ईरान के निर्वासित शहजादे रज़ा पहलवी ने सोमवार को स्वीडन की संसद में संबोधन के दौरान ईरान की मौजूदा स्थिति और वहां चल रहे जनआंदोलन पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने साफ-साफ कहा कि ईरान का भविष्य किसी बाहरी ताकत से नहीं, बल्कि वहां की जनता के फैसलों से तय होगा.
अपनी स्पीच में पहलवी ने कहा कि आज ईरान में जिस तरह का स्ट्रगल है, जैसा संघर्ष वहां के लोग कर रहे है, उसे समझना बेहद जरूरी है. उनके मुताबिक, यह लड़ाई सुधारवादियों और कट्टरपंथियों के बीच नहीं है, बल्कि 'कब्जे और आजादी' के बीच की लड़ाई है. उन्होंने इसे एक राष्ट्र की आत्मा के लिए जारी संघर्ष करार देते हुए कहा कि जो कुछ ईरान में हो रहा है, वह कोई क्षणिक विरोध नहीं, बल्कि एक पीढ़ीगत विद्रोह है. पहलवी ने इसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे बड़ा और गहरा जनआंदोलन बताया.
'ईरान में असली जंग इस्लामिक रिपब्लिक और जनता के बीच'
पहलवी ने यह भी कहा कि ईरान में असली जंग इस्लामिक रिपब्लिक और वहां की जनता के बीच है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह संघर्ष हर गुजरते दिन के साथ और तेज होता जा रहा है और इसमें किसी तरह का सीजफायर देखने को नहीं मिला है. उनके मुताबिक, ईरान की सत्ता ने अपनी स्थापना के बाद से कभी एक सामान्य सरकार की तरह व्यवहार नहीं किया.
उन्होंने कहा कि ईरान ने अपने प्रभाव को केवल देश के भीतर ही सीमित नहीं रखा, बल्कि बेरूत, बगदाद और सना जैसे शहरों तक अपने नेटवर्क और प्रभाव का विस्तार किया है. यह विस्तार क्षेत्रीय राजनीति में उसकी सक्रिय भूमिका को सामने रखता है. इंटरनेट बैन और विरोध को दबाने की कार्रवाई का जिक्र करते हुए पहलवी ने कहा कि ईरानी सरकार ने विरोध की आवाजों को दबाने के लिए इंटरनेट सर्विस बैन की. असहमति जताने वालों को खामोश किया और निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी तक की. उन्होंने कहा कि इस दमन का असर बेहद गंभीर और विनाशकारी रहा है.
अपनी स्पीच के अंत में पहलवी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह ईरान के लोगों की आवाज को समझें और उनके अधिकारों के समर्थन में खड़े हों, क्योंकि आखिरकार बदलाव की ताकत ईरान की जनता के हाथ में ही है.
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