बिहार की मशहूर लीची इस साल किसानों के लिए आफत बन गई है. जलवायु परिवर्तन, अनियमित मौसम और कीटों के हमले से मुजफ्फरपुर, वैशाली और पश्चिम चंपारण के लीची बागानों में भारी नुकसान हुआ है. कई किसानों का कहना है कि इस बार उनकी फसल को 70 प्रतिशत तक नुकसान हो गया है.
दरअसल, मुजफ्फरपुर को लीची की राजधानी कहा जाता है. यहां के किसान बच्चा सिंह, जो बिहार लीची एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं, उनका कहना है कि इस साल बागानों में सिर्फ 30 प्रतिशत ही लीची मिल रही है. हम भारी घाटे में हैं. वहीं, दूसरे किसान सुरेश चौधरी ने बताया कि पेड़ों पर गहरे गुलाबी और लाल रंग की स्वादिष्ट लीची दिखाई ही नहीं दे रही हैं. आमतौर पर पत्तियों के बीच लटकती खूबसूरत लीची इस बार बहुत कम हैं.
मौसम ने बिगाड़ा फसल का खेल
DTE की खबर के मुताबिक, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (NRCL) के निदेशक डॉ. विकास दास ने बताया कि नवंबर-दिसंबर 2025 में पर्याप्त ठंड नहीं पड़ी. इससे पेड़ों पर फूल आने की बजाय नई पत्तियां निकल आईं. फरवरी-मार्च में बादल छाए रहने और अनियोजित बारिश की वजह से फूलों पर 'फ्लोवर वेबर' नामक कीट का हमला हुआ, जिससे फूल नष्ट हो गए. अप्रैल में ज्यादा गर्मी पड़ने से बनी हुई लीची भी झड़ गईं. इन तीनों कारणों से इस बार लीची की पैदावार बहुत कम हो गई है.
बता दें कि बिहार पूरे भारत का 43 प्रतिशत लीची उत्पादन करता है. मुजफ्फरपुर जिले में ही करीब 12,000 हेक्टेयर में लीची के बागान हैं. शाही लीची को GI टैग भी मिला हुआ है. लेकिन इस साल पूरे बिहार में सैकड़ों बागानों की स्थिति खराब है.किसान भोला नाथ झा बताते हैं कि 40-50 एकड़ के बागान में पहले 25,000 बॉक्स लीची निकलती थी, इस बार सिर्फ 7,000-8,000 बॉक्स ही निकली है.
किसानों और उपभोक्ताओं दोनों पर असर
लीची उत्पादक संघ से जुड़े किसान कह रहे हैं कि मौसम की अनियमितता हर साल बढ़ रही है. अप्रैल-मई में आंधी-तूफान और तेज हवाएं भी लीची गिरा देती हैं. बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद फेजा अहमद ने कहा कि लीची को सही तापमान, नमी और मौसम की जरूरत होती है. मौसम में बदलाव से न सिर्फ मात्रा, बल्कि लीची की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है. इस साल बिहार के बाहर रहने वाले लीची प्रेमी भी इस मीठे और सुगंधित फल का स्वाद कम ही ले पाएंगे.
आजतक एग्रीकल्चर डेस्क