उत्तर भारत में इस वक्त जहां मकर संक्रांति का उत्साह है तो वहीं भारत के दक्षिणी छोर पर बसा तमिल प्रदेश तमिलनाडु पोंगल का त्योहार मना रहा है. पीएम मोदी ने बुधवार को पोंगल मनाया. इसके लिए वह केंद्रीय मंत्री एल मुरुगन के घर पहुंचे और यहां गाय-बैलों की सेवा-पूजा कर उनका शृंगार किया. पोंगल क्या है, तमिल समुदाय इसे कैसे मनाता है और इसका परंपरा में क्या-क्या शामिल है, इस पर डालते हैं एक नजर...
क्या है पोंगल?
दक्षिण भारत की तमिल संस्कृति का भी जन्म खेतों की मेड़ से ही हुआ है. जिंदगी के असल कायदे-कानून फसलों के बीच ही रोपे गए हैं, इसलिए फसल कटकर जब घर आती है तो वही समय त्योहार बन जाता है. तमिल संस्कृति में पोंगल इसी नई शुरुआत और नए साल के आगमन का प्रतीक है. सूर्यदेव के दर्शन के साथ पोंगल की शुरुआत होती है और इसके लिए घर-द्वार को रंग-रोगन कर सजाया जाता है. दरवाजों पर पूक्कलम (रंगोली) रची जाती है. गाय-बैलों को नहला-धुला कर सजाया गया है और इस बीच घर की बड़ी-बूढ़ी अलग-अलग मटकों का चुनाव करती हैं.
समृद्धि का त्योहार है पोंगल
इन मटकों में वह धान को दूध में भिगोकर शक्कर के साथ उबालती हैं. इतना उबालेगी कि जब तक यह उफन कर किनारों पर न आ जाए. इसी के साथ उनकी स्थानीय भाषा में एक गीत भी हिलोरे लेने लगता है. जिसका मतलब है कि जैसे सागर का पानी उफन कर तट पर आया है, जैसे मेरी मटकी में उफान आया है, बस मेरे घर के बच्चों में खुशी भी ऐसी उफान पर आए. समृद्धि और साथ-साथ मिलकर हंसने-गाने का यह त्योहार पोंगल है.
छठ, दिवाली और होलिका दहन जैसी परंपराओं का मेलजोल
पोंगल बिहार की छठ पूजा की तरह चार दिन का पारिवारिक उत्सव है. इसमें सिर्फ परिवार के बच्चे-बूढ़े ही नहीं बल्कि घर में पाले गए पशु-पक्षी भी शामिल होते हैं. पहला दिन पोंगल के आगमन की सूचना देता है, दूसरा दिन पोंगल मनाए जाने की घोषणा करता है, तीसरा दिन सूर्य उपासना का दिन है और चौथा दिन गाय और विशेषकर बैलों व खेती से संबंधित औजारों के पूजन का दिन है. इसमें पहला दिन भोगी पोंगल, दूसरा दिन थाई पोंगल, तीसरा दिन कन्नम पोंगल और चौखा दिन मट्टू पोंगल कहलाता है.
भोगी पोंगल... पुराने विचारों के दहन का प्रतीक और दिन
भोगी पोंगल पुराने विचारों, दुखों को हटा देने और नवीनता को अपनाने का दिन है. माना जाता है कि पारंपरिक तौर पर यह साल का आखिरी दिन है. इस दिन लोग पुरानी चटाई, कपड़े आदि को जलाकर नवीनता की ओर बढ़ते हैं. यह परंपरा होलिका दहन के जैसी लगती है. घरों में रंगाई-पुताई की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर भारत में दिवाली से पहले की जाती है.
थाई पोंगल... नए कपड़े ही नही नए विचारों का भी स्वागत
थाई पोंगल, यह एक महत्वपूर्ण दिन होता है. इसे साल का पहला दिन कहते हैं. लोग नए कपड़े पहनते हैं. आसपास के सभी परिवार के लोग समूहों के तौर पर इकट्ठा होते हैं. इस दिन एक साथ इकट्ठे होकर पकवान बनाते हैं. खास पकवान होता है चकरई. इसे'चकरई पोंगल' कहते हैं. इसे बनाते समय जब दूध उबलकर बर्तन के ऊपर आ जाता है तो बच्चे जोर-जोर से 'पोंगलो पोंगल, पोंगोलो पोंगल' बोलते हुए छोटे से ढोल को बजाना शुरू कर देते हैं और भागते-दौड़ते हुए चिल्लाते हैं.
मट्टू पोंगल... खेती के उपकरणों के सम्मान का दिन
फिर आता है मट्टू पोंगल. यह पर्व का खास दिन है. इस दिन महिलाएं पक्षियों को रंगीन चावल खिलाती हैं तो वहीं किसानी परंपरा के जुड़े लोग कृषि यंत्रों की पूजा करते हैं. इस दिन गाय और बैल को सजाया जाता है, बैलों का खास शृंगार भी किया जाता है. इसके साथ उनका आभार जताया जाता है. तमिल वासी मट्टू पोंगल के दिन बैल और गायों को नहलाया जाता है और उनके सींगों को रंगा जाता है और उनकी पूजा की जाती है क्योंकि वे खेती में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
चकरई और कन्नम पोंगल... सूर्य की उपासना का दिन
पोंगल सूर्य उपासना का दिन भी है, जिसे कन्नम कहते हैं. चकरई पकवान का सूर्य देव को धन्यवाद के रूप में भोग लगाया जाता है और 'प्रसाद' के रूप में खाया जाता है. लोग अपने पड़ोसियों को भी शुभकामनाएं देते हुए चकरई पोंगल भेंट करते हैं. यह परंपरा छठ की तरह प्रसाद देने की परंपरा जैसी है. तमिलनाडु में मकर राशि के प्रवेश के साथ ही पोंगल की शुरुआत होती हैं. इस दिन सूर्य को अन्नदाता मानकर उसकी पूजा लगातार चार दिन की जाती हैं. पोंगल पर अच्छी फसल, प्रकाश और सुखदायी जीवन के लिए सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है.
विकास पोरवाल