अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ग्रीनलैंड को अमेरिकी नक्शे में शामिल करने की अपनी पुरानी चाहत को लेकर चर्चा में हैं. न्यूयॉर्क के बड़े रियल एस्टेट सौदों से अपनी पहचान बनाने वाले ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड महज एक 'प्रॉपर्टी डील' जैसा हो सकता है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है. दुनिया के इस सबसे बड़े द्वीप पर जमीन को लेकर एक ऐसी फिलॉसफी काम करती है, जो भारत या अमेरिका जैसे देशों से बिल्कुल उलट है.
यहां आप आलीशान मकान तो खरीद सकते हैं, लेकिन जिस जमीन पर वह खड़ा है, उसका मालिक बनने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता. जहां जमीन किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे समाज की सांझी विरासत मानी जाती है. यहां की कानूनी व्यवस्था के अनुसार, कोई शख्स इमारत तो खरीद सकता है, लेकिन वह जमीन जिस पर वे बने हैं, हमेशा सरकार की ही रहती है. यही कारण है कि ट्रंप की 'रियल एस्टेट डिप्लोमेसी' यहां के कानूनों के सामने एक बड़ी चुनौती नजर आती है.
ग्रीनलैंड की भूमि व्यवस्था वैश्विक रियल एस्टेट की सबसे बुनियादी धारणाओं में से एक को चुपचाप उलट देती है.
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ग्रीनलैंड में घर तो खरीद सकते हैं, पर ज़मीन क्यों नहीं?
ग्रीनलैंड में जमीन पर समाज का हक होता है और सरकार इसकी देखभाल करती है. यहां कोई भी व्यक्ति प्राइवेट तौर पर जमीन का मालिक नहीं बन सकता. वहां घरों और बिल्डिंगों का सारा कामकाज हाउसिंग कंपनियां संभालती हैं. अगर आप वहां रहने के लिए कोई घर या जगह चाहते हैं, तो आप खुद या आपकी कंपनी वहां की हाउसिंग कंपनी से संपर्क कर सकती है. यह इस बात पर तय होता है कि आप वहां कितने समय से रह रहे हैं.
वहां के नियम कहते हैं कि कोई भी आम नागरिक, संस्था या कंपनी जमीन के इस्तेमाल का हक मांग सकती है. अगर आपको घर बनाना है, तो आपको ज़मीन खरीदने के बजाय सरकार से उस जगह के इस्तेमाल की अनुमति मांगनी होती है.
यहां के लोग मानते हैं कि जमीन सबकी है और यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई अकेला व्यक्ति खरीद सके. उनके हिसाब से पूरी जमीन पर समाज का सामूहिक हक होता है.
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कौन खरीद सकता है घर?
अगर कोई ग्रीनलैंड, डेनमार्क या फरो आइलैंड्स का नागरिक नहीं हैं, तो यहां प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता है.
हालांकि, अगर यहां 2 साल से कोई रह रहा है और टैक्स भर रहा है, तो प्रॉपर्टी के मालिकाना हक के लिए आवेदन कर सकता है.
यहां घर का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि परिवार में कितने लोग हैं. जैसे, अगर परिवार में 4 लोग हैं, तो उन्हें 4 कमरों वाला अपार्टमेंट दिया जाता है, लेकिन 'नूक' (Nuuk) जैसे बड़े शहरों में आबादी ज़्यादा होने के कारण घरों के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट होती है, इसलिए घर मिलने में समय लग सकता है.
यह नियम वहां के नागरिकों पर भी लागू होता है. योग्य कंपनियां या लोग सरकारी फॉर्म, नगर पालिका के दफ्तर या NunaGIS जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए आवेदन कर सकते हैं. इसमें शहर के प्लानिंग नियमों का पालन करना ज़रूरी होता है. सरकार हर आवेदन की जांच करती है और देखती है कि क्या वह उस इलाके के विकास के लिए सही है. अगर उस इलाके के लिए पहले से कोई टाउन प्लान नहीं है, तो आम जनता की राय भी ली जा सकती है.
यहां जमीन से जुड़ा कोई भी अधिकार ट्रांसफर करने के लिए सरकार की मंजूरी अनिवार्य है. कोई भी व्यक्ति या कंपनी अपने घर या बिल्डिंग को उस जमीन के 'इस्तेमाल करने के अधिकार' से अलग करके नहीं बेच सकता. यानी घर और जमीन का अधिकार हमेशा साथ-साथ चलते हैं.
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