दिल्ली-एनसीआर का हाउसिंग मार्केट मिडिल क्लास खरीदारों को एक कड़ा संदेश दे रहा है. जो चीज पांच साल पहले किफायती लगती थी, वह अब वैसी नहीं रह गई है. आज 1 करोड़ रुपये का बजट भी गुरुग्राम या दिल्ली के कई इलाकों में एक अदद अच्छा घर दिलाने के लिए नाकाफी साबित हो सकता है, वहीं सालाना 20 लाख रुपये कमाने वाले खरीदार भी ईएमआई, और अपनी जीवनशैली के खर्चों के बीच तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. नतीजा यह है कि एनसीआर के तेजी से बढ़ते प्रॉपर्टी मार्केट के पीछे एक गहराता 'अफ़ोर्डेबिलिटी क्राइसिस' छिपा हुआ है.
पिछले कुछ वर्षों में, जमीन की बढ़ती कीमतों, बुनियादी ढांचे के विस्तार और प्रीमियम हाउसिंग की बढ़ती मांग के कारण पूरे दिल्ली-एनसीआर में प्रॉपर्टी के दाम आसमान छू रहे हैं. नतीजा यह है कि लोगों की सैलरी और घरों की कीमतों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है. इस स्थिति ने कई खरीदारों को एक बुनियादी सवाल पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. आखिर आज के दौर में आय का वह कौन सा स्तर है, जिस पर दिल्ली-एनसीआर में घर खरीदना आर्थिक रूप से व्यावहारिक या समझदारी भरा फैसला कहा जा सकता है.
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सेबी (SEBI) पंजीकृत निवेश सलाहकार और सहज मनी के संस्थापक अभिषेक कुमार के अनुसार, लंबी अवधि के वित्तीय तनाव से बचने के लिए घर का आदर्श बजट खरीदार की वार्षिक आय के चार से पांच गुना के भीतर ही होना चाहिए. उन्होंने कहा, “10 लाख रुपये के वार्षिक वेतन के लिए, वित्तीय रूप से सुरक्षित अधिकतम घरेलू बजट 40 लाख से 50 लाख रुपये के बीच होगा. वहीं, 20 लाख रुपये की आय पर खरीदारों को 80 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच की प्रॉपर्टी को टारगेट करना चाहिए, जबकि 50 लाख रुपये की वार्षिक आय होने पर अधिकतम 2 करोड़ से 2.5 करोड़ रुपये तक का बजट रखा जा सकता है.”
लेकिन आज के एनसीआर मार्केट में, ये आंकड़े एक कड़वी हकीकत बयां करते हैं. 1 करोड़ रुपये का बजट, जिसमें पहले गुरुग्राम या नोएडा के किसी ठीक-ठाक प्राइम लोकेशन पर मध्यम-श्रेणी का घर मिल जाता था, वह अब खरीदारों को तेजी से ग्रेटर नोएडा वेस्ट, न्यू गुरुग्राम, फरीदाबाद और यमुना एक्सप्रेसवे बेल्ट जैसे नए उभरते हुए इलाकों की तरफ धकेल रहा है.
ओमैक्स (Omaxe) के प्रबंध निदेशक (MD) मोहित गोयल ने कहा, 'गुरुग्राम और दिल्ली के मुख्य बाजारों में, प्रीमियम हाउसिंग के लिए अब 2 से 3 करोड़ रुपये व्यावहारिक रूप से एक शुरुआती कीमत बनता जा रहा है.
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EMI का वो जाल जिसे कई खरीदार नजरअंदाज कर देते हैं
प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें तो एक चिंता हैं ही, लेकिन उससे भी बड़ी चिंता यह है कि आगे चलकर यह आप पर कितना बड़ा आर्थिक बोझ डालती हैं. निवेश सलाहकार अभिषेक कुमार के अनुसार, घर खरीदारों को अपनी होम लोन की ईएमआई (EMI) को अपनी महीने की इन-हैंड सैलरी के 30 से 35% के भीतर ही रखना चाहिए. उन्होंने कहा, “अगर आप पर पहले से कोई दूसरा कर्ज या लोन नहीं है, तो आप इस लिमिट को ज्यादा से ज्यादा 40% तक खींच सकते हैं. लेकिन इससे ऊपर जाना आपके घर के बजट और आर्थिक स्थिति के लिए बहुत बड़ा रिस्क हो सकता है,” इसकी वजह बहुत सीधी है, जब आपकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा हर महीने ईएमआई में जाने लगता है, तो आपके दूसरे जरूरी काम और आर्थिक लक्ष्य रुकने लगते हैं.
आज के दौर में, खासकर दिल्ली-एनसीआर जैसे महंगे प्रॉपर्टी मार्केट में, घर खरीदारों के लिए इस संतुलन को बनाए रखना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
किराए पर रहना ज्यादा समझदारी भरा विकल्प है?
मध्यमवर्गीय प्रोफेशनल्स के एक बड़े और बढ़ते हिस्से के लिए, अब घर खरीदने के बजाय किराए पर रहना आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है. अभिषेक कुमार ने कहा, "दिल्ली-एनसीआर में प्रॉपर्टी की कीमतों और उनके किराए के बीच जमीन-आसमान का अंतर है. यही वजह है कि कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अब घर खरीदने की तुलना में किराए पर रहना आर्थिक रूप से ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बनता जा रहा है."
उनके अनुसार, एनसीआर में रेंटल यील्ड अभी भी काफी कम, यानी लगभग 2 से 3% के आसपास ही है. इसका सीधा मतलब यह है कि किसी एक ही प्रॉपर्टी का हर महीने का किराया, उस प्रॉपर्टी के लिए जाने वाले होम लोन की ईएमआई से बहुत ज्यादा सस्ता होता है.
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