गिरती करेंसी या सत्ता परिवर्तन... ईरान में 'जानलेवा' प्रदर्शनों की असली वजह क्या है? 

रियाल की ऐतिहासिक गिरावट ने ईरान की सरकार के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है. प्रदर्शन दबाने की कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है. जो आंदोलन आर्थिक विरोध के तौर पर महंगाई और गिरती करेंसी के खिलाफ शुरू हुआ था,  वो अब ईरान की सत्ता के लिए इस्लामिक क्रांति के बाद की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.

Advertisement
ईरान में आर्थिक संकट से भड़का आंदोलन अब सत्ता के खिलाफ खुले विद्रोह में बदल गया (Photo: AP) ईरान में आर्थिक संकट से भड़का आंदोलन अब सत्ता के खिलाफ खुले विद्रोह में बदल गया (Photo: AP)

दीपू राय

  • नई दिल्ली,
  • 12 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:38 PM IST

जो आंदोलन आर्थिक विरोध के तौर पर महंगाई और गिरती करेंसी के खिलाफ शुरू हुआ था,  वो अब ईरान की सत्ता के लिए इस्लामिक क्रांति के बाद की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. बीते दो हफ्तों में 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और करीब दस हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

इंटरनेट बंदी के बावजूद सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं जिनमें प्रदर्शनकारियों की मौत और अस्पतालों के बाहर पड़े शव देखे जा सकते हैं. शुरुआत में ईरान के राष्ट्रपति ने प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति जताई थी लेकिन अब वो 'दंगाइयों' को देश को अस्थिर नहीं करने देने की बात कह रहे हैं.

Advertisement

करेंसी का पतन

इस पूरे संकट के केंद्र में है ईरान की तेजी से गिरती मुद्रा, रियाल. दिसंबर के आखिर में जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रियाल बुरी तरह टूटा और महंगाई पहले से ही ऊंची थी, तब व्यापारी और यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर आए.

पिछले दो साल में रियाल अपनी कीमत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा खो चुका है. साल 2024 में 1 डॉलर की कीमत करीब 5 लाख रियाल थी. फिर जनवरी 2026 तक 1 डॉलर की कीमत 15 लाख रियाल से ज्यादा (10 जनवरी तक के आंकड़े) हो गई. इस गिरावट ने आम ईरानियों की बचत और खरीदने की ताकत पूरी तरह तोड़ दी है.

महंगाई 40 फीसदी से ऊपर है. दवाइयों और जरूरी खाने-पीने के सामान जैसी आयातित चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं. इसका सबसे गहरा असर ईरान के मिडिल क्लास पर पड़ा है.

Advertisement

ईरानी क्यों सड़कों पर हैं? 

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के दबाव में है. पिछले साल जून में इजरायल के साथ हुई 12 दिन की जंग ने देश के आर्थिक संसाधनों को और कमजोर कर दिया, जिससे करेंसी और तेजी से गिरी.

प्रदर्शनकारियों ने 'तानाशाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए और धार्मिक शासन की खुलकर आलोचना की. जो आंदोलन आर्थिक मांगों से शुरू हुआ था, वो अब राजनीतिक बदलाव की मांग में बदलता जा रहा है. कुछ लोग सीधे इस्लामिक रिपब्लिक को उखाड़ फेंकने की बात कर रहे हैं.

सरकार का जवाब

शुरुआत में सरकार ने प्रदर्शनकारियों की बात सुनने के संकेत दिए. फिर इस महीने सरकार ने ज्यादातर नागरिकों को करीब 7 डॉलर महीने की मदद देने का ऐलान किया. राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने जनता की 'वाजिब शिकायतों' को स्वीकार किया. सेंट्रल बैंक के नए प्रमुख की नियुक्ति की गई. लेकिन अब सरकार का रुख सख्त हो गया है, जैसा पहले के आंदोलनों में देखा गया था. इंटरनेट और फोन नेटवर्क बंद किए जा रहे हैं और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हो रही हैं. विदेशी एयरलाइंस ने ईरान के लिए उड़ानें रद्द कर दी हैं. 

मानवाधिकार संगठनों द्वारा सत्यापित वीडियो में दिख रहा है कि कई शहरों में सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर सीधी गोलीबारी की.
मौतों की असली संख्या बताई जा रही संख्या से कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि पीड़ित परिवारों को चुप रहने का दबाव डाला जा रहा है.

Advertisement

वैश्विक चिंता

दुनिया भर के नेता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर ईरान की मौजूदा सरकार गिरती है, तो इसका असर वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ेगा. व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सैन्य कार्रवाई के विकल्पों पर ब्रीफ किया है. इसका कच्चे तेल की कीमतों पर भी असर दिखा है. ब्रेंट क्रूड 5 फीसदी से ज्यादा उछलकर 63 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि ईरान का मुख्य तेल उत्पादक इलाका खुजेस्तान सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है या नहीं.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कहा कि हिंसा और जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग की खबरें चौंकाने वाली हैं. ईरान के लोगों को बिना डर के शांतिपूर्वक अपनी बात रखने का हक है. हालांकि ईरान की हालत कमजोर है. अर्थव्यवस्था खराब है और इजरायल के हमले भी झेल चुका है लेकिन उसके पास अभी भी बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़ा जखीरा और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स जैसे वफादार सुरक्षा बल मौजूद हैं.

गौरतलब है कि प्रदर्शन अब तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुके हैं और करेंसी संकट थमता नहीं दिख रहा. सरकार के सामने दो ही रास्ते, ऐसे आर्थिक सुधार करना, जो उसकी सत्ता को कमजोर कर सकते हैं, दमन जारी रखना और बड़े विद्रोह का जोखिम उठाना ही हैं. विश्लेषकों का कहना है कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि सुरक्षा बल कितने समय तक सरकार के साथ खड़े रहते हैं. फिलहाल बड़े पैमाने पर बगावत के संकेत नहीं हैं, लेकिन अगर आर्थिक हालात और बिगड़े तो यह संतुलन टूट सकता है.

Advertisement

आम ईरानियों के लिए फिलहाल सवाल राजनीति का नहीं, जीने का है. हर दिन बढ़ती कीमतों और खत्म होती बचत के बीच लोग जरूरी चीजें खरीदने तक के लिए जूझ रहे हैं. ईरान का भविष्य इस बात पर टिका है कि सरकार कितनी जल्दी करेंसी को संभाल पाती है और जनता को राहत दे पाती है.

क्या बोले बड़े नेता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि मिलिट्री इस पर नजर रखे हुए है. हमारे पास बहुत मजबूत विकल्प हैं. फैसला किया जाएगा. वहीं ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि  प्रदर्शनों को जानबूझकर हिंसक बनाया गया ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति को दखल देने का बहाना मिल सके.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement