इतनी की पड़ोसी को आपके घर के हर आहट की खबर मिल जाए. प्रॉपर्टी के बढ़ते दामों के बीच अब धीरे-धीरे घर के साइज छोटे होते जा रहे हैं. खासतौर पर जिस बालकनी को बड़े शौक से लोग ये सोचकर बनवाते थे कि वहां बैठकर शाम की चाय पिएंगे वो बालकनी अब बस नाम की रह गई हैं.
बिल्डर अब ऐसे घर बना रहे हैं, जिसकी बालकनी और भी छोटी होती जा रही है, जहां बैठना तो दूर की बात आप आराम से खड़े भी नहीं हो सकते हैं. आखिर क्यों छोटी हो रही है बालकनी का साइज?
ऊंची इमारतों के घने जाल में अब प्राइवेट स्पेस जैसा कुछ नहीं बचा, हर वक्त किसी न किसी की नजर आप पर होने का एहसास बालकनी के अनुभव को असहज बना देता है. वहीं दिल्ली-NCR और मुंबई जैसे महानगरों में हवा की गुणवत्ता इतनी खराब हो चुकी है कि बाहर बैठना सेहत के लिए फायदेमंद होने के बजाय नुकसानदेह हो गया है. शहरों में मच्छरों की बारहमासी समस्या ने शाम के समय बालकनी का मजा लेना नामुमकिन कर दिया है. ट्रैफिक का शोर और लगातार उड़ती धूल की वजह से बालकनी अब बैठने की जगह के बजाय केवल कपड़े सुखाने या कबाड़ रखने का एक हिस्सा बनकर रह गई है.
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दिल्ली-एनसीआर में छोटी हुई बालकनी
दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों में फ्लैट की बालकनी सिकुड़ती जा रही है. मिडिल क्लास लोग जिनका बजट कम है उनको तो फ्लैट में बालकनी सिर्फ नाम मात्र की मिल रही है.अब तो हालत ऐसी हो गई है कि बालकनी लग्जरी सेगमेंट का हिस्सा बनकर रह गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव घर खरीदारों की बढ़ती जागरूकता का परिणाम है, क्योंकि अब वे इस बात पर बारीकी से ध्यान दे रहे हैं कि घर के भीतर वे वास्तव में किस स्पेस (Carpet Area) के लिए भुगतान कर रहे हैं.
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम जैसे NCR के इलाकों में 5-6 फीट की बालकनी आमतौर पर 'फ्री फ्लोर स्पेस इंडेक्स' (FSI) के तहत आती है, यही वजह है कि यहां डेवलपर्स अभी भी इन्हें दे रहे हैं, इसके विपरीत, मुंबई जैसे कम जगह वाले बाजार में कोविड के बाद बालकनी एक 'यूनीक सेलिंग प्रपोजिशन' (USP) बनकर उभरी है, जो किसी प्रोजेक्ट को दूसरों से अलग बनाती है.
उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि यह बदलाव ज़मीन की बढ़ती कीमतों, जमीन की उपलब्धता और 'कार्पेट एरिया' बनाम 'सुपर बिल्ट-अप एरिया' के बीच बढ़ती जांच-परख से जुड़ा है. खरीदारों को अक्सर खरीदारी के बाद इस अंतर का एहसास होता है, जिससे अब डेवलपर्स बालकनी के बजाय घर के अंदरूनी स्पेस को प्राथमिकता दे रहे हैं.
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बेंगलुरु का क्या हाल
बेंगलुरु में अब नए लॉन्च होने वाले प्रोजेक्ट में बालकनी की साइज पहले से छोटी होती जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पहले जहां 12x6 वर्ग फीट के लेआउट सामान्य हुआ करते थे, वहीं अब 11x4 वर्ग फीट के डिजाइन अधिक देखने को मिल रहे हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि बालकनी के इस्तेमाल योग्य स्पेस में लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक की गिरावट आई है.
फ्लैट्स में बालकनी का छोटा होना या गायब होना केवल आर्किटेक्चरल बदलाव नहीं, बल्कि बढ़ती शहरी आबादी, जमीन की किल्लत और आर्थिक मजबूरियों का नतीजा है. जहां एक ओर खरीदार अब 'दिखावे' के बजाय घर के अंदरूनी कार्पेट एरिया को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं, वहीं बिल्डर्स भी मुनाफे और FSI के गणित में बालकनी की बलि चढ़ा रहे हैं. प्राइवेसी का खत्म होना, बढ़ता प्रदूषण और शोर-शराबा इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं.
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