'मैंने और वाइफ ने मिलकर...' आंगनबाड़ी में बेटी का एडमिशन कराने वाले IAS पुलकित गर्ग ने दिया ये मैसेज

जहां ज्यादातर अफसर और संपन्न परिवार अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं, वहीं चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने अलग मिसाल पेश की है. उन्होंने अपनी साढ़े तीन साल की बेटी का दाखिला आंगनबाड़ी में कराया है. डीएम ने बताया कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने खुद कई स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र देखे, इसके बाद यह फैसला लिया.

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आंगनबाड़ी में पढ़ती हैं IAS पुलकित गर्ग की बेटी. (Photo: Screengrab) आंगनबाड़ी में पढ़ती हैं IAS पुलकित गर्ग की बेटी. (Photo: Screengrab)

संतोष बंसल

  • चित्रकूट,
  • 08 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:34 PM IST

चित्रकूट से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी बनाम प्राइवेट शिक्षा की बहस को नया मोड़ दे दिया है. जिले के डीएम और IAS अधिकारी पुलकित गर्ग ने अपनी साढ़े तीन साल की बेटी का दाखिला किसी महंगे प्ले स्कूल में नहीं, बल्कि पास के सरकारी आंगनबाड़ी केंद्र में कराया है. उन्होंने बताया कि यह फैसला उन्होंने और उनकी पत्नी ने मिलकर कई स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों को देखने के बाद लिया. उनका कहना है कि शुरुआती शिक्षा की असली नींव इमारतों से नहीं, देखभाल, गतिविधियों और सीखने के माहौल से पड़ती है. और यही भरोसा वे समाज को भी देना चाहते हैं.

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IAS अधिकारी पुलकित गर्ग की बतौर जिलाधिकारी पहली पोस्टिंग चित्रकूट में हुई है. पद संभालने के बाद जब उनकी बेटी के प्ले स्कूल में दाखिले का समय आया, तो उन्होंने इसे केवल औपचारिक प्रक्रिया की तरह नहीं लिया. एक जिम्मेदार अभिभावक की तरह उन्होंने निजी प्ले स्कूलों के साथ-साथ कई आंगनबाड़ी केंद्रों का दौरा किया. सुविधाओं, माहौल, गतिविधियों और बच्चों की भागीदारी को बारीकी से देखने के बाद उन्होंने जिला मुख्यालय में आंगनबाड़ी केंद्र को सबसे बेहतर पाया... और यहीं अपनी बेटी का दाखिला करा दिया.

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कलेक्टर पुलकित गर्ग ने बताया कि यह फैसला सोच-समझकर लिया गया. उनके शब्दों में, मेरी बेटी सिया साढ़े तीन साल की हो गई है. हमें उसका प्ले स्कूल में एडमिशन कराना था. मैंने और मेरी वाइफ ने मिलकर जिले के कई प्ले स्कूल देखे, प्राइवेट भी और आंगनबाड़ी भी. जो आंगनबाड़ी हमारे घर के पास थी, वहां की व्यवस्था, गतिविधियां और माहौल हमें सबसे अच्छा लगा. इसलिए हमने वहीं एडमिशन कराया.

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यह आंगनबाड़ी केंद्र किसी औपचारिकता की तरह नहीं चल रहा, बल्कि यहां बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने का माहौल तैयार किया गया है. रंगीन दीवारें, चित्र, खिलौने, एक्टिविटी किट, अक्षर और नंबर चार्ट... सब कुछ मौजूद है. करीब 35 बच्चे यहां नियमित रूप से आते हैं. सिया भी उन्हीं बच्चों के साथ बैठती है, उन्हीं के साथ गतिविधियों में भाग लेती है और मध्याह्न भोजन के समय सबके साथ जमीन पर बैठकर खाना खाती है.

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कलेक्टर पुलकित गर्ग का मानना है कि शुरुआती शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबें या अंग्रेजी माध्यम नहीं होता, बल्कि सही माहौल, देखभाल और सामाजिक व्यवहार ज्यादा मायने रखता है. उनका कहना है कि प्री-स्कूल एजुकेशन बच्चे के व्यक्तित्व की बुनियाद रखती है, और आज आंगनबाड़ी केंद्रों में सरकार और प्रशासन की ओर से ढांचा और प्रशिक्षण दोनों बेहतर करने पर जोर दिया जा रहा है.

उन्होंने बताया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है. बच्चों के लिए दैनिक शेड्यूल तय है... किस दिन कौन सी कहानी, कौन सा भावगीत, कौन सी गतिविधि करानी है, यह सब निर्धारित है. खेल के माध्यम से सीखने की पद्धति अपनाई जा रही है, ताकि बच्चा दबाव में नहीं, आनंद के साथ सीख सके.

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'बच्चों को आंगनबाड़ी से जोड़ना चाहिए'

पुलकित गर्ग का यह भी कहना है कि समाज में आंगनबाड़ी को लेकर जो धारणा बनी हुई है, उसे बदलने की जरूरत है. वे चाहते हैं कि लोग खुद आकर केंद्र देखें, समझें और भरोसा करें. उनका संदेश साफ है- छह साल तक के बच्चों को आंगनबाड़ी से जोड़ना चाहिए, क्योंकि यहां पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा तीनों पर एक साथ ध्यान दिया जाता है.

जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों के उन्नयन, मरम्मत और संसाधन बढ़ाने की प्रक्रिया तेज की जा रही है. जिलाधिकारी ने कहा कि जहां भी जरूरत होगी, वहां केंद्रों का नवीनीकरण कराया जाएगा और प्रशिक्षण को और मजबूत किया जाएगा. स्थानीय लोग भी इस पहल की सराहना कर रहे हैं. उनका कहना है कि जब जिले का शीर्ष अधिकारी अपनी बेटी को आंगनबाड़ी भेज सकता है, तो आम लोगों का भरोसा भी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा.

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