हर दिन लाखों बैरल तेल का उत्पादन करता है कनाडा, फिर क्यों विदेशों से करता है आयात?

आज जब दुनिया युद्ध के दौर से गुजर रही है और तेल की बढ़ती कीमतों से परेशान है. ऐसे में हर दिन लाखों बैरल तेल का उत्पादन करने वाला देश भी महंगे पेट्रोल-डीजल की मार झेल रहा है.

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पश्चिम में भारी कच्चे तेल की भरमार, पूर्व में हल्के ईंधन की मांग (Photo-Pixabay) पश्चिम में भारी कच्चे तेल की भरमार, पूर्व में हल्के ईंधन की मांग (Photo-Pixabay)

हुमरा असद

  • टोरंटो,
  • 17 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:02 AM IST

कनाडा के पास सिर्फ तेल का भंडार नहीं है, इसके पास सभी प्राकृतिक संसाधनों की खदान है. चाहे पीने का पानी हो, प्राकृतिक गैस हो, कोयला हो या सोने की खान हो लेकिन इस देश का खासियत है कि ये पर्यावरण को ज्यादा महत्व देता है. तेल में मामले में भी कुछ ऐसा ही है. हालांकि विदेशों से तेल खरीदने की कई और वजह भी हैं.

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दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल कनाडा की ऊर्जा कहानी पहली नजर में जितनी मजबूत दिखती है, उतनी ही उलझी हुई भी है. यह देश रोजाना 50 लाख बैरल से ज्यादा तेल निकालता है, लेकिन इसके बावजूद उसे हर साल अरबों डॉलर खर्च कर विदेशों से कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने पड़ते हैं. यह विरोधाभास सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि भूगोल, तकनीक, बुनियादी ढांचे और अर्थशास्त्र का एक जटिल मेल है.

तेल असल में कहां है?

इस पूरी कहानी को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि कनाडा का तेल असल में कहां है. देश के कुल तेल भंडार का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा में स्थित है. यह इलाका तेल उत्पादन का केंद्र है, जहां ऑयल सैंड्स के जरिए बड़े पैमाने पर तेल निकाला जाता है लेकिन समस्या ये है कि देश की ज्यादातर आबादी, उद्योग और ईंधन की मांग हजारों किलोमीटर दूर पूर्वी हिस्सों जैसे-ओंटारियो, क्यूबेक और न्यू ब्रंसविक में है. यानी तेल वहां है जहां जरूरत कम है, और जहां जरूरत ज्यादा है वहां तेल नहीं है.

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यह दूरी सिर्फ नक्शे पर एक लकीर नहीं है, बल्कि एक बड़ी आर्थिक और लॉजिस्टिक चुनौती है. जमीन से निकला हुआ तेल सीधे पेट्रोल या डीजल नहीं बन जाता. उसे पाइपलाइनों, भंडारण केंद्रों और रिफाइनरियों के जटिल नेटवर्क से गुजरना पड़ता है. अगर इस नेटवर्क की कोई भी कड़ी कमजोर हो, तो संसाधनों की भरमार भी बेकार साबित हो सकती है. कनाडा के मामले में यही हो रहा है.

तेल का प्रकार

लेकिन यह कहानी सिर्फ दूरी तक सीमित नहीं है. असली जटिलता तेल के प्रकार में छिपी है. अल्बर्टा से निकलने वाला ज्यादातर तेल पारंपरिक हल्का तेल नहीं, बल्कि भारी कच्चा तेल या बिटुमेन है. यह इतना गाढ़ा और चिपचिपा होता है कि सामान्य तापमान पर लगभग सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाले तारकोल जैसा लगता है. इसे पाइपलाइन में बहाने के लिए हल्के हाइड्रोकार्बन के साथ मिलाना पड़ता है, जिसे “डिल्बिट” कहा जाता है. इसके उलट अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिलने वाला हल्का कच्चा तेल ज्यादा तरल होता है, आसानी से बहता है और उसे प्रोसेस करना कहीं आसान और सस्ता होता है.

पुरानी रिफाइनरी

यही अंतर रिफाइनिंग के स्तर पर बड़ा फर्क पैदा करता है. पूर्वी कनाडा की ज्यादातर रिफाइनरियां कई दशक पहले बनाई गई थीं, जब समुद्र के रास्ते तेल आयात करना सबसे सुविधाजनक विकल्प था इसलिए उन्हें हल्के और मध्यम कच्चे तेल को प्रोसेस करने के हिसाब से डिजाइन किया गया. आज अगर इन रिफाइनरियों को अल्बर्टा के भारी तेल के अनुसार ढालना हो, तो इसके लिए अरबों डॉलर का निवेश करना पड़ेगा. इसमें नई तकनीक, जैसे कोकर यूनिट्स, लगानी होंगी जो भारी अवशेषों को हल्के ईंधन में बदल सकें. लेकिन इतनी बड़ी लागत को देखते हुए कंपनियां यह जोखिम उठाने से बचती हैं, खासकर तब जब दुनिया तेजी से स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है.

