सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला के मुद्दे पर 9 जजों की बेंच ने बीते तीन दिन सुनवाई की. इस दौरान देशभर के तमाम मंदिरों की अनोखी और खास परंपराओं का जिक्र हुआ. इस सिलसिले में केरलम के एक खास मंदिर का भी जिक्र हुआ, जो अपनी अलग अनोखी परंपरा के लिए जाना जा रहा है. सोशल मीडिया के दौर में केरलम के इस मंदिर में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है.
मंदिर में होने वाले एक खास वार्षिक अनुष्ठान के दौरान पुरुषों को न सिर्फ स्त्रियों के कपड़े पहनने होते हैं, बल्कि खूब सज-धज कर 16 शृंगार भी करना होता है.
कहां है ये मंदिर?
ये मंदिर केरलम में कोल्लम जिले के चंवारा गांव में मौजूद है. इसका नाम है कोट्टांकुलंगारा श्रीदेवी मंदिर. इस मंदिर में साल भर में एक बार कोट्टांकुलंगारा चमयविलक्कु त्योहार मनाया जाता है. हर साल मार्च महीने में, मलयालम कैलेंडर के मीनम मास के दौरान यह उत्सव आता है.
देवी भगवती को कहा जाता है वनदुर्गा
इस मौके पर हजारों श्रद्धालु एक खास अनुष्ठान में भाग लेते हैं, जिसमें आदमी, औरतों के कपड़े पहनकर देवी भगवती, जिन्हें वनदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है, उनका दर्शन पाने जाते हैं. इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण “चमयविलक्कु” अनुष्ठान है. इसमें पुरुष साड़ी, हाफ-साड़ी या पारंपरिक नृत्य वेशभूषा पहनकर हाथों में पारंपरिक दीप (विलक्कु) लेकर भव्य शोभायात्रा में शामिल होते हैं.
पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के साथ यह जुलूस बहुत आकर्षक और रंग-बिरंगा हो जाता है. स्त्री वेश में सजे पुरुष, दीपक लेकर मंदिर की ओर बढ़ते हैं और इस दौरान सभी 16 शृंगार में सजे होते हैं.
सदियों पुरानी है चमयविलक्कु की परंपरा
इस मंदिर को लेकर इलाके में किवदंती है कि मंदिर की परंपरा सदियों पुरानी है. यह परंपरा तब शुरू हुई जब कुछ ग्वाले यहां एक स्थान पर एक पत्थर पर नारियल तोड़ रहे थे. तभी उस पत्थर से खून निकलने लगा. इसे देखकर माना गया कि पत्थर में वनदेवी की शत्ति मौजूद है और इसी स्थान पर बाद में मंदिर बनाया गया.
शुरुआत में युवा लड़कियां मंदिर में फूलों की माला बनाती और दीप जलाती थीं. फिर ग्वालों ने भी स्त्री वेश धारण कर पूजा-अर्चना शुरू की, जो आगे चलकर “चमयविलक्कु” उत्सव बन गया.
कोट्टांकुलंगारा श्रीदेवी मंदिर अपनी संरचना के कारण भी खास है. यह केरलम का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां गर्भगृह (sanctum sanctorum) के ऊपर छत नहीं है. यह उत्सव स्थानीय समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसमें 25,000 से अधिक लोग भाग लेते हैं, जिनमें विभिन्न धर्मों के लोग भी शामिल होते हैं. पूरे वातावरण में भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.
16 दिनों तक चलता है उत्सव
यह उत्सव 16 दिनों तक चलता है, जिसमें मीनम मास के 10वें और 11वें दिन मुख्य कार्यक्रम आयोजित होते हैं. “चमयविलक्कु” के अलावा इसमें “केट्टुकाझ्चा” (सजावटी संरचनाओं का प्रदर्शन), विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक कला रूप भी प्रस्तुत किए जाते हैं, जो केरलम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करते हैं.
श्रद्धालुओं का मानना है कि इस उत्सव में भाग लेने, विशेषकर “चमयविलक्कु” अनुष्ठान में शामिल होने से वे देवी के करीब आते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. इसे भक्ति, विनम्रता और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है. कई पुरुष अपनी मनोकामनाएं पूरी करने और आध्यात्मिक शांति पाने के लिए इस अनुष्ठान में भाग लेते हैं.
विकास पोरवाल