संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 40% आबादी यानी करीब 3.4 अरब लोग एक ऐसे आवास संकट से प्रभावित हैं, जिसमें घरों की किल्लत, ऊंचे दाम और खराब गुणवत्ता के साथ-साथ साफ पानी और स्वच्छता तक खराब पहुंच शामिल है.
बाकू, अज़रबैजान में 'वर्ल्ड अर्बन फोरम' के दौरान यूएन-हैबिटेट द्वारा जारी की गई 'वर्ल्ड सिटीज रिपोर्ट' में इस बात पर जोर दिया गया है कि साल 2050 तक शहरों में अतिरिक्त दो अरब लोगों के आने की उम्मीद है. ऐसे में शहरीकरण, जमीन की बढ़ती कीमतों, बढ़ती असमानता और जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से ही दबाव झेल रहे आवास क्षेत्र पर संकट और ज्यादा गहरा जाएगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर घरों की कीमतें लोगों की आमदनी के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं, जिसके तहत प्राइस-टू-इनकम रेशियो साल 2010 के 9.3 से बढ़कर 2023 में 11.2 हो गया है, जबकि भारत समेत मध्य और दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा 16.8 तक पहुंच चुका है. किराए देने की क्षमता भी लगातार बिगड़ रही है, क्योंकि दुनिया भर में 44% परिवार अपनी आय का 30% से अधिक हिस्सा आवास पर खर्च कर रहे हैं.
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भारत भी बेहाल
प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म 'नाइट फ्रैंक' और रियल-स्टेट सर्विस प्रोवाइडर 'मैजिकब्रिक्स' की रिपोर्टों का हवाला देते हुए संयुक्त राष्ट्र ने यह भी रेखांकित किया कि भारत के आठ सबसे बड़े शहरों में नए बनने वाले घरों में किफायती आवास का हिस्सा साल 2018 के 52% से घटकर साल 2025 में महज 17% रह गया है, जिसका मुख्य कारण डेवलपर्स द्वारा मध्य और उच्च श्रेणी के घरों को प्राथमिकता देना है जहां उनका मुनाफा अधिक होता है.
मुंबई और दिल्ली में प्राइस-टू-इनकम रेशियो 14.3 और 10.1 है, जिससे औसत परिवारों के लिए घर खरीदना पहुंच से बाहर हो गया है. बहुत ही कम लोगों के पास औपचारिक होम लोन की सुविधा उपलब्ध है, जिसके कारण परिवार घर खरीदने से वंचित रह जाते हैं या फिर उन्हें अपनी बचत, अनौपचारिक कर्ज या रिश्तेदारों की मदद पर निर्भर रहना पड़ता है. 'इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल होमलेसनेस' के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि बेघर होने की दर चीन में प्रति 10,000 लोगों पर 21, भारत में प्रति 10,000 पर 13, संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति 10,000 पर 20 और ब्राजील में प्रति 10,000 लोगों पर 11 है.
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आवास क्षेत्र में बड़ी आर्थिक क्षमता
इन चुनौतियों के बावजूद, आवास क्षेत्र में आर्थिक विकास की भारी संभावनाएं हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि, भारत में आवासीय निर्माण की मांग में प्रति ₹1,00,000 की अतिरिक्त बढ़ोतरी से अनुमानित तौर पर 2.61 नए अनौपचारिक और 0.04 औपचारिक रोजगार पैदा होते हैं. यदि इसके अप्रत्यक्ष प्रभावों को भी जोड़ लिया जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर 4.06 नौकरियों तक पहुंच जाता है.
रोजगार पैदा करने के मामले में यह आंकड़ा संयुक्त राज्य अमेरिका से काफी ज्यादा है, जहां एक सामान्य सिंगल-फैमिली होम बनाने से अनुमानित 2.9 नौकरियों को सहारा मिलता है, जबकि एक औसत रेंटल अपार्टमेंट से 1.25 नौकरियां पैदा होती हैं.
इसके अलावा, जहां दुनिया के कई हिस्से निर्माण की ऊंची या बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं, वहीं बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण भारत और चीन में प्रति वर्ग मीटर निर्माण लागत काफी कम है. इसकी तुलना में चाड, जाम्बिया या घाना जैसे देशों में लागत ज्यादा है क्योंकि वहां निर्माण उद्योग और सप्लाई चेन अभी उतने विकसित नहीं हैं.
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