फांसी के फंदे से संसद तक... भारत विरोधी आतंक के आरोपी दो उम्मीदवार बांग्लादेश चुनाव में जीते

बांग्लादेश के आम चुनाव में बड़ी जीत के बीच तीन ऐसे नेताओं की संसद में एंट्री हुई है जिन्हें कभी फांसी की सजा सुनाई गई थी. अदालतों से रिहाई के बाद ये नेता चुनाव जीतकर सांसद बन गए हैं. इस घटनाक्रम ने देश की बदलती राजनीति और सत्ता परिवर्तन के बाद आए बड़े बदलावों को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

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तीन सांसदों में भारत विरोधी साजिश रचने वाली दो BNP सांसद हैं. (Photo- ITG) तीन सांसदों में भारत विरोधी साजिश रचने वाली दो BNP सांसद हैं. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:48 AM IST

बांग्लादेश की राजनीति में हालिया चुनाव ने एक ऐसा मोड़ दिखाया है जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस चुनाव में एक तरफ बड़ी जीत की तस्वीर सामने आई, वहीं दूसरी तरफ तीन ऐसे नेताओं की वापसी ने सबको चौंका दिया जिन्हें कभी फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी. अब वही नेता संसद में बैठने की तैयारी कर रहे हैं. क्या यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का नतीजा है या राजनीति की बदली दिशा का संकेत. यही सवाल चर्चा के केंद्र में है.

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तीन में से दो, दोनों BNP के सदस्य, भारत विरोधी विद्रोहियों को हथियार सप्लाई करने और भारत में धमाके करने की साज़िश के लिए फांसी की सजा का सामना कर रहे थे. तीसरे, जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार पर युद्ध अपराध के आरोप थे. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान उन सभी को अदालतों ने रिहा कर दिया था.

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इनमें से दो नेता राष्ट्रवादी दल से जुड़े हैं और एक नेता इस्लामी दल से. लुत्फोज्जमान बाबर पहले गृह राज्यमंत्री रह चुके हैं. उन्हें 2004 के ढाका ग्रेनेड हमले में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई गई थी. इस हमले में कई लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे. इसके अलावा हथियार तस्करी मामले में भी उन्हें सजा मिली थी. लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद अदालत ने उन्हें बरी कर दिया और जेल से रिहा होने के कुछ समय बाद ही उन्होंने चुनाव जीता.

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इसी तरह अब्दुस सलाम पिंटू का मामला भी है. वह भी पहले मंत्री रह चुके हैं. उन्हें भी उसी ग्रेनेड हमले में दोषी ठहराया गया था और फांसी की सजा दी गई थी. उन पर भारत में हुए कई हमलों से जुड़े संगठन को समर्थन देने के आरोप भी लगे थे. बाद में अदालत ने सभी आरोपों से उन्हें मुक्त कर दिया. अब वह भारी मतों से चुनाव जीतकर संसद पहुंच रहे हैं. इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या अतीत के आरोप अब राजनीति में महत्व नहीं रखते.

तीसरे नेता एटीएम अजहरुल इस्लाम हैं. उन पर 1971 के युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याओं और महिलाओं के साथ अत्याचार के आरोप लगे थे. उन्हें भी फांसी की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सर्वोच्च अदालत ने बाद में उन्हें बरी कर दिया. अब वह भी चुनाव जीतकर संसद में पहुंच रहे हैं.

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इन तीनों की वापसी यह दिखाती है कि सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश की राजनीति किस तरह बदल गई है. कभी जिन नेताओं का भविष्य खत्म माना जा रहा था, वही अब जनता के वोट से चुने गए प्रतिनिधि बन रहे हैं. इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह न्याय प्रक्रिया की जीत है या राजनीति का नया समीकरण. आने वाले समय में यही सवाल बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय करेंगे.

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