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पाइपलाइन नेटवर्क की सीमाएं

इसी बीच पाइपलाइन नेटवर्क की सीमाएं इस समस्या को और बढ़ा देती हैं. यूं तो पश्चिम से पूर्व तक एक विशाल पाइपलाइन बनाकर तेल पहुंचाया जा सकता है, लेकिन व्यवहार में यह बेहद मुश्किल और महंगा काम है. कनाडा का विशाल और चुनौतीपूर्ण भूभाग, पर्यावरणीय नियम, आदिवासी अधिकार और राजनीतिक मतभेद ऐसी परियोजनाओं को जटिल बना देते हैं. “एनर्जी ईस्ट” जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना इन्हीं कारणों से रद्द हो गई थी, जो पश्चिमी तेल को पूर्वी तट तक पहुंचाने के लिए बनाई जा रही थी.

घरेलू नेटवर्क जटिल और महंगा

जब घरेलू नेटवर्क इतना जटिल और महंगा हो, तो कंपनियां व्यावहारिक रास्ता चुनती हैं. यही वजह है कि कनाडा अपने भारी तेल का अधिकांश हिस्सा दक्षिण में संयुक्त राज्य अमेरिका को बेच देता है. अमेरिका में ऐसी रिफाइनरियां मौजूद हैं जो पहले से ही भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए तैयार हैं. ऐतिहासिक रूप से ये रिफाइनरियां वेनेजुएला और मैक्सिको से भारी तेल लेती थीं, लेकिन जब वहां से सप्लाई कम हुई, तो कनाडा का तेल उनके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प बन गया. आज स्थिति यह है कि कनाडा के कुल तेल निर्यात का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका को जाता है, और हर दिन लाखों बैरल तेल सीमा पार करता है.

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अमेरिका को देकर उसी से वापस खरीदता है तेल

इसका सीधा असर ये होता है कि पूर्वी कनाडा अपनी जरूरतों के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भर हो जाता है. वहां की रिफाइनरियां समुद्र के रास्ते मध्य पूर्व, उत्तरी सागर या अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों से हल्का कच्चा तेल मंगाती हैं. कई मामलों में ये विदेशी तेल मंगवाना देश के भीतर लंबी पाइपलाइन बनाने से सस्ता पड़ता है. इतना ही नहीं, कुछ इलाकों में तो तैयार पेट्रोल और डीजल भी सीधे आयात किए जाते हैं, खासकर अमेरिका से यानी वही तेल जो कभी कनाडा से गया था, प्रोसेस होकर वापस लौटता है.

भारत और चीन तक भेजा जा रहा तेल

हाल के सालों में कनाडा ने इस स्थिति को बदलने की कोशिश जरूर की है. ट्रांस माउंटेन पाइपलाइन विस्तार परियोजना के जरिए अब अल्बर्टा का तेल प्रशांत तट तक पहुंचाया जा सकता है, जहां से उसे एशिया के बाजारों जैसे भारत और चीन तक भेजा जा रहा है. इससे कनाडा को बेहतर कीमत मिलने लगी है और अमेरिका पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है.

कनाडा की यह कहानी एक बड़े सच को सामने लाती है. किसी देश के पास कितना तेल है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि वह तेल कहां है, किस प्रकार का है, उसे कहां ले जाया जा सकता है और किस रिफाइनरी में उसे प्रोसेस किया जा सकता है. कनाडा के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उसका ऊर्जा तंत्र भौगोलिक और संरचनात्मक रूप से बंटा हुआ है.

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इसीलिए यह विरोधाभास पैदा होता है. एक तरफ पश्चिम में भारी कच्चे तेल की भरमार है, दूसरी तरफ पूर्व में हल्के ईंधन की भारी मांग है। दूरी लंबी है, लागत ज्यादा है और मौजूदा ढांचा अलग तरह के तेल के लिए बना हुआ है। नतीजा यह होता है कि पश्चिम का तेल अमेरिका चला जाता है, जबकि पूर्व अपने बंदरगाहों के जरिए विदेशों से तेल मंगाता है.

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