जिस तुर्की ने हाल ही में पाकिस्तान की नौसेना को अत्याधुनिक युद्धपोत दिया है, उसी मुस्लिम देश से अब अमेरिका भी नौसैनिक जहाज निर्माण को लेकर बातचीत कर रहा है. इस संभावित डील का सीधा मकसद है - अमेरिकी नौसेना को मजबूत करना और समुद्र में बढ़ते चीन के प्रभाव को चुनौती देना है.
रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की और अमेरिका पिछले साल से नौसैनिक जहाज निर्माण में सहयोग को लेकर बातचीत कर रहे हैं. अमेरिकी नौसेना अपने बेड़े का विस्तार करना चाहती है, लेकिन दशकों की अनदेखी के चलते उसका शिपबिल्डिंग सेक्टर गंभीर संकट में है. ऐसे में अमेरिका अब सहयोगी देशों की मदद लेने पर मजबूर दिख रहा है.
हाल के वर्षों में तुर्की एक उभरती हुई नौसैनिक शक्ति बनकर सामने आया है. उसके शिपयार्ड एक साथ 30 से ज्यादा जहाज बनाने की क्षमता रखते हैं. तुर्की की डिफेंस कंपनियों ने MILGEM प्रोजेक्ट के तहत स्वदेशी युद्धपोत डिजाइन तैयार किए हैं, जो तेज गति, स्टेल्थ क्षमता और आधुनिक हथियार सिस्टम से लैस हैं.
यह भी पढ़ें: ईरान का वॉर-रूम एक्टिव, US से जंग को तैयार... अराघची ने सऊदी-मिस्र-तुर्की को मिलाया फोन
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, बातचीत के दौरान यह भी देखा गया कि क्या तुर्की अमेरिकी नौसेना के लिए जहाजों के पुर्जे सप्लाई कर सकता है या फिर अतिरिक्त फ्रिगेट बनाने में मदद कर सकता है. ट्रंप प्रशासन अमेरिकी शिपबिल्डिंग को फिर से खड़ा करने और नौसेना का आकार बढ़ाने पर जोर दे रहा है.
जापान और दक्षिण कोरिया के भरोसे चल रहा था अमेरिका
अब तक अमेरिका ने जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई सहयोगियों पर भरोसा किया है. दिसंबर 2024 में दक्षिण कोरिया की हनवा ग्रुप ने फिलाडेल्फिया के एक शिपयार्ड को 100 मिलियन डॉलर में खरीदा था. लेकिन अमेरिका की कई परियोजनाएं अटक भी रही हैं. दिसंबर 2025 में अमेरिकी नौसेना ने इटली की कंपनी फिनकैंटिएरी के साथ चल रही कॉन्स्टेलेशन-क्लास फ्रिगेट परियोजना को रद्द कर दिया था.
हालांकि, तुर्की के साथ गहरी रक्षा साझेदारी आसान नहीं है. 2019 में रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर अमेरिका ने CAATSA कानून के तहत तुर्की पर प्रतिबंध लगाए थे. इसके बावजूद, ट्रंप प्रशासन में कुछ अधिकारी शिपबिल्डिंग को दोनों देशों के रिश्ते सुधारने का जरिया मान रहे हैं.
शिप बनाने में अमेरिका के सामने क्या चुनौती?
तुर्की के रक्षा विशेषज्ञ कुबिलाय यिल्दिरिम के मुताबिक, अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या उत्पादन क्षमता, कुशल श्रमिकों और आधुनिक शिपयार्ड की कमी है. वहीं तुर्की के शिपयार्ड इस्तांबुल के आसपास केंद्रित हैं, जिससे वे नए प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर सकते हैं.
यह भी पढ़ें: क्या अमेरिका की इन तीन शर्तों को मानेंगे खामनेई? US-ईरान की मीटिंग पर दुनिया की नजर
कुल मिलाकर, पाकिस्तान को युद्धपोत देने वाला तुर्की अब अमेरिका के लिए भी एक अहम विकल्प बनता दिख रहा है. अगर यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो यह न सिर्फ चीन को समुद्र में चुनौती देने की अमेरिकी रणनीति को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक डिफेंस राजनीति में तुर्की की भूमिका भी और मजबूत कर सकती है.
तुर्की-पाकिस्तान की युद्धपोत डील
21 दिसंबर 2025 को तुर्की ने पाकिस्तान नौसेना को बाबर-क्लास कॉर्वेट का दूसरा युद्धपोत 'PNS खैबर' सौंपा था. यह डिलीवरी 2018 में हुए उस समझौते का हिस्सा है, जिसके तहत तुर्की को पाकिस्तान के लिए चार MILGEM-क्लास युद्धपोत बनाने थे. ये आधुनिक कोरवेट्स अत्याधुनिक 3D रडार, एडवांस कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस हैं, जिससे इनकी समुद्री निगरानी और युद्ध क्षमता काफी मजबूत हो जाती है.
पहले दो जहाज PNS बाबर और PNS खैबर के बाद तीसरा जहाज PNS बदर जून 2026 में पाकिस्तान को मिलने की उम्मीद है, जबकि चौथा और अंतिम जहाज PNS तारिक को 2027 में नौसेना में शामिल किया जाएगा.
aajtak.in