मिडिल ईस्ट में गदर चरम पर पहुंच चुका है. एक तरफ ईरान अपनी ताकत से महाशक्ति को लगातार ललकार रहा है. वहीं, दूसरी ओर अमेरिका ने भी उसकी तबाही की स्क्रिप्ट तैयार कर ली है. अब अमेरिकी सेना 82वें एयरबोर्न डिवीजन से मिडिल ईस्ट में करीब 1,000 सैनिक भेजने की तैयारी कर रही है. 82वीं एयरबोर्न अमेरिका की सबसे तेज रैपिड रिस्पॉन्स फोर्स है, जो 18 घंटे के अंदर दुनिया के किसी भी कोने में पैराशूट से उतर सकती है.
इधर, अमेरिका ने ईरान के बीच जारी युद्ध को खत्म करने के लिए 15 शर्तों के साथ एक प्रस्ताव रखा. ये प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए ईरान को भेजा गया, क्योंकि पाकिस्तान ने मध्यस्थता की पेशकश की थी. हालांकि, ईरान ने ट्रंप का प्रस्ताव ठुकरा दिया है और अपनी 5 मांगें रख दी हैं.
दोनों पक्षों के बातचीत अटकने के कारण
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत अटकने के पीछे कई जटिल कारण हैं. सबसे प्रमुख मुद्दा परमाणु कार्यक्रम है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे, जबकि ईरान इसे अपने राष्ट्रीय अधिकार के रूप में देखता है.
आर्थिक प्रतिबंध भी बड़ा कारण है. अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है. ईरान चाहता है कि पहले ये प्रतिबंध हटाए जाएं, जबकि अमेरिका पहले परमाणु सीमाओं का पालन सुनिश्चित करना चाहता है.
इसके अलावा इजरायल और खाड़ी देशों के साथ अमेरिका के संबंध, ईरान का विभिन्न समूहों को समर्थन, दोनों पक्षों के बीच अविश्वास बढ़ाते हैं.
ट्रंप के बयान अब तक भटकाने वाले रहे. 23 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगले 5 दिन तक ईरान के पावर प्लांट और अन्य ऊर्जा संसाधनों पर कोई हमला नहीं किया जाएगा. इसे हाफ सीजफायर कहा गया था. इससे पहले ट्रंप ने ईरान को ‘48 घंटे की डेडलाइन’ दी थी कि वो होर्मुज स्ट्रेट को खोल दें, वरना उसे बड़े हमलों का सामना करना पड़ेगा.
अब तक ट्रंप के बयान कभी कूटनीति तो कभी भटकाने वाले रहे हैं. उसका असल मतलब समझना भी मुश्किल साबित हो रहा है. इन तमाम बयानों के बीच वार-पलटवार का दौर थमा नहीं है. बुधवार को ईरान ने दावा किया कि उसने अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन की ओर क्रूज मिसाइल दागी है. हालांकि अमेरिका ने इसकी पुष्टि नहीं की है. वहीं, अब अमेरिका जमीनी जंग की तैयारी में जुट गया है.
होर्मुज दोनों के लिए रणनीतिक हथियार
ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच जारी लड़ाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अटकी गई है. ये फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है. इसका आर्थिक महत्व बहुत ज्यादा है. दुनिया के तेल का करीब 20 फीसदी इसी रास्ते से आता-जाता है. युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने इस रास्ते को अपने दुश्मन देशों के लिए बंद कर दिया है. इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है.
ईरान के लिए होर्मुज एक शक्तिशाली रणनीतिक हथियार के रूप में देखा जाता है. तनाव की स्थिति में वह इस मार्ग को अवरुद्ध करने की धमकी देकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना सकता है. दूसरी ओर, अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक बनाए रखता है ताकि वैश्विक व्यापार निर्बाध रूप से चलता रहे और अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. इसी वजह से होर्मुज को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव की आशंका बनी रहती है.
अमेरिका कहां से कर सकता है जमीनी हमला?
चाबहार पोर्ट: ईरान का एकमात्र ओपन ओशन पोर्ट, पाकिस्तान बॉर्डर से सिर्फ 150 किलोमीटर दूर है. अमेरिका यहां से कब्जा करके होर्मुज की तरफ बढ़ सकता है. चाबहार सबसे चर्चित और संभावित जगह है क्योंकि यहां से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक पहुंचा आसान है.
दूसरी अहम कड़ी है खार्ग द्वीप. जहां से ईरान का अधिकांश तेल निर्यात होता है. यहां दबाव सीधे ईरानी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
अमेरिका की क्या है तैयारी?
-4500 मरीन्स, USS Tripoli और USS Boxer जैसे अम्फीबियस असॉल्ट तैनात
-USS Abraham Lincoln और USS Gerald R. Ford भी खाड़ी में मौजूद है.
-F-35 जेट्स, हेलीकॉप्टर और 50 हजार सैनिक पहले से तैनात हैं. अब 1000 RRF और आ रही है.
इस बीच संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि युद्ध को तुरंत समाप्त करना चाहिए. ये संघर्ष अब बहुत ज्यादा बढ़ चुका है और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है.
क्या हैं ईरान की मांगें
ईरान की पहली मांग है कि दुश्मन की ओर से हमला और हत्याएं पूरी तरह रोकना. ऐसा मैकेनिज्म तैयार करना, जिसके तहत ईरान पर दोबारा युद्ध थोपा ना जा सके. युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई और मुआवजे के भुगतान की स्पष्ट और गारंटीयुक्त व्यवस्था. पूरे क्षेत्र के सभी मोर्चों और सभी प्रतिरोधी समूहों के लिए युद्ध पूरी तरह से खत्म हो. होर्मुज को लेकर ईरान के संप्रभु अधिकार की अंतरराष्ट्रीय मान्यता और गारंटी.
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