भारत के वस्त्र उद्योग का इतिहास बहुत पुराना है. यह प्राचीन व्यापारिक रास्तों से शुरू होकर आज के आधुनिक दौर तक पहुंच चुका है. आज के समय में यह पूरा सेक्टर करीब 16 लाख करोड़ रुपये (176 अरब डॉलर) से ज्यादा का माल तैयार करता है. देश की जीडीपी में भी इसका 2 से 3 प्रतिशत का हिस्सा है. खेती के बाद यह दूसरा ऐसा सेक्टर है जहां सबसे ज्यादा यानी करीब 4.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है.
अगर आंकड़ों की बात करें तो भारत से कपड़ों का निर्यात करीब 40 अरब डॉलर का है, जबकि हमारे अपने देश का बाजार ही 135-140 अरब डॉलर का है. अब सरकार और नीति बनाने वाले लोग इसे 350 अरब डॉलर तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन इतना बड़ा होने के बावजूद भारत का कपड़ा उद्योग आज एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है.
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70 हजार करोड़ का दांव और 20 लाख नौकरियां
25 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में टेक्सटाइल मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी रोहित कंसल ने बताया कि अब सरकार का पूरा फोकस सिर्फ सड़कों या बंदरगाहों पर नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम पर है जहां सब कुछ एक ही जगह मिल जाए. इस नई रणनीति की जान हैं 'पीएम मित्र' पार्क योजना. पारंपरिक वस्त्र उत्पादक राज्यों में ऐसे सात पार्क विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें से प्रत्येक लगभग 1,000 एकड़ में फैला हुआ है. कंसल के मुताबिक, इन सात पार्कों में कुल 70,000 करोड़ रुपये के निवेश और लगभग 20 लाख नौकरियों की उम्मीद है.
अभी हमारे देश में कपड़ा उद्योग काफी बिखरा हुआ है. कपास कहीं और उगता है, धागा कहीं और बनता है और सिलाई किसी दूसरे शहर में होती है. इससे सामान लाने-ले जाने का खर्च बढ़ जाता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हम पिछड़ जाते हैं. 'पीएम मित्र' पार्क योजना इस दूरी को खत्म कर देंगे. यहां फाइबर से लेकर फैशन तक की पूरी चेन एक ही जगह होगी, जिससे काम करना आसान और सस्ता हो जाएगा. ये नए पार्क पहले के पार्कों से 10 गुना बड़े हैं और अकेले एक पार्क से ही करीब 1 लाख लोगों को सीधे काम मिलने का अनुमान है.
2027-28 तक पूरी तरह होंगे तैयार
इन सात पार्कों का काम अब काफी आगे बढ़ चुका है. करीब 7,000 एकड़ जमीन ली जा चुकी है और 2,000 एकड़ जमीन कंपनियों को दे भी दी गई है. तेलंगाना में तो काम इतना आगे बढ़ गया है कि वहां सामान बनाना भी शुरू हो चुका है, जबकि मध्य प्रदेश में बुनियादी ढांचा तैयार किया जा रहा है. सरकार का लक्ष्य है कि 2027-28 तक ये सभी सात पार्क पूरी रफ्तार से चलने लगें.
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पुराने केंद्रों का भी होगा कायाकल्प
सिर्फ नए पार्क ही नहीं, बल्कि सरकार पुराने कपड़ा केंद्रों जैसे तिरुप्पुर, सूरत और पानीपत को भी हाई-टेक बना रही है. देश का 80 प्रतिशत कपड़ा आज भी इन्हीं पुराने केंद्रों के छोटे और मध्यम उद्योगों से आता है. अब यहां नई मशीनें लगाई जा रही हैं, सोलर एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है और गंदे पानी को साफ करने के लिए आधुनिक प्लांट लगाए जा रहे हैं. तिरुप्पुर जैसे इलाके आज सौर ऊर्जा और पानी की बचत में मिसाल बन चुके हैं.
आजकल पूरी दुनिया में उन कपड़ों की मांग बढ़ रही है जिन्हें बनाने में पर्यावरण को नुकसान न पहुंचा हो. भारत भी अब इसी 'हरित परिवर्तन' यानी ग्रीन टेक्सटाइल की राह पर चल पड़ा है. जहरीले रसायनों को खत्म करना, पानी को रीसायकल करना और सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करना अब भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है. एकीकृत मूल्य श्रृंखला और इन मेगा पार्कों के दम पर भारत अब बांग्लादेश जैसे देशों को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक बनने की ओर बढ़ रहा है.
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