'सेक्स के बदले नौकरी', अफ्रीकी देश में जारी प्रथा से राष्ट्रपति भी परेशान! की ऐसी घोषणा

घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा ने 'सेक्स के बदले नौकरी' जैसी प्रथा को अपराध घोषित करने की मांग की है. यह प्रथा लैंगिक शोषण का एक गंभीर रूप है, जो बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रिया में असमानता के कारण घाना में गंभीर रूप से बढ़ रही है.

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घाना में महिलाओं के लिए नौकरी पाना बेहद मुश्किल है (Photo: Instagram) घाना में महिलाओं के लिए नौकरी पाना बेहद मुश्किल है (Photo: Instagram)

आजतक इंटरनेशनल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:12 PM IST

घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा ने 'सेक्स के बदले नौकरी' जैसी प्रथा को अपराध घोषित करने की मांग की है. इसे इस बात का बड़ा संकेत माना जा रहा है कि घाना की सरकार अब उस समस्या पर सीधे कार्रवाई करने को तैयार है, जिसे लंबे समय से लोग जानते तो हैं, लेकिन खुलकर उस पर बात कम होती है.

यह मुद्दा 1 मई को कोफोरिडुआ में आयोजित एक टाउन हॉल प्रोग्राम के दौरान उठा, जब एक छात्रा ने भर्ती प्रक्रिया में जारी लैंगिक असमानता पर सवाल उठाया. जवाब में राष्ट्रपति महामा ने कहा कि इसके खिलाफ मौजूदा नियम और नीतियां पर्याप्त नहीं हैं. उन्होंने कहा कि सेक्स के बदले नौकरी की प्रथा शोषण का खतरनाक रूप है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. 

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महामा ने कहा, 'सबसे खराब प्रथाओं में से एक है ये प्रथा और मुझे लगता है कि इसे दंडनीय बनाने के लिए कानून पास होना चाहिए. कई बार नियोक्ता या भर्ती करने वाला व्यक्ति पुरुष होता है, तो वो नौकरी देने से पहले रोमांटिक संबंध की मांग करता है. यह अस्वीकार्य है. इसे बंद होना चाहिए.'

घाना में पहले से ही लेबर एक्ट और आपराधिक कानून के तहत यौन उत्पीड़न पर रोक है. घरेलू हिंसा कानून के तहत भी व्यापक सुरक्षा प्रावधान मौजूद हैं. लेकिन एक्टिविस्टों का कहना है कि ये कानून आमतौर पर नौकरी शुरू होने के बाद होने वाले उत्पीड़न या घरेलू माहौल में जबरदस्ती के खिलाफ ही काम करते हैं. नौकरी देने के बदले यौन संबंध की मांग करने जैसी स्थिति में ये कारगर साबित नहीं होते.

‘सेक्स फॉर जॉब्स’ जैसी प्रथा घाना में क्यों जारी है?

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घाना में युवाओं में बेरोजगारी बहुत ज्यादा है. सरकारी और औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा है और भर्ती प्रक्रिया अक्सर पारदर्शी नहीं होती. एक्टिविस्टों का कहना है कि ऐसे माहौल में नियोक्ताओं के पास नौकरी चाहने वालों, खासकर युवा महिलाओं, पर बहुत ज्यादा प्रभाव होता है.

घाना के पूर्व राष्ट्रपति जॉन कुफोर की पूर्व कानूनी सलाहकार और वकील विक्टोरिया ब्राइट ने कहा, 'मुझे बहुत खुशी है कि राष्ट्रपति ने यह रुख अपनाया है. सेक्स के बदले नौकरी शोषण है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.'

सिविल सोसाइटी संगठनों का कहना है कि घाना में सांस्कृतिक बाधाएं भी बड़ी वजह हैं. पीड़ितों को बदनामी, इज्जत खराब होने या बदले का डर रहता है. पीड़ितों के पास पुलिस तक जाकर शिकायत दर्ज कराने की भी कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है. नतीजतन, इस तरह के मामलों पर अनौपचारिक तौर पर चर्चा तो होती है, लेकिन मुकदमे बहुत कम चलते हैं. इससे दोषियों में सजा का डर नहीं बनता.

ब्राइट ने कहा, 'जब कोई पावरफुल इंसान नौकरी के बदले सेक्स की मांग करता है, तो यह भ्रष्टाचार का एक रूप है और सभ्य समाज में इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.'

सांसद और पूर्व उप परिवहन मंत्री नी क्वारतेई ग्लोवर का कहना है कि 'महिलाओं पर पुरुषों के पितृसत्तात्मक प्रभाव ने' इस प्रथा को फैलाने में योगदान दिया है.

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घाना में 'सेक्स फॉर जॉब्स' के खिलाफ कानून से क्या बदलेगा?

अगर 'सेक्स फॉर जॉब्स' की मांग को अपराध बनाने वाला अलग कानून लाया जाता है, तो इससे घाना के वर्कप्लेस में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. एक्टिविस्टों का कहना है कि इससे अपराध की स्पष्ट कानूनी परिभाषा तय होगी और इसे सामान्य उत्पीड़न या रिश्वतखोरी से अलग माना जाएगा. साथ ही इसमें स्पष्ट आपराधिक सजा भी तय होगी, जिससे यह पावर के दुरुपयोग का मुकदमा बन जाएगा.

घाना जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रोलैंड अफैल मॉनी मानते हैं कि अगर इसके खिलाफ कानून बन भी जाए तो इसे लागू करना असली चुनौती होगी. उनका कहना है कि 'सेक्स फॉर जॉब्स' मामलों को साबित करना बेहद मुश्किल होता है. लेकिन नई तकनीकों, जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के आने से सबूत जुटाना आसान हुआ है.

घाना के सांसद कोफी बेन्थेह अफुल ने कहा, 'जब देश का राष्ट्रपति खुद इस मुद्दे पर कानून बनाने की मांग कर रहा है, तो इसका मतलब है कि यह हमारे समाज के लिए एक बड़ी बीमारी बन चुका है.'

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