दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है मिस्र. इस देश की राजधानी काहिरा की चकाचौंध से दूर, मुकट्टम पहाड़ियों की तलहटी में बसा एक ऐसा शहर है जिसे दुनिया 'गारबेज सिटी' कहती है. इसका आधिकारिक नाम मनशियत नासिर है. यहां घर की छतें, गलियां और कमरों के बाहर का हिस्सा फर्नीचर से नहीं, बल्कि प्लास्टिक की बोतलों, टिन के डिब्बों और कागजों के ढेर से भरा होता है.
लेकिन, यहां की लाइफस्टाइल को समझने के लिए आपको अपनी आंखों से गंदगी का चश्मा हटाकर मेहनत और हुनर का चश्मा पहनना होगा. अगर आप यहां पहली बार आएंगे, तो आपको लगेगा कि किसी विशाल डंपिंग यार्ड में आ गए हैं, लेकिन हकीकत में यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे कुशल 'रीसाइक्लिंग हब' है.
यहां रहने वाले लगभग 2.5 लाख लोगों में 70 हजार लोग कचरे से जुड़े काम में लगे हुए हैं. इन्हें 'जबालिन' कहा जाता है, जिसका अर्थ है कचरा उठाने वाले. इनकी सुबह मशीनी अलार्म से नहीं, बल्कि काहिरा से कचरा भरकर आने वाले ट्रकों की आवाज से होती है. यहां की जीवनशैली की बात करें तो यहां का हर घर एक छोटी फैक्ट्री है. जिसे हम कूड़ा समझकर फेंक देते हैं, ये लोग उसे 'करेंसी' में बदलकर फैक्ट्रियों को बेचते हैं.
घर की महिलाएं और बच्चे घंटों बैठकर कचरे को अलग-अलग करते हैं. उनके पास किसी मशीन से ज्यादा तेज पारखी नजर होती है. वे हर चीज को उसकी श्रेणी के हिसाब से बांटते हैं- प्लास्टिक को दानों में बदला जाता है, लोहे को गलाया जाता है और कागज की लुगदी बनाई जाती है. दिलचस्प बात यह है कि यह शहर केवल मिस्र की सफाई नहीं कर रहा, बल्कि यहां से रीसायकल होकर कच्चा माल चीन और यूरोप के बाजारों तक पहुंचता है. यहां के लोग अनपढ़ कहे जा सकते हैं, लेकिन उनकी 'सप्लाई चेन' मैनेजमेंट किसी एमबीए प्रोफेशनल को भी हैरान कर सकती है.
ये इंडस्ट्री इतनी बड़ी है कि जब दुनिया के बड़े-बड़े देश अपने कचरे का मुश्किल से 30% रीसायकल कर पाते हैं, तो मनशियत नासिर के ये लोग 80% से 90% कचरे को रीसायकल कर देते हैं. जब मिस्र सरकार ने शहर की सफाई के लिए विदेशी कंपनियों को ठेका दिया, तो वे मशीनें फेल हो गईं, क्योंकि वे उस बारीकी से छंटाई नहीं कर पाईं जो काम जबालिन लोग अपने हाथों से सदियों से कर रहे थे. अंत में सरकार को वापस इन्हीं लोगों का सहारा लेना पड़ा.
लेकिन यहां की जिंदगी आसान नहीं है. हवा में हमेशा धूल और कचरे की गंध रहती है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आम हैं. 2009 में जब सरकार ने 'स्वाइन फ्लू' के डर से यहां के हजारों सूअरों को मार दिया, तो यहां की इकोनॉमी ढह गई थी. ये सूअर यहां के 'ऑर्गेनिक डिस्पोजल सिस्टम' का हिस्सा थे, जो बचा-कुचा खाना खाकर कचरा साफ करते थे. लेकिन यहां के लोगों ने हार नहीं मानी और फिर से अपने पैरों पर खड़े हुए.
यहां की आबादी ईसाई बहुलता वाली है. इतनी गंदगी और सड़ांध के बीच यहां एक ऐसी जगह है जो रूह को सुकून देती है. यहां पहाड़ को काटकर बनाया गया है 'सेंट सिमन द टैनर चर्च'. यह मध्य पूर्व का सबसे बड़ा चर्च है, जो एक विशाल प्राकृतिक गुफा के अंदर बना है. यहां 20,000 से ज्यादा लोग एक साथ बैठ सकते हैं. यहां की दीवारों पर की गई नक्काशी दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करती है.
इस शहर को काहिरा की किडनी कहा जाता है. जहां दुनिया कचरे को समस्या मानती है, मनशियत नासिर उसे समाधान मानता है. कचरे के ढेर में बसा यह शहर हमें सिखाता है कि बेकार कुछ भी नहीं होता, जब तक कि हमारी सोच उसे बेकार न मान ले. ये लोग काहिरा की किडनी की तरह हैं. अगर ये एक दिन काम न करें, तो पूरा मिस्र कचरे के ढेर में दब जाए.
इस शहर का सामाजिक ढांचा भी इसी कचरे पर टिका है. छोटे बच्चे स्कूल से आने के बाद अपने माता-पिता के साथ बैठकर कचरे के ढेर में से कीमती धातुएं ढूंढते हैं. उनके लिए यह गंदगी नहीं, बल्कि उनका भविष्य है. इस शहर में खिलौनों की दुकानों से ज्यादा रीसाइक्लिंग मशीनें और कंप्रेसर देखने को मिलते हैं. यहां की शादियों का खर्च हो या बच्चों की पढ़ाई, सब कुछ उस 'वेस्ट' से निकलता है जिसे दुनिया ने ठुकरा दिया है.
आज जब पूरी दुनिया 'सस्टेनेबल लिविंग' की बात कर रही है, मनशियत नासिर के ये गुमनाम योद्धा बिना किसी शोर-शराबे के धरती को बचाने के मिशन में जुटे हैं. उनके लिए यह कचरा सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि उनके बच्चों की स्कूल फीस, उनके घरों का चूल्हा और उनके बेहतर भविष्य की उम्मीद है.
संदीप कुमार सिंह