बिहार के सीएम नीतीश कुमार का 1 अणे मार्ग से 7 सर्कुलर रोड पर शिफ़्ट होने का फैसला एक रूटीन बदलाव नहीं है. यह ऐसे समय में हुआ है जब उन्होंने राज्यसभा सांसद के तौर पर शपथ ली है और मुख्यमंत्री के पद से हटने की तैयारी कर रहे हैं; ऐसे में यह बदलाव राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही लिहाज से बेहद अहम हो जाता है. खास बात यह है कि ये दोनों पते महज 100 मीटर की दूरी पर स्थित हैं.
बिहार में 1 अणे मार्ग को सबसे ताक़तवर पता माना जाता है, क्योंकि यह मुख्यमंत्री का सरकारी आवास है. यहीं से पूरे राज्य का प्रशासन चलाया जाता है. इस आवास से बाहर निकलना साफ तौर पर इस बात का संकेत है कि सत्ता का केंद्र अब बदल रहा है.
सत्ता और भूमिका में बदलाव
जब नीतीश कुमार 1 अणे मार्ग पर 20 साल से ज़्यादा समय तक रहे तो उन्होंने बिहार सरकार के मुखिया के तौर पर काम किया. IAS और IPS अधिकारियों समेत सभी बड़े अधिकारी उन्हें रिपोर्ट करते थे. सरकारी फ़ाइलें, नीतिगत फ़ैसले और प्रशासनिक काम सीधे उनकी देखरेख में होते थे.
कल CM पद छोड़ने के बाद 7 सर्कुलर रोड पर शिफ़्ट होने और राज्यसभा में जाने के साथ ही उनके काम का दायरा अब राष्ट्रीय हो गया है. उनका अब कार्यकारी के बजाय विधायी हो गया है. वे बहसों, कानून बनाने और राष्ट्रीय राजनीति में हिस्सा लेंगे, लेकिन अब वे बिहार के रोज़मर्रा के प्रशासन को कंट्रोल नहीं करेंगे.
इसका मतलब है कि भले ही उनका राजनीतिक महत्व बना रहे, लेकिन उनका सीधा प्रशासनिक अधिकार काफी कम हो जाएगा.
कमरे और इंफ्रास्ट्रक्चर: 1 अणे मार्ग बनाम 7 सर्कुलर रोड
1 अणे मार्ग जो बिहार के मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास है लगभग 6 एकड़ ज़मीन पर फैला हुआ एक विशाल परिसर है. यह एक उच्च-सुरक्षा वाला सरकारी आवास है.
1 अणे मार्ग में में दर्जनों कमरे हैं, जिनमें रहने के लिए सुइट, कई ऑफिस चैंबर, बड़े मीटिंग हॉल और स्टाफ़, सुरक्षाकर्मियों और आगंतुकों के लिए अलग से जगह शामिल है. इसे घर और पूर्ण प्रशासनिक मुख्यालय दोनों के रूप में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है. यहां एक खास ढांचा भी मौजूद है जहां 2015 तक 'जनता दरबार' लगाया जाता था.
दूसरी ओर 7 सर्कुलर रोड एक छोटा सरकारी बंगला है. पटना में स्थित यह बंगला बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आधिकारिक आवास/कैंप ऑफिस के तौर पर भी जाना जाता है. इस बंगले में मौजूद 6 VIP कमरे मुख्य रूप से रहने के लिए हैं, साथ ही निजी स्टाफ़ के लिए सीमित ऑफिस की जगह भी है. इसमें राज्य सरकार चलाने के लिए जरूरी बड़े कॉन्फ्रेंस हॉल या प्रशासनिक इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद नहीं हैं.
यह साफ है कि 1 अणे मार्ग, 7 सर्कुलर रोड की तुलना में कई गुना बड़ा और ज़्यादा विस्तृत है.
नीतीश कुमार पहली बार 2014 में 7 सर्कुलर रोड में शिफ़्ट हुए थे, जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और लगभग एक साल के लिए यह पद जीतन राम मांझी को सौंप दिया था. 2015 में जब वे RJD के साथ मिलकर दोबारा सत्ता में लौटे तो नीतीश 1 अणे मार्ग वापस आ गए, लेकिन उन्होंने 7 सर्कुलर रोड को भी अपने पास ही रखा. जब विपक्षी नेताओं ने उनके पास दो बंगले होने पर सवाल उठाए तो इस बंगले को औपचारिक रूप से मुख्य सचिव के नाम पर आवंटित कर दिया गया.
वेतन में अंतर: मुख्यमंत्री बनाम राज्यसभा सांसद
इस बदलाव में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक वेतन और बाकी सुविधाओं से जुड़ी है.
बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार को आम तौर पर 2 लाख से 2.5 लाख के बीच प्रति माह सैलरी मिलती है. इसके साथ ही उन्हें कई तरह के भत्ते और राज्य के खर्चे पर सुविधाएं, जैसे आवास, कर्मचारी, परिवहन और सुरक्षा भी मिलती हैं. उनका वास्तविक वित्तीय लाभ केवल वेतन से कहीं अधिक होता है, क्योंकि उनके अधिकांश बड़े खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाते हैं.
राज्यसभा सांसद बनने के बाद उनकी वेतन संरचना पूरी तरह से बदल जाएगी. राज्यसभा में एक संसद सदस्य को 1 लाख 24 हजार प्रति माह का मूल वेतन मिलता है.
इसके अतिरिक्त उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, कार्यालय खर्च और संसद सत्रों के दौरान दैनिक भत्ता जैसे भत्ते भी मिलेंगे. जब इन सभी को जोड़ा जाता है, तो कुल मासिक कमाई लगभग 2.8 लाख प्रति माह तक पहुंच सकती है; लेकिन इसकी संरचना अलग होती है और यह उपस्थिति तथा आधिकारिक कार्यों पर निर्भर करती है.
हालांकि मुख्य अंतर यह है कि मुख्यमंत्री के तौर पर लगभग हर चीज सीधे राज्य द्वारा नियंत्रित और वित्तपोषित होती है; जबकि एक सांसद के तौर पर यह व्यवस्था अधिक सीमित और नियमों पर आधारित होती है. इसलिए भले ही कागज़ों पर कुल राशि एक जैसी दिखे लेकिन मुख्यमंत्री के पद के साथ जुड़ा कंट्रोल, ताकत, लचीलापन और अधिकार का स्तर बहुत अधिक होता है.
सुविधाएं और विशेषाधिकार
1 अणे मार्ग पर मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार को राज्य के पूरे सिस्टम का सपोर्ट मिलता रहता था. उनके पास अधिकारियों की एक बड़ी टीम, पूरा ऑफ़िस इंफ़्रास्ट्रक्चर और किसी भी समय उच्च-स्तरीय बैठकें करने की सुविधा थी. यह आवास जनता की शिकायतें सुनने से लेकर कैबिनेट बैठकें करने तक हर तरह के काम के लिए पूरी तरह से तैयार है.
सात सर्कुलर रोड पर शिफ़्ट होने के बाद ये सुविधाएं कम हो जाएंगी. यह बंगला मुख्य रूप से एक आवास के तौर पर काम करता है और यहां स्टाफ़ की संख्या और सरकारी गतिविधियां कम हो जाती हैं. विशेषाधिकारों का स्तर राज्यसभा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी मौजूदा भूमिका पर निर्भर करता है, लेकिन यह साफ तौर पर उस स्तर से कम होता है जो एक मौजूदा मुख्यमंत्री को मिलता है.
सुरक्षा में बदलाव
सुरक्षा में भी एक साफ़ बदलाव देखने को मिलता है. 1 अणे मार्ग पर सुरक्षा काफ़ी कड़ी होती है, क्योंकि यह मुख्यमंत्री का सरकारी आवास है. यहां सुरक्षा के कई घेरे होते हैं बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, और आने-जाने वालों पर कड़ी नजर रखी जाती है.
सात सर्कुलर रोड पर भी सुरक्षा काफी मज़बूत रहती है, क्योंकि नीतीश कुमार अभी भी एक वरिष्ठ राजनेता हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के आवास की तुलना में यहां सुरक्षा का स्तर थोड़ा कम होता है. सुरक्षाकर्मियों की तैनाती इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें कितना ख़तरा है और उनकी मौजूदा हैसियत क्या है. हालांकि नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से पहले ही राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्हें 'Z प्लस' सुरक्षा देने का फ़ैसला कर लिया था.
इस बदलाव के राजनीतिक मायने
1 अणे मार्ग से 7 सर्कुलर रोड पर जाना एक मजबूत राजनीतिक संदेश देता है. यह साफ तौर पर दिखाता है कि नीतीश कुमार एग्जीक्यूटिव पावर से दूर हट रहे हैं और बिहार में एक नई नेतृत्व संरचना उभर रही है.
हाल के घटनाक्रम यह भी संकेत देते हैं कि यह बदलाव एक बड़े राजनीतिक बदलाव का हिस्सा है, जिसमें मुख्यमंत्री के पद और गठबंधन की गतिशीलता में बदलाव की उम्मीद है.
बिहार की राजनीति में ऐसे कदम को कभी भी सिर्फ रहने की जगह में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाता. इसे इस बात के साफ संकेत के तौर पर देखा जाता है कि सत्ता किस ओर जा रही है.
नीतीश कुमार का 1 अणे मार्ग से 7 सर्कुलर रोड पर जाना उनकी राजनीतिक यात्रा में एक बड़ा बदलाव है. मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने सत्ता के केंद्र से काम किया जहां राज्य प्रशासन पर उनका पूरा नियंत्रण था, उन्हें ज़्यादा विशेषाधिकार और व्यापक सुविधाएं मिली हुई थीं. राज्यसभा सांसद के तौर पर उनकी भूमिका विधायी हो जाती है, उनका वेतन ढांचा अलग हो जाता है और उनका प्रशासनिक अधिकार कम हो जाता है.
भले ही वह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्ती बने रहें, लेकिन यह कदम साफ तौर पर दिखाता है कि बिहार में असली कार्यकारी सत्ता उसी के पास होती है जो 1 अणे मार्ग पर काबिज़ होता है.
रोहित कुमार सिंह