कुंभ नगरी में छाए 'चाबी वाले बाबा'... 20KG की चाबी लेकर करते हैं यात्रा, क्या है इसके पीछे की रहस्यमयी कहानी?

Kumbh Mela 2025: कुंभ नगरी प्रयागराज में साधु-संतों की अलग दुनिया नजर आती है. इन्हीं में से एक हैं चाबी वाले बाबा, जो अपने अनोखे अंदाज से श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं. 50 वर्षीय बाबा हरिश्चंद्र विश्वकर्मा को लोग 'कबीरा बाबा' के नाम से भी जानते हैं. वे अपने साथ 20 किलो की लोहे की चाबी लेकर चलते हैं. बाबा का कहना है कि यह चाबी जीवन और अध्यात्म का प्रतीक है.

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कुंभ नगरी में पहुंचे चाबी वाले बाबा. (Photo: Aajtak) कुंभ नगरी में पहुंचे चाबी वाले बाबा. (Photo: Aajtak)

आनंद राज

  • प्रयागराज,
  • 29 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 1:11 PM IST

संगम की रेती पर तैयार कुंभ नगरी में इस समय साधु-संतों का रहस्यमयी संसार दिख रहा है. कुंभ में पहुंचे हर बाबा की कोई न कोई विशेष कहानी है. कोई ई-रिक्शा वाले बाबा, कोई हाथ योगी वाले बाबा, कोई जानवर वाले बाबा तो कोई घोड़े वाले बाबा के नाम से पहचाने जा रहे हैं. यहां चाबी वाले बाबा भी हैं, जो अपने एक हाथ में 20 किलो की लोहे की चाबी लेकर चलते हैं. इस भारी-भरकम चाबी की कहानी भी रहस्यमयी है. लोग इन्हें रहस्यमयी चाबी वाले बाबा के नाम से जानते हैं. बाबा के पास एक रथ है, जिसमें चाबी ही चाबी नजर आती हैं. बाबा की हर एक चाबी की एक कहानी है.

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50 वर्षीय चाबी वाले बाबा की खासियत ये है कि ये पूरे देश में पैदल अपने रथ को हाथों से खींचकर यात्रा करते रहते हैं. वे नए युग की कल्पना को लोगों तक पहुंचा रहे हैं. चाबी वाले बाबा का असली नाम हरिश्चंद्र विश्वकर्मा है. वो उत्तर प्रदेश के रायबरेली के रहने वाले हैं. वे कहते हैं कि हरिश्चंद्र विश्वकर्मा का बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव हो गया था.

घरवालों के डर से वे कुछ बोल नहीं पाते थे, लेकिन जब वे 16 साल के हुए तो उन्होंने समाज में फैली बुराइयों और नफरत से लड़ने का फैसला कर लिया और घर से निकल गए. हरिश्चंद्र विश्वकर्मा कबीरपंथी विचारधारा के हैं, इसलिए लोग उन्हें कबीरा बाबा बुलाने लगे. अयोध्या से यात्रा कर अब प्रयागराज कुंभ नगरी में पहुंचे हैं.

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कबीरा बाबा कई साल से अपने साथ एक चाबी लिए हुए हैं. उस चाबी के साथ ही उन्होंने पूरे देश की पदयात्रा की है. अपनी यात्रा और अध्यात्म के बारे में कबीरा बाबा कहते हैं कि लोगों के मन में बसे अहंकार का ताला वे अपनी बड़ी सी चाबी से खोलते हैं. वह लोगों के अहंकार को चूर-चूर कर उन्हें एक नया रास्ता दिखाते हैं. अब बाबा के पास कई तरह की चाभियां मौजूद हैं. बाबा खुद ही अपने हाथों से चाबी बना लेते हैं. जहां भी जाते हैं, यादगार के तौर पर चाबी बना लेते हैं.

चाबी वाले बाबा ने अपनी ये यात्रा साइकिल से शुरू की थी. अब उनके पास एक रथ है. इस रथ को बाबा हाथों से खींचते हैं. बाबा ने जुगाड़ से इसका एक हैंडल बना रखा है, जिसके जरिए रथ को दिशा देते हैं. बाबा का कहना है कि मेरे बाजू मजबूत हैं, मैं इस रथ को खींच सकता हूं. हजारों किलोमीटर की यात्रा कर ली है. अब कुंभ नगरी में पहुंचे हैं.

चाबी वाले बाबा स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते हैं. उनका कहना है कि अध्यात्म की ओर पूरी दुनिया भाग तो रही है, लेकिन अध्यात्म कहीं बाहर नहीं है, बल्कि अंदर ही बसा है. उन्होंने अपनी चाबी के बारे में बताते हुए कहा कि इस चाबी में अध्यात्म और जीवन का राज छिपा है, जिसे वह लोगों को बताना चाहते हैं.

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कबीरा बाबा का कहना है कि इस चाबी के राज के बारे में कोई जानना नहीं चाहता है, क्योंकि इसके लिए किसी के पास समय नहीं है. अगर किसी को कुछ कहते हैं तो लोग यह कहकर मुंह फेर लेते हैं कि बाबा मेरे पास छुट्टे पैसे नहीं हैं. शायद लोगों को लगता है कि मैं उनसे पैसे मांग रहा हूं. कुंभ क्षेत्र में चाबी वाले बाबा जिधर से गुजरते हैं, उधर लोग इनको देखकर चाबी का राज जाना चाहते हैं और दर्शन करते हैं.

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