भारत के बड़े शहरों में हर साल लाखों युवा सुनहरे भविष्य का सपना लेकर आते हैं कोई रोजगार की तलाश में आता है तो किसी को पढाई करनी होती है. नए शहर में आने के बाद युवाओं के सामने सबसे पहली जरूरत होती है एक घर की. जिसके लिए वो किराए के घर की तलाश करते हैं. लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है, जब मकान मालिक 'नो बैचलर्स' या 'ओनली फॉर फैमिलीज' का डिमांड करता है.
हालांकि कानूनी तौर पर हाउसिंग सोसायटियों के पास बैचलर्स को प्रतिबंधित करने का कोई अधिकार नहीं है, फिर भी मकान मालिक उन्हें घर देने से कतराते हैं, आखिर इस हिचकिचाहट के पीछे की वजहें क्या हैं. क्या यह सिर्फ एक रूढ़िवादी सोच है, या इसके पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं और ऐसे केस में वो लोग क्या करें जो घर की तलाश में भटकते हैं.
मकान मालिकों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस (RWA) की सबसे बड़ी चिंता बैचलर्स की जीवनशैली को लेकर होती है. अधिकांश मकान मालिकों का मानना होता है कि कुंवारे लड़के या लड़कियां देर रात तक पार्टियां करेंगे, तेज आवाज में संगीत बजाएंगे और उनके घर में दोस्तों का आना-जाना लगा रहेगा, पारिवारिक सोसायटियों में रहने वाले अन्य लोग अक्सर इस तरह के 'पार्टी कल्चर' से असहज महसूस करते हैं, जिसकी शिकायतें सीधे मकान मालिक तक पहुंचती हैं.
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घर के रखरखाव और साफ-सफाई का डर
रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म नाइट फ्रैंक के सर्वे बताते हैं कि मकान मालिकों के मन में यह धारणा गहराई से बैठी है कि बैचलर्स घर का ध्यान ठीक से नहीं रखते, उनका मानना होता है कि परिवार के मुकाबले कुंवारे लोग साफ-सफाई के प्रति कम गंभीर होते हैं. मकान मालिक अपनी प्रॉपर्टी को सुरक्षित रखने के लिए परिवारों को प्राथमिकता देते हैं.
खासकर छात्रों और करियर की शुरुआत कर रहे युवाओं के मामले में, मकान मालिकों को समय पर किराया न मिलने का डर सताता रहता है. जॉब चेंज, छंटनी या दोस्तों के बीच रूम-शेयरिंग के विवाद के कारण बैचलर्स अक्सर बहुत जल्दी घर खाली कर देते हैं. हर छह महीने या साल भर में नया किरायेदार ढूंढना, ब्रोकरेज देना और पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया से गुजरना मकान मालिकों के लिए सिरदर्द बन जाता है. वे लंबे समय तक टिकने वाले परिवारों को चुनना ज्यादा बेहतर समझते हैं.
'सोसायटी का दबाव' और नैतिक पुलिसिंग
यदि किसी सोसायटी में कोई बैचलर लड़का या लड़की दोस्तों को घर पर बुलाते हैं, तो उसे अक्सर रूढ़िवादी नजरिए से देखा जाता है. सोसायटियों के आरडब्ल्यूए (RWA) मकान मालिकों पर दबाव बनाते हैं कि वे बैचलर्स को घर न दें, ताकि 'सोसायटी का माहौल' खराब न हो. इस सामाजिक दबाव के आगे मकान मालिक घुटने टेक देते हैं.
अगर किसी फ्लैट में रहने वाले बैचलर्स के बीच कोई गंभीर विवाद हो जाता है, या देर रात हुड़दंग के कारण पुलिस आ जाती है, तो बदनामी और कानूनी आंच सीधे मकान मालिक पर आती है. कई मामलों में, बिना उचित पुलिस वेरिफिकेशन के बैचलर्स को रखने पर मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है, इस झंझट से बचने के लिए वे सीधे 'फैमिली ओनली' का विकल्प चुन लेते हैं.
क्या कहता है कानून और क्या है समाधान?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का संविधान किसी भी नागरिक को उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर रहने की जगह चुनने से रोकने की इजाजत नहीं देता, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह साफ किया गया है कि यदि कोई किरायेदार कानून के दायरे में रहकर रह रहा है, तो केवल 'कुंवारा' होने के आधार पर उसे बेदखल या प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता.
रेंटल मार्केट के जानकारों का मानना है कि इस गतिरोध को केवल एक मजबूत और पारदर्शी 'रेंट एग्रीमेंट' के जरिए ही सुलझाया जा सकता है. यदि मकान मालिक और किरायेदार के बीच समझौते में इन शर्तों को स्पष्ट कर दिया जाए, तो दोनों पक्षों का डर दूर हो सकता है.
मकान मालिकों का यह डर पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि अतीत में कुछ व्यावहारिक अनुभव इसके पीछे रहे हैं. लेकिन, कुछ लोगों के व्यवहार के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को बैन कर देना भी न्यायसंगत नहीं है. शहरों को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने वाले इन युवाओं को रहने के लिए स्पेस देना जरूरी है. समाधान रूढ़िवादिता या पूर्ण प्रतिबंध में नहीं, बल्कि आपसी बातचीत, सख्त रेंट एग्रीमेंट और एक-दूसरे की निजता व सीमाओं का सम्मान करने में निहित है.
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