मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को और अस्थिर कर सकता है. साथ ही इससे दुनिया का ध्यान रूस-यूक्रेन युद्ध से भी हट सकता है, जो अब अपने पांचवें साल में पहुंच चुका है. यूरोपीय राजनयिकों ने चेतावनी दी कि यह संघर्ष बढ़ा तो इसके असर पूरी दुनिया पर पड़ेंगे. उनका कहना है कि यूरोप इस युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन इसके प्रभाव उसे भी झेलने पड़ रहे हैं, इसलिए सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और शांति पर जोर दिया जाना चाहिए.
'रूस के तेल पर लगाए गए प्राइस कैप न हटे'
India Today Conclave 2026 में भारत में जर्मनी के राजदूत Philipp Ackermann ने कहा कि रूस के तेल पर लगाए गए प्राइस कैप को हटाने के अमेरिकी फैसले से यूरोप सहमत नहीं है. उनका मानना है कि इससे रूस को आर्थिक ताकत मिलेगी और वह यूक्रेन में युद्ध को जारी रख सकेगा. उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों और यूरोपीय संघ ने 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए थे. Russian invasion of Ukraine के बाद यह कदम उठाया गया था ताकि रूस की आय कम की जा सके.
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर मिडिल ईस्ट के युद्ध का असर
एकरमैन ने कहा, 'मेरी राय है कि रूसी तेल की कीमत पर लगी सीमा हटाना अच्छा विचार नहीं है, क्योंकि हम नहीं चाहते कि रूस को इतना पैसा मिले कि वह यूक्रेन में फिर से युद्ध शुरू कर सके.” उन्होंने यह भी कहा कि 'हम रूसी तेल नहीं खरीदते और हमारे पास इसकी एक बूंद भी नहीं आती.' उन्होंने बताया कि मध्य पूर्व में युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर दिखने लगा है. 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमलों के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए. इसके जवाब में ईरान ने अमेरिकी और इज़राइली जहाजों से जुड़े जहाजों के लिए समुद्री रास्ते पर रोक लगा दी.
'हम शामिल नहीं फिर युद्ध का असर झेल रहे'
एकरमैन ने कहा कि Strait of Hormuz लगभग बंद होने की स्थिति में है, जिससे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा, 'यूरोप में कीमतें बढ़ रही हैं, हमारी अर्थव्यवस्थाएं धीमी हो रही हैं और लोग असंतुष्ट हैं. यह उस युद्ध के परिणाम हैं जिसमें हम सीधे शामिल भी नहीं हैं.' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी यूरोपीय देश इस युद्ध का हिस्सा नहीं है. 'यह हमारा युद्ध नहीं है. कोई भी यूरोपीय देश इसमें शामिल नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अमेरिका से बातचीत नहीं करते या उनसे यह नहीं पूछते कि आगे की योजना क्या है.'
जर्मन राजदूत ने यह भी कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में मध्य पूर्व में यूरोपीय संघ का कूटनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है, जबकि अमेरिका और इज़राइल का प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं दिख रहा. हालांकि उन्होंने माना कि फिलहाल यूरोप के पास ऐसा कोई बड़ा तरीका नहीं है जिससे वह सीधे हस्तक्षेप कर शांति स्थापित कर सके. उन्होंने यह भी चिंता जताई कि दुनिया का ध्यान रूस-यूक्रेन युद्ध से हटता जा रहा है. 'रूस के आक्रामक युद्ध में लाखों लोगों की जान जा चुकी है और अब वैश्विक ध्यान उससे हट रहा है. यह चिंता की बात है. हमें उस युद्ध को खत्म करने की कोशिशें भी जारी रखनी चाहिए.'
'कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहा है यूरोप'
वहीं भारत में इटली के राजदूत Antonio Bartoli ने कहा कि यूरोप ईरान से जुड़े इस युद्ध का समर्थन नहीं करता और कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहा है. उन्होंने कहा, “यह वह युद्ध है जिसे हम नहीं चाहते थे. हम इसमें शामिल नहीं हैं और न ही शामिल होंगे.” उन्होंने बताया कि इटली मध्य पूर्व के देशों के साथ कूटनीतिक प्रयासों में लगा हुआ है. बार्तोली ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी चिंता जताई. उनके मुताबिक ईरान में यूरेनियम संवर्धन का स्तर 60 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच चुका है, जबकि नागरिक परमाणु कार्यक्रम वाले देशों, जैसे United Arab Emirates, में ऐसा नहीं होता. उन्होंने कहा कि इतने उच्च स्तर का संवर्धन परमाणु हथियार और लंबी दूरी की मिसाइल बनाने में इस्तेमाल हो सकता है, जो यूरोप तक पहुंच सकती हैं.
उन्होंने बताया कि इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni यूरोपीय नेताओं के संपर्क में हैं और क्षेत्रीय साझेदारों के साथ लगातार बातचीत कर रही हैं. इसी कार्यक्रम में भारत में स्पेन के राजदूत Juan Antonio March Pujol ने भी कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि समय के अनुसार उन्हें और मजबूत बनाना चाहिए. उन्होंने भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar के एक पुराने बयान का जिक्र करते हुए कहा कि मानव इतिहास के मुकाबले संयुक्त राष्ट्र का इतिहास बहुत छोटा है, इसलिए इसे और बेहतर बनाने की जरूरत है.
वैश्विक ऊर्जा बाजार और सुरक्षा व्यवस्था पर असर
पुजोल ने कहा कि स्पेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है. साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि मध्य पूर्व में अस्थिरता का असर बहुत तेजी से यूरोप तक पहुंच सकता है. उन्होंने कहा कि Syrian Civil War के दौरान करीब 80 लाख शरणार्थियों का संकट पैदा हुआ था. इसलिए क्षेत्र में किसी भी तरह का संघर्ष पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.
यूरोपीय राजनयिकों का कहना है कि अगर ईरान से जुड़ा युद्ध और बढ़ा तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा. इसलिए जरूरी है कि कूटनीति के जरिए तनाव कम किया जाए और युद्ध को फैलने से रोका जाए.
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