नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों में आजकल एक खास ट्रेंड देखने को मिलता है जब भी बड़े डेवलपर्स अपने नए अल्ट्रा लग्जरी प्रोजेक्ट्स की घोषणा करते हैं, तो हेडलाइन आती है- "लॉन्च के पहले ही दिन सारे फ्लैट्स बिक गए! ₹7 करोड़, ₹10 करोड़ या ₹50 करोड़ तक की कीमत होने के बावजूद ये फ्लैट्स 'आउट ऑफ स्टॉक' कैसे हो जाते हैं. क्या वाकई लोग लाइन लगाकर चेक लेकर खड़े हैं या इसके पीछे कोई गहरी बिजनेस स्ट्रैटेजी है.
आजतक रेडियो के कार्यक्रम 'प्रॉपर्टी से फायदा' में रियल एस्टेट एक्सपर्ट सौरव शर्मा ने इस 'डे वन सोल्ड आउट' (Day 1 Sold Out) के पीछे की असलियत से पर्दा उठाया.
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सौरव का कहना है कि 'सोल्ड आउट' 100% तो कभी नहीं होता, लेकिन जो डेटा दिखाया जाता है, वह एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है. दरअसल, जिस दिन किसी प्रोजेक्ट को RERA (रेरा) लाइसेंस मिलता है, आधिकारिक तौर पर उसे उसी दिन बेचा जा सकता है. लेकिन इसकी तैयारी 3-4 महीने पहले ही शुरू हो जाती है.'
प्रोजेक्ट लॉन्च होने से महीनों पहले डेवलपर्स अपने ब्रोकर्स और चैनल पार्टनर्स को टेंटेटिव डिटेल्स दे देते हैं. ब्रोकर अपने खास ग्राहकों को बताते हैं कि "ट्रम्प टावर्स" या कोई बड़ा ब्रांड आने वाला है. जो लोग रुचि दिखाते हैं, उनसे 'एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट' (EOI) के नाम पर पहले ही टोकन ले लिया जाता है.
क्या वाकई एक दिन में होती है सेल?
सौरव आगे कहते हैं- ' जिस दिन रेरा लाइसेंस आता है, उन 200-300 संभावित खरीदारों को एक साथ बुलाया जाता है और आधिकारिक कागजी कार्रवाई की जाती है. तकनीकी रूप से ट्रांजैक्शन एक दिन में होता है, लेकिन वह ग्राहक महीनों की मेहनत से जुटाया गया होता है. अखबारों में इसे 'डे वन सोल्ड आउट' कहकर ब्रांड की वैल्यू बढ़ाई जाती है.'
सवाल यह उठता है कि लोग ₹50 करोड़ का फ्लैट क्यों खरीदते हैं? क्या यह सिर्फ दिखावा है. सौरव के अनुसार, यह "कंट्रोल्ड एनवायरमेंट" की चाहत है. अमीर खरीदार ऐसी जगह रहना चाहता है जहां उसके पड़ोसी भी उसी के आर्थिक और सामाजिक स्तर के हों. आम कॉलोनियों में अक्सर पार्किंग, शोर-शराबे या छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं. जो व्यक्ति ₹50-100 करोड़ खर्च कर रहा है, वह शांति और एक विशिष्ट जीवनशैली खरीद रहा है. वह ऐसी भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता जहां हर दिन बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े.
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कोठी बनाम फ्लैट: क्लास और लाइफस्टाइल का फर्क
अक्सर लोग तुलना करते हैं कि ₹10 करोड़ की कोठी बेहतर है या ₹10 करोड़ का फ्लैट. यहां असली अंतर 'माइंडसेट' का है. सौरव कहते हैं- ' मान लीजिए किसी की ₹10 करोड़ की कोठी है जो उसने 20 साल पहले ₹50 लाख में ली थी. वहां आज भी शायद तीन परिवार साथ रह रहे हैं. वह संपत्ति समय के साथ महंगी हुई है, लेकिन वहां की जीवनशैली और सुविधाएं शायद वैसी न हों. जो व्यक्ति आज ₹10 करोड़ का फ्लैट खरीद रहा है, वह पूरी पेमेंट चेक में दे रहा है. वह हर महीने ₹50,000 से ₹1 लाख तक सिर्फ 'मेंबरशिप और मेंटेनेंस' के तौर पर देता है. '
इन दोनों के रहन-सहन में 'क्लास अपार्ट' का फर्क होता है. फ्लैट में रहने वाला आदमी अपनी प्राइवेसी और समय को सबसे ऊपर रखता है. वहां क्लब हाउस, जिम, स्पा और सुरक्षा जैसी सुविधाएं उसे एक ऐसी दुनिया देती हैं जहां उसे किसी से उलझने की जरूरत नहीं पड़ती.
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