भारतीय रुपया लगातार टूटते हुए नए लाइफ टाइम लो लेवल (Rupee Life Time Low) को छूता जा रहा है और ये अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 तक पहुंच गया. इंडियन करेंसी में ये तेज गिरावट ऐसे समय में आई है, जबकि वैश्विक अनिश्चितता का स्तर हाई बना हुआ है और उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी का प्रवाह लगातार धीमा हुआ है. सिर्फ साल 2026 के जनवरी महीने ही अब तक रुपया 2.3% तक कमजोर हो चुका है. करेंसी में गिरावट किसी भी देश के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है और इसके कई साइड इफेक्ट देखने को मिलते हैं.
लगातार जारी है रुपये का टूटना
Indian Rupee की चाल को देखें, तो बीते लंबे समय से ये डॉलर के मुकाबले टूटता ही जा रहा है. शुक्रवार को ये 91.9125 पर खुला, जो पिछले कारोबारी दिन के बंद भाव 91.9550 से लगभग बराबर रहा. वहीं उससे पिछले सत्र में इंडियन करेंसी टूटते हुए लाइफ टाइम लो-लेवल 91.9850 पर पहुंच गया था. इस महीने अब तक भारतीय रुपया करीब 2.3% तक फिसल चुका है और ये इसकी सितंबर 2022 के बाद से सबसे खराब मंथली परफॉर्मेंस नजर आई है.
Rupee में गिरावट का बड़ा कारण
अगर बात करें, रुपये में जारी कमजोरी के पीछे के बड़े कारणों के बारे में, तो Indian Currency में ये गिरावट ऐसे समय में आई है, जबकि पहले से ही टैरिफ, ट्रेड वॉर समेत कई कारकों से वैश्विक अनिश्चितता चरम पर है. इसके चलते उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी का प्रवाह धीमा हो गया है.वहीं विकसित अर्थव्यवस्थाओं (Developed Economies) में उच्च ब्याज दरों ने विदेशी निवेश पर रिटर्न बढ़ा दिया है और इससे निवेशक निवेश के मामले में अधिक सतर्क हुए हैं.
यहां बता दें कि भारत का चालू खाता घाटा भी है. इसका सीधा मतलब है कि आयात और निर्यात के बीच के अंतर को पाटने के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भरता है. जब ये कैश फ्लो कमजोर होते हैं, तो करेंसी पर दबाव बढ़ जाता है और ये टूटने लगती है.
E-Survey में भी रुपया चर्चा में
गुरुवार को संसद में पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2026 (Economic Survey) के बाद प्रेस ब्रीफिंग में बात करते हुए सीईए वेंकटरामनन अनंत नागेश्वरन ने भी बार-बार इस बात पर जोर दिया कि रुपये की गिरावट को समझना जरूरी है. उन्होंने कहा था कि, करेंसी में गिरानट जो हम आज देख रहे हैं, वह सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है. सीईए के मुताबिक, जिन देशों का चालू खाता घाटा है, उनकी मुद्राओं का अवमूल्यन भी हुआ है.
हालांकि, उन्होंने कहा कि रुपये की लॉन्गटर्म परफॉर्मेंस अपेक्षाकृत स्थिर रही है. अगर आप सहस्राब्दी की शुरुआत से अब तक तमाम देशों की मुद्राओं के प्रदर्शन को देखें, तो भारतीय रुपया वास्तव में काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. उन्होंने समझाते हुए कहा कि जब वैश्विक कारणों से विदेशी कैश फ्लो धीमा होता है, तो पूंजी आयात करने वाले देशों की करेंसियां अपने आप ही कमजोर हो जाती हैं.
CEA ने बताया कैसे सुधरेगा रुपया?
चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर ने आगे यह स्पष्ट किया कि केवल हस्तक्षेप के जरिए स्थायी मुद्रा मजबूती हासिल नहीं की जा सकती है.उन्होंने जोर देते हुए कहा कि करेंसी की स्थिरता और मजबूती के लिए मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी पहली शर्त है. नागेश्वरन के मुताबिक, विनिर्माण निर्यात में मजबूत ग्रोथ से चालू खाता स्थिति में सुधार होता है और विदेशी मुद्रा भंडार को समर्थन मिलता है, जिससे धीरे-धीरे देश की करेंसी में विश्वास बढ़ता है. उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि स्थिर मुद्रा वाले देशों को देखें, जैसे स्विट्जरलैंड, जापान, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, तो इन सभी देशों में विनिर्माण क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपस्थिति है.
रुपये में गिरावट के क्या नुकसान?
Indian Rupee के लाइफ टाइम लो लेवल पर पहुंचने के सिलसिले को सीईए के मुताबिक तत्काल आर्थिक संकट का संकेत नहीं माना जा सकता है. लेकिन यह वैश्विक पूंजी प्रवाह में कमजोरी और निवेशकों की सतर्कता को प्रदर्शित करता है, जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता. अगर बात करें, करेंसी टूटने से सामने आने वाली समस्याओं के बारे में, तो डॉलर के मुकाबले रुपये के लगातार कमजोर होने से महंगाई बढ़ने का जोखिम बढ़ जाता है.
इसका असर पेट्रोलियम पदार्थों से लेकर विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों तक पर देखने को मिलता है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है और अपनी जरूरत का 80% Crude Oil आयात करता है. ऐसे में जब रुपया गिरता है, तो उसे ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं और इससे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का खतरा रहता है और ऐसा होने पर ट्रांसपोर्टेशन, लॉजिस्टिक्स पर खर्च बढ़ता है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है. यानी रुपये की कमजोरी से आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं. वहीं विदेशों में पैसे भेजना भी महंगा पड़ता है.
आजतक बिजनेस डेस्क