ईरान-अमेरिका की जंग के बीच दुनियाभर के देशों की मुद्रा में भारी अस्थिरता देखने को मिली है. भारतीय रुपया भी रिकॉर्ड स्तर तक गिर गया है और एक डॉलर की कीमत 95 रुपये से अधिक हो गई है. इसे देखते हुए भारत अन्य ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर एक डिजिटल पेमेंट सिस्टम विकसित करने की प्लानिंग कर रहा है. ब्रिक्स देश एक ऐसे डिजिटल पेमेंट फ्रेमवर्क पर काम कर रहे हैं जो पश्चिमी प्रतिबंधों, टैरिफ और अमेरिकी डॉलर की अस्थिरता के प्रभाव को कम कर सकता है. हालांकि इसमें यह भी ध्यान में रखा जा रहा है कि इस फ्रेमवर्क से अमेरिकी नेतृत्व वाले ग्लोबल फाइनेंसिंग सिस्टम में अस्थिरता न आए.
इस प्लान को भारत के केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पेश किया है. प्रस्ताव के तहत ब्रिक्स देश सीमा-पार लेनदेन को स्थानीय मुद्राओं में निपटाने की अनुमति देने पर विचार कर रहा है.
विश्लेषकों के अनुसार, इसका असरदार साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि समूह के सदस्य पश्चिम-नियंत्रित पेमेंट चैनलों पर अपनी निर्भरता को कितनी हद तक कम कर सकते हैं, बिना अमेरिका को चिंतित किए.
ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की 14-15 मई को नई दिल्ली में बैठक होनी है जो 10-11 सितंबर को होने वाले शिखर सम्मेलन से पहले होगी. बैठक में पेमेंट कनेक्टिविटी और व्यापार सेटलमेंट एजेंडा के प्रमुख मुद्दों में शामिल होने की उम्मीद है.
2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने ब्रिक्स का गठन किया था जिसके बाद इसमें दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को सदस्य के रूप में शामिल किया है.
पेमेंट सिस्टम ब्रिक्स देशों को पावर देगा
नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर चाइनीज स्टडीज में वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर गीता कोच्छर ने हॉन्गकॉन्ग स्थित अखबार 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' से बात करते हुए कहा कि ब्रिक्स के भीतर एक फाइनेंशियल पेमेंट सिस्टम सदस्य देशों को बहुत फायदा पहुंचाएगा और इससे उन पर बाहरी बदलावों का असर कम होगा.
उन्होंने कहा, 'पश्चिम के आर्थिक दबाव के खिलाफ इम्यूनिटी देने वाला यह एक रणनीतिक उपकरण साबित होगा. अगर डॉलर में अस्थिरता भी होती है, तो इसका पेमेंट पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि यह लगभग रियल-टाइम भुगतान होगा.'
ऐसा सिस्टम भारतीय रुपये और अन्य ब्रिक्स मुद्राओं को अधिक पावर देगा. इसके बाद इन देशों को पश्चिम के मध्यस्थ बैंकों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा और डॉलर को दूसरी मुद्रा में बदलने में जो कंवर्जन फीस लगती है, वो भी नहीं लगेगी.
फरवरी में दिल्ली में हुई एक तैयारी बैठक के दौरान, ब्रिक्स सदस्यों ने सीमा-पार भुगतान और सेटलमेंट फ्रेमवर्क की जरूरत पर जोर दिया.
रूस और ईरान सालों से पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं, जिसके कारण वो वैश्विक बाजारों में अपने उत्पादों को बेचने में असमर्थ रहे हैं. पश्चिमी देशों ने इन देशों को अपने प्रभुत्व वाले स्विफ्ट सीमा-पार पेमेंट नेटवर्क से बाहर कर दिया है जिस कारण रूस, ईरान को भारी नुकसान हुआ है. रूस ने स्विफ्ट सिस्टम से बाहर होने के बाद एशिया के अपने सहयोगी देशों भारत और चीन को तेल बेचकर यूक्रेन के साथ युद्ध के बीच भी अपनी अर्थव्यवस्था संभाल रखी है.
गीता कोच्छर ने कहा कि एक ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम भारत और अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण वस्तुओं के आयात और पश्चिम के वित्तीय प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए 'बीमा पॉलिसी' होगी.
उन्होंने बताया कि ब्रिक्स अपनी आर्थिक ताकत के कारण आंतरिक मुद्रा प्रबंधन को आकार दे सकता है, क्योंकि वैश्विक तेल का लगभग 42 प्रतिशत और अनाज का 40 प्रतिशत उत्पादन इस समूह के सदस्य देश करते हैं.
अमेरिका को नाराज करने की जोखिम नहीं ले सकता भारत
121 सदस्यीय गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक सदस्य के रूप में, भारत ब्रिक्स के अलावा अन्य संस्थानों और मंचों के साथ अपने संबंधों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. इसी के तहत भारत क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड), का सदस्य बना जिसमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं.
दिल्ली के काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने कहा कि भारत को अपने ब्रिक्स प्रस्ताव को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नाराज करने से बचना चाहिए, क्योंकि वो अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौता करने की कोशिश कर रहा है.
धर ने कहा कि ट्रंप अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले किसी भी कदम से खुश नहीं होंगे और भारत के व्यापार प्रतिनिधियों को बातचीत के दौरान इस मुद्दे का ध्यान रखना चाहिए.
प्रस्तावित ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम ऐसे समय में आ रहा है जब चीन और भारत वैश्विक व्यापार में अपनी-अपनी मुद्राओं के उपयोग को बढ़ाने देने की कोशिश कर रहे हैं.
धर ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अगर ब्रिक्स देशों ने अपनी मुद्राओं का इस्तेमाल शुरू कर दिया तो अमेरिकी डॉलर में निवेशकों का विश्वास कमजोर हो सकता है.
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन के उप निदेशक विवेक मिश्रा ने कहा कि इस पेमेंट सिस्टम को शुरू करने से पहले भारत को अमेरिका को भरोसे में लेना चाहिए कि इससे डॉलर को चुनौती नहीं मिलेगी.
उन्होंने कहा, 'भारत को अमेरिका को आश्वस्त करना चाहिए कि यह प्रस्ताव वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर को चुनौती नहीं देगा और ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम का मकसद अकाउंट सेटलमेंट की प्रक्रिया को आसान बनाना है. जैसे कि रूस से तेल खरीद के लिए भारत अपनी मुद्रा में पेमेंट करता है.
उन्होंने आगे कहा, 'यह सिस्टम ब्रिक्स के केंद्रीय बैंकों के नियंत्रण और उनके आपसी संवाद की क्षमता के बारे में है. यह व्यवस्था डॉलर का विकल्प नहीं है.'
आजतक इंटरनेशनल डेस्क