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वाराणसी में किन्नरों की आत्मा की शांति के लिए कराया गया त्रिपिंडी श्राद्ध

किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि इस बार वे न केवल किन्नरों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कर रही हैं बल्कि कोरोना काल में मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों के लिए भी कर रही हैं. इसके अलावा हाल ही में उनके समाज की एकता शास्त्री की दिल्ली में हुई हत्या के बाद आत्मा की शांति के लिए भी त्रिपिंडी श्राद्ध किया जा रहा है.

किन्नरों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किन्नरों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अलग-अलग राज्यों से जुटे किन्नर समाज के लोग
  • कोरोना काल में मृतकों के लिए भी पिंडदान
  • किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर रहीं मौजूद

माना जाता है कि महाभारत काल में सिखंडी ने पहली बार किन्नरों का पिंडदान किया था. उसके बाद ये चौथा मौका है, जब देशभर के विभिन्न प्रांतों से जुटे किन्नरों ने किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर की मौजूदगी में न केवल किन्नरों बल्कि कोरोना काल में मृतकों के लिए और दिल्ली में निर्मम हत्या की शिकार हुई किन्नर एकता जोशी के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया. 

किन्नर अखाड़े की ओर से किन्नरों के लिए होने वाले इस पिंडदान के पीछे मान्यता है कि जीवन में 16 कर्मों से इंसान को गुजरना पड़ता है, लेकिन किन्नर समाज पिंडदान से वंचित रह जाता है. इसी कर्म को पूरा करने के लिए बुधवार को एक बार फिर वाराणसी में सार्वजनिक रूप से किन्नरों का पिंडदान किया गया.

पितृ पक्ष में सनातनी अपने पितरों को तारने के लिए पिंडदान की परंपरा निभाते हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि उनको मुक्ति कैसे मिलेगी जिनके जन्म के बाद न केवल उनके अपनों ने बल्कि समाज ने भी अस्वीकार कर दिया हो. यहां बात हो रही है किन्नर यानी थर्ड जेंडर की.
इसका जवाब धर्म की नगरी काशी के तीर्थ पिशाचमोचन पर हर दूसरे साल तब मिलता है जब किन्नर अखाड़े की अगुवाई में किन्नरों का त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है. इसमें शरीक होने के लिए देश भर से किन्नर समाज के लोग जुटते हैं. पितृ पक्ष में एक बार फिर वाराणसी के पिशाचमोचन तीर्थ पर ऐसा ही देखने को मिला. 

इस बारे में और जानकारी देते हुए किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि इस बार वे न केवल किन्नरों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कर रही हैं बल्कि कोरोना काल में मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों के लिए और हाल ही में उनके समाज की एकता शास्त्री की दिल्ली में हुई हत्या के बाद आत्मा की शांति के लिए भी त्रिपिंडी श्राद्ध किया जा रहा है.
उन्होंने बताया कि 2015 में जब से किन्नर अखाड़े की स्थापना हुई है, तभी से किन्नर अखाड़े के प्रमुख किन्नर और मैं खुद काशी के पिशाचमोचन तीर्थ पर हर दूसरे साल आकर पिंडदान करते हैं. पिशाचकुंड और बद्रीकुंड पूरे देश में दो कुंड हैं जहां सामूहिक पिंडदान किया जा सकता है, ऐसा शास्त्रों में भी लिखा है. उन्होंने बताया कि हर आत्मा को हक है कि उसको परमधाम पहुंचाया जाए, इसलिए उनकी गद्दी पर बैठने के बाद से ही सामूहिक रूप से किन्नर समाज के मृत लोगों के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध हर दूसरे साल कराया जाने लगा.

त्रिपिंडी श्राद्ध और पिशाचमोचन तीर्थ के महत्व के बारे में बताते हुए पिशाचमोचन मंदिर के महंत मुन्नालाल पांडेय ने बताया कि पूरे विश्व में, चाहे जैसा भी प्रेत योनी में गई आत्मा हो, उसे त्रिपिंडी श्राद्ध से मुक्ति मिल जाती है. अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की आत्मा को त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से ही शांत किया जाता है. त्रिपिंडी का अर्थ होता है तीन तरह के देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश. तीन तरह के प्रेत भी होते हैं. जिस तरह का प्रेत होता है, उसे उसी लोक में त्रिपिंडी श्राद्ध के माध्यम से भेजा जाता है. उन्होंने बताया कि किन्नर अखाड़े की ओर से शुरू कराए गए त्रिपिंडी श्राद्ध के बाद से ही अन्य किन्नर भी उनके पिशाचमोचन तीर्थ पर आकर त्रिपिंडी श्राद्ध करा कर चले जाते हैं.

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