ईरान में वॉर और महंगाई की दोहरी मार, तेहरान से घर छोड़ भाग रहे हैं लोग

ईरान का हाउसिंग मार्केट पूरी तरह चरमरा गया है, जिससे राजधानी तेहरान में मकानों के किराए आम आदमी के बजट से बाहर हो चुके हैं. हालात इतने बदतर हैं कि न्यूनतम वेतन से कहीं ज़्यादा घरों का किराया हो चुका है, जिसके चलते लोग खर्च बांटने के लिए रूममेट्स तलाश रहे हैं.

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ईरान में घरों के दाम आसमान पर (Photo-Pexels) ईरान में घरों के दाम आसमान पर (Photo-Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 20 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:05 PM IST

अमेरिका से चल रहे तनाव के बीच ईरान के प्रॉपर्टी बाजार में आसमान छूती कीमतों ने किराएदारों के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान में न्यूनतम मासिक वेतन महज $90 के आसपास है, जो सरकारी सब्सिडी, इलेक्ट्रॉनिक कूपन और भत्तों को मिलाकर भी बमुश्किल $120 तक ही पहुंच पाता है. ऐसे में आम आदमी के लिए घर का किराया चुकाना बेहद पेचीदा और थका देने वाला काम बन गया है.

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ईरान में अधिकांश किराएदार गरीबी रेखा के नीचे रहने को मजबूर हैं, जहां एक औसत परिवार की मासिक कमाई लगभग 70 करोड़ रियाल ($400) के आसपास है. ईरान के सांख्यिकीय केंद्र के अनुसार, फारसी कैलेंडर के पहले महीने 'फरवरदीन' (जो 20 अप्रैल को समाप्त हुआ) में सालाना आधार पर किराए में 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. 

वहीं, राजधानी तेहरान के स्थानीय डीलरों का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले कीमतें 30 से 40 फीसदी तक उछल चुकी हैं, जिसे 73 फीसदी की रिकॉर्ड महंगाई दर ने और ज्यादा भयावह बना दिया है.

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युद्ध के तनाव और बदलते हालात का असर

तेहरान के एक रियल एस्टेट एजेंट ने खुलासा किया है कि मौजूदा युद्ध और क्षेत्रीय तनाव के कारण बाजार में भारी अनिश्चितता है, जिससे बहुत कम लोग नए रेंट एग्रीमेंट साइन कर रहे हैं. इस आर्थिक तंगी से निपटने के लिए लोग अब नए रास्ते तलाश रहे हैं, जिसके तहत अकेले रहने के बजाय खर्च बांटने के लिए रूममेट्स ढूंढे जा रहे हैं.
 
कई परिवार तेहरान जैसे बड़े शहर को छोड़कर वापस छोटे कस्बों में जा रहे हैं या अपने रिश्तेदारों के साथ रहने को मजबूर हैं. इसके अलावा, कंस्ट्रक्शन मैटेरियल की बढ़ती कीमतों के कारण कई नए आवासीय प्रोजेक्ट्स ठप पड़ गए हैं, जिससे बाजार में नए घरों की सप्लाई और कम हो गई है.

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इस संकट को रोकने के लिए सरकार ने सालाना किराया बढ़ाने की अधिकतम सीमा 25 प्रतिशत तय की थी, लेकिन जमीन पर यह नियम पूरी तरह बेअसर साबित हुआ है. किराएदारों को सिक्योरिटी डिपॉजिट के लिए मिलने वाले सरकारी लोन भी तेहरान जैसे महंगे शहर में नाकाफी साबित हो रहे हैं. हालांकि सरकार ने युद्ध प्रभावित लोगों को आपातकालीन राहत तो दी है, लेकिन देश की डांवाडोल आर्थिक स्थिति को देखते हुए आने वाले समय में रियल एस्टेट बाजार के हालात और ज्यादा बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है.

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