बांग्लादेश के चुनावी नतीजों से जगी दोस्ती की उम्मीद, विशेषज्ञों ने बताया भारत के लिए 'गुड न्यूज'

पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और अन्य विशेषज्ञों ने बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी की जीत को भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए सकारात्मक बताया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जनता ने जमात-ए-इस्लामी के कट्टरपंथ को खारिज कर लोकतंत्र को चुना है, जिससे सीमा सुरक्षा और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर बेहतर सहयोग की उम्मीद है.

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एक्सपर्ट्स मानते हैं कि तारिक रहमान की वापसी से भारत के लिए समीकरण बदलेंगे. (Photo by Sajjad HUSSAIN / AFP) एक्सपर्ट्स मानते हैं कि तारिक रहमान की वापसी से भारत के लिए समीकरण बदलेंगे. (Photo by Sajjad HUSSAIN / AFP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:01 AM IST

बांग्लादेश के चुनावी नतीजे घोषित हो चुके हैं. इन नतीजों पर भारत के रणनीतिक विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है. 18 महीनों के तनावपूर्ण रिश्तों के बाद अब दोनों देशों के बीच संबंधों में नई गर्माहट आने की उम्मीद जताई जा रही है.

13वें संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रचंड जीत को भारतीय विशेषज्ञों ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक शुभ संकेत माना है. बांग्लादेश में काम कर चुके कई रिटायर डिप्लोमैट और स्ट्रेटेजिक मामलों के एक्सपर्ट समेत पूर्व विदेश सचिव और भाजपा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने इस जनादेश का स्वागत किया है.

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यह चुनाव ऐसे समय में हुए जब अगस्त 2024 में शेख हसीना के 15 साल के शासन के अंत होने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक खालीपन, अस्थिरता आ गई थी और अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर हमले किए जा रहे थे.

रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की जनता ने जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी ताकतों के बजाय राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों को चुना है. श्रृंगला ने कहा कि बीएनपी की जीत उन लोगों के लिए अच्छी खबर है जो बांग्लादेश के साथ बेहतर रिश्तों के पक्षधर हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि बीएनपी का बहुमत यह दर्शाता है कि जनता 'प्रो-लिबरेशन' (स्वतंत्रता समर्थक) भावना और 1971 के गौरवशाली इतिहास में विश्वास रखती है.

भारत के लिए राहत की खबर!

उन्होंने संसद में मीडिया से बात करते हुए कहा, "यह न केवल बांग्लादेश और बांग्लादेश के लोगों के लिए, बल्कि उन लोगों के लिए भी अच्छी खबर है जो बांग्लादेश के दोस्त हैं, जो बांग्लादेश के साथ अच्छे रिश्तों में विश्वास करते हैं. इसने उनकी भावनाओं को सही साबित किया है, हम सभी के लिए, यह बहुत, बहुत अच्छी खबर है. बांग्लादेश के लोगों ने एक ऐसी पार्टी को वोट दिया है जो राजनीतिक हितों को रिप्रेजेंट करती है. यह एक प्रो-लिबरेशन पार्टी है और यह 1971 की भावना में विश्वास करती है, जबकि जमात-ए-इस्लामी 1971 में बांग्लादेश के लिबरेशन संघर्ष के खिलाफ थी."

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उन्होंने कहा, "और बांग्लादेश, जो सबसे करीबी पड़ोसी है, के साथ सहयोग दोनों पक्षों के लिए फ़ायदेमंद होगा. यह सब अच्छी खबर है और मुझे लगता है कि नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैं कि बांग्लादेश के लोग इस देश को किस तरह आगे बढ़ाना चाहते हैं." हालांकि, पूर्व राजदूत ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि "देश के सांप्रदायिक, कट्टरपंथी... और इस्लामीकरण की ओर बढ़ने का डर खत्म हो गया है".

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर भरोसा
चुनावों के बाद तारिक रहमान द्वारा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के बयानों को भारत में सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के बाद अब एक स्थिर निर्वाचित सरकार के आने से सुरक्षा और विकास के साझा लक्ष्यों को गति मिलेगी.

 2003 से 2006 तक बांग्लादेश में भारत की हाई कमिश्नर रही वीना सिकरी ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश के लोगों ने "रिजेक्ट" कर दिया है. उन्होंने PTI से कहा कि BNP को दो-तिहाई बहुमत मिलना "बांग्लादेश के लोगों द्वारा डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ को सपोर्ट करने का एक और सबूत है".

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इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में रहमान की "निर्णायक जीत" पर उन्हें गर्मजोशी से बधाई दी और कहा कि वह आम विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए उनके साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं.

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X पर एक और पोस्ट में, मोदी ने कहा, "तारिक रहमान से बात करके खुशी हुई. मैंने उन्हें बांग्लादेश चुनावों में शानदार जीत के लिए बधाई दी."

हालांकि, पूर्व राजनयिकों ने आगाह भी किया है कि देश में कट्टरपंथ और इस्लामीकरण का खतरा पूरी तरह टला नहीं है. जमात-ए-इस्लामी ने लगभग 75 सीटों पर जीत दर्ज की है, जो चिंता का विषय है. ऐसे में धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट होकर देश के मूल स्वरूप की रक्षा करनी होगी.
 

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