US-Iran War Impact: रोज ₹1700Cr का घाटा, ईरान युद्ध से संकट में तेल कंपनियां, क्या एक ही रास्ता?

Middle East युद्ध का बड़ा असर भारतीय पेट्रोलियम कंपनियों पर देखने को मिल रहा है. वैश्विक स्तर पर एनर्जी प्राइस बढ़ने के बावजूद पुरानी कीमत पर पेट्रोल-डीजल बेचने से उन्हें हर रोज 1600-1700 करोड़ का नुकसान हो रहा है.

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तेल कंपनियों को उठाना पड़ रहा तगड़ा घाटा. (File Photo: ITG) तेल कंपनियों को उठाना पड़ रहा तगड़ा घाटा. (File Photo: ITG)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 10 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:54 PM IST

अमेरिका और ईरान युद्ध (US-Iran War) से ग्लोबल टेंशन और दुनिया की तेल जरूरत पूरा करने के लिए सबसे अहम समुद्री रास्ता होर्मुज स्ट्रेट बंद (Hormuz Strait Closure) का असर दुनिया पर पड़ा है. भारत भी इसमें शामिल है और देश में एलपीजी संकट (LPG Crisis In India) से लेकर तेल की किल्लत के मामले देखने को मिले, हालांकि सरकार ने इसका असर कम करने के लिए कई बड़े कदम भी उठाए और Modi Govt Plan-B काम भी आया. इनमें घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ ही आयात डेस्टिनेंशन में विविधता जैसे उपाय शामिल हैं. 

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घरेलू एलपीजी प्रोडक्शन को संकट शुरू होने के कुछ ही दिनों में 36,000 टन प्रतिदिन से बढ़ाकर 54,000 टन प्रतिदिन कर दिया गया है. इसके अलावा सरकार ने वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतों से लोगों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में भी भारी कमी की. LPG Price Hike जरूर देखने को मिला, लेकिन तमाम संकट के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों (Petrol-Diesel Price) में कोई बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली. 

इससे पेट्रोलियम कंपनियों को तगड़ा घाटा उठाना पड़ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल एनर्जी प्राइस में बढ़ोतरी होने के बावजूद देश में ईंधन की कीमतें यथावत रखने से तेल कंपनियों को हर रोज 1600 से 1700 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

पुरानी कीमत पर ईंधन बेचना भारी
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, वेस्ट एशिया संघर्ष के बीच वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में तेज बढ़ोतरी आई. इसका असर भारत की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों पर लगातार भारी पड़ रहा है. इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) बीते पिछले 10 सप्ताह से पेट्रोल, डीजल की बिक्री पुरानी कीमत पर कर रही हैं, हालांकि, LPG Price में कुछ इजाफा जरूर किया गया.

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इसके चलते कंपनियों को रोजाना 1,600-1,700 करोड़ रुपये का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा है. इसमें सूत्रों के हवाले से बताया गया कि इन 10 हफ्तों में कंपनियों की कुल अंडर-रिकवरी 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी है. 

कच्चा तेल महंगा, लेकिन पेट्रोल-डीजल स्थिर
ग्लोबल संकट के बीच भी सरकार के आदेश के मुताबिक, भारत में तेल-गैस की सप्लाई पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा सुचारू रखी गई है और इनकी कीमतों को भी इंटरनेशनल प्राइस के मुकाबले काफी कम रखा गया है. जबकि भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 40%, एलपीजी आयात का 90% और एलएनजी आयात का 65% प्रभावित हुआ है. 

इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि Middle East War की शुरुआत होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतें (Crude Oil Price) में 50 फीसदी तक बढ़ोतरी देखने को मिली है, लेकिन इसके बाद भी भारत में पेट्रोल प्राइस (Petro Price) 94.77 रुपये प्रति लीटर, जबकि डीजल का रेट (Diesel Price) 87.67 रुपये प्रति लीटर पर यथावत बना हुआ है.

वहीं पाकिस्तान से लेकर ब्रिटेन तक में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तगड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है. हालांकि, क्राइसिस के बीच कंपनियों ने घरेलू एलपीजी गैस के दाम मार्च में 60 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ाए (LPG Price Hike) थे, जो कि वास्तविक लागत से अभी भी काफी कम है. 

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क्या कीमतों में इजाफा ही एकमात्र रास्ता? 
रिपोर्ट की मानें, तो कच्चे तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहने पर कंपनियों को परिचालन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है और उधारी लेने की जरूरत पड़ सकती है. सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ओएमसी कंपनियां बड़े वित्तीय दबाव में काम कर रही हैं. ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा अब एक राजनीतिक फैसला है, जो सरकार को ही लेना होगा. उन्होंने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी अब अपरिहार्य हो गई है, लेकिन इसके समय और मात्रा सरकार ही तय करेगी. 

बिजनेस टुडे हाल ही में आई एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 15 मई से पहले बढ़ोतरी की जा सकती है.

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