बिहार की राजनीति में बड़ी हलचल मच गई है. BJP के बड़े नेता विजय कुमार सिन्हा को उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया गया है. साथ ही उनसे राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग भी छीन लिया गया है जो बिहार में सबसे ताकतवर विभाग माना जाता है. अब उन्हें कृषि मंत्री बना दिया गया है.
सवाल ये उठ रहा है कि क्या विजय सिन्हा की राजनीतिक अहमियत कम हो गई? क्या ये उन्हें सजा है? या फिर नेतृत्व उन्हें ग्रामीण इलाकों का चेहरा बनाना चाहता है? इसके पीछे एक बड़ी राजनीतिक कहानी है.
पिछली NDA सरकार में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे तब विजय सिन्हा बेहद शक्तिशाली माने जाते थे. वो उप-मुख्यमंत्री थे. उनके पास राजस्व और भूमि सुधार विभाग था. साथ ही खनन विभाग भी था. इनमें से राजस्व विभाग सबसे अहम माना जाता है क्योंकि इसी विभाग को जमीन से जुड़ी सभी समस्याओं को सुलझाना पड़ता है. जमीन का पंजीकरण, जमीन की नाप-जोख, लोगों की शिकायतें, सब कुछ इसी विभाग के जरिए होता है.
विजय सिन्हा ने इस विभाग का अच्छे तरीके से इस्तेमाल किया. उन्होंने जनता की शिकायतें सुनीं और मीडिया में भी दिखते रहे. इससे उनकी जनप्रिय छवि बनी और पार्टी के अंदर भी माना जाता था कि वो एक बड़ी ताकत हैं.
लेकिन विवाद भी हुए
विजय सिन्हा ने राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए. भ्रष्ट अधिकारियों को कार्रवाई का सामना करना पड़ा. इससे विभाग के 200 से ज्यादा राजस्व अधिकारियों ने हड़ताल कर दी. काम रुक गया. सरकार के अंदर भी असंतोष बढ़ गया. माना जाता है कि इसी कारण उन्हें इस विभाग से हटाया गया.
यह भी पढ़ें: पूर्व डिप्टी CM विजय सिन्हा की सुरक्षा में कटौती, निशांत कुमार को मिली Z कैटेगरी सिक्योरिटी
मुख्यमंत्री के लिए दौड़ में कैसे थे?
जब बिहार में नेतृत्व परिवर्तन शुरू हुआ तो विजय सिन्हा को मुख्यमंत्री का सबसे मजबूत दावेदार माना गया. उनका BJP के साथ लंबा रिश्ता था, संगठनात्मक अनुभव था और RSS से भी उनकी करीबी बताई जाती थी. उनके समर्थकों को लगता था कि वो मुख्यमंत्री बन जाएंगे.
लेकिन BJP की नेतृत्व ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना दिया. दिलचस्प बात ये है कि विजय सिन्हा ने ही पार्टी की मीटिंग में सम्राट चौधरी का नाम आगे किया. लेकिन उसके बाद उनके बयान और मीडिया से बातचीत में ऐसा लगा कि वो पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे.
कैबिनेट में शामिल होने में देरी क्यों?
विजय सिन्हा को शुरुआत में कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया. अफवाहें उड़ीं कि वो कैबिनेट में आ ही नहीं रहे. फिर कहा गया कि वो गृह मंत्री जैसा शक्तिशाली विभाग चाहते हैं. हालांकि उन्होंने ये बातें सार्वजनिक रूप से कभी पुष्टि नहीं की लेकिन उनके समर्थक खुलेआम कह रहे थे कि उनके जैसे नेता को बड़ी जिम्मेदारी मिलनी चाहिए.
अब क्या मिला?
कैबिनेट का विस्तार हुआ और विजय सिन्हा को कृषि मंत्री बनाया गया. पहली नजर में ऐसा लगता है कि उनकी अहमियत कम हुई क्योंकि उन्होंने राजस्व विभाग खो दिया जो सबसे ताकतवर था. लेकिन कृषि विभाग बिल्कुल कमजोर नहीं .
कृषि विभाग बिहार में बेहद अहम है. बिहार की अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है. सिंचाई, फसल बीमा, खाद की सप्लाई, MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य, बाढ़ के मुआवजे, किसान कल्याण योजनाएं, ये सब कृषि विभाग के जरिए ही होती हैं. इसलिए चुनाव से पहले ये विभाग राजनीतिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है.
बजट के लिहाज से क्या है?
जब विजय सिन्हा के पास राजस्व, भूमि सुधार और खनन विभाग थे तो उनके अंतर्गत कुल बजट करीब 2,268 करोड़ रुपए था. अब कृषि विभाग अकेले का बजट 3,446 करोड़ रुपये है. यानी उनके जिम्मे पैसा और जिम्मेदारी दोनों बढ़ गए.
यह भी पढ़ें: 'पिता के अधूरे सपनों को पूरा करना ही लक्ष्य', मंत्रीपद की शपथ लेने के बाद आजतक से बोले निशांत
तो क्या विजय सिन्हा को नीचा दिखाया गया?
कई विश्लेषकों को लगता है कि नहीं. BJP उन्हें सरकार के बाहर नहीं निकालना चाहती. बल्कि शायद पार्टी उन्हें ग्रामीण इलाकों का मुख्य चेहरा बनाना चाहती है. कृषि विभाग के जरिए वो सीधे किसानों से जुड़ सकते हैं. ग्रामीण इलाकों में उनकी मजबूत छवि बना सकते हैं. भविष्य के चुनावों के लिए ये बहुत जरूरी है.
सम्राट चौधरी की शक्ति बढ़ी
दूसरा पहलू ये है कि इस बदलाव से सम्राट चौधरी के नेतृत्व को मजबूती मिली है. नए मुख्यमंत्री सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं. पार्टी के अंदरूनी संतुलन को बनाए रखते हुए नई सत्ता अपना प्रभाव स्थापित कर रही है.
रोहित कुमार सिंह