बिहार की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है, क्या बीजेपी के पास अपना कोई बड़ा नेता नहीं था जो उसे बाहर से आए सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा? यह सवाल जितना सीधा है, उसका जवाब उतना ही दिलचस्प है. दरअसल, बीजेपी के पास नेताओं की कमी नहीं है, बल्कि कमी एक ऐसे ऑलराउंडर चेहरे की थी जो जाति का गणित भी बिठा सके और पूरे बिहार में जिसकी पहचान भी हो. कुल मिलाकर बात इतनी सी थी कि पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए था, जो लालू और तेजस्वी के वोट बैंक में सेंध लगा सके. सम्राट चौधरी इस मामले में फिट बैठे.
इसे ऐसे समझिए कि बिहार में बिना जाति के राजनीति नहीं चलती. बीजेपी के पास नित्यानंद राय, गिरिराज सिंह और विजय कुमार सिन्हा जैसे बड़े नाम तो हैं, लेकिन सबकी अपनी-अपनी कुछ सीमाएं हैं. कोई एक इलाके तक सिमटा है, तो किसी की छवि इतनी कड़क है कि हर वर्ग उनसे नहीं जुड़ पाता. मंगल पांडे जैसे नेता प्रशासन चलाने में तो माहिर हैं, लेकिन आज की तारीख में बीजेपी को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो सड़क पर उतरकर विपक्ष को सीधी टक्कर दे सके. बस यहीं पर सम्राट चौधरी बाजी मार ले गए.
सम्राट चौधरी को कमान सौंपना बीजेपी की एक सोची-समझी चाल है. वह कुशवाहा समाज से आते हैं, जो बिहार में पिछड़ों का एक बहुत बड़ा वोट बैंक है. बीजेपी को पता है कि अगर उसे बिहार में अपने दम पर सत्ता लानी है, तो उसे गैर-यादव पिछड़ों को अपने पाले में लाना ही होगा. 2020 के चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन फिर भी वह नीतीश कुमार के पीछे रही. अब सम्राट चौधरी के जरिए पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह अब किसी के भरोसे नहीं, बल्कि खुद लीड करना चाहती है.
दिग्गजों की लंबी फेहरिस्त, फिर भी सम्राट चौधरी ने कैसे मारी बाजी?
सम्राट चौधरी की ताजपोशी के पीछे सबसे बड़ा कारण उनका लड़ाकू अंदाज है. आज की राजनीति में सिर्फ चुपचाप काम करने से बात नहीं बनती, आपको विरोधियों की आंखों में आंखें डालकर बात करनी पड़ती है. तेजस्वी यादव के आक्रामक हमलों का जवाब देने के लिए बीजेपी को एक ऐसा ही फाइटर चाहिए था. सम्राट चौधरी न सिर्फ अपनी बात मजबूती से रखते हैं, बल्कि उनकी मौजूदगी जमीन पर भी दिखती है. वह एक ऐसे नेता हैं जो हर गुट को साथ लेकर चल सकते हैं और पार्टी के अंदरूनी झगड़ों को भी खत्म करने की ताकत रखते हैं.
एक और अहम बात यह है कि बीजेपी अब 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रही है. ऐसे में पार्टी को एक ऐसा नया चेहरा चाहिए था जो लोगों के मन में बैठी पुरानी नाराजगी को दूर कर सके और नए वोटर्स को जोड़ सके. सम्राट चौधरी को आगे करके बीजेपी ने यह दांव इसलिए खेला है ताकि वह बिहार में दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनने के बजाय अब खुद नंबर वन की भूमिका में आ सके.
पार्टी के अंदरूनी हालात भी देखें तो किसी पुराने दिग्गज को प्रमोट करने पर आपसी खींचतान का डर था. सम्राट चौधरी इस मामले में एक न्यूट्रल चॉइस साबित हुए. उनके आने से पार्टी के कैडर में एक नई ऊर्जा दिखी है. कुल मिलाकर, बीजेपी ने यह दिखा दिया है कि वह जीत के लिए बड़े प्रयोग करने से नहीं हिचकिचाती. सम्राट चौधरी का सीएम बनना सिर्फ एक पद का बदलाव नहीं है, बल्कि बिहार में बीजेपी के एक नए युग की शुरुआत है, जहां वह पूरी तरह से कमान अपने हाथ में लेना चाहती है.
रोहित कुमार सिंह