मर तो वो 13 साल पहले गया था. लेकिन मौत सचमुच तब उसके हिस्से में आई जब इस चिता पर लेटने के बाद हरीश की आत्मा की रोशनी चिता से उठती इस आग के साथ मिलकर हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गई. पर इस दुनिया को छोड़ने से पहले हरीश आजाद भारत के इतिहास का ऐसा पहला भारतीय बन गया जिसे अदालत और अस्पताल ने मिलकर मां-बाप की इच्छा को ध्यान में रखते हुए इच्छामृत्यु दी. भारत में पैसिव यूथेनेशिया का यह पहला मामला है. हरीश अपनी मौत के साथ न जाने इस देश के ऐसे कितने ही मरीजों के लिए एक रास्ता खोल गया. रास्ता लाश बनकर जीने की बजाय इज्जत से इच्छामृत्यु का.
24 मार्च यानी मंगलवार का दिन था. शाम के ठीक 4 बजकर 10 मिनट हुए थे. और यही वो वक्त था जिसका इंतजार बीते 10 दिनों से खुद AIIMS के डॉक्टर और हरीश के मां-बाप कर रहे थे. हरीश की सांसों की आखिरी हिचकी उसी समय हुई. 4 बजकर 10 मिनट पर ही हरीश ने आखिरी सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
हरीश की मौत के बाद 24 मार्च को ही AIIMS की तरफ से एक बयान जारी किया गया. इस बयान में ऐसा कुछ नहीं था सिवाय इसके कि AIIMS हरीश की मौत की पुष्टि कर रहा था. शायद AIIMS की भी गलती नहीं है क्योंकि AIIMS है ही इसलिए ताकि बीमारों का इलाज कर सके और उन्हें अच्छा कर सके. पर यह पहली बार था जब AIIMS में एक मरीज को उसकी बीमारी के इलाज के लिए नहीं बल्कि मौत के इलाज के लिए लाया गया था. पर बयान लिखते वक्त इस अजीब और शायद AIIMS का ऐसा पहला केस होने की वजह से वे भूल गए.
इस बयान में लिखा है कि हरीश की डॉक्टरों की एक डेडिकेटेड टीम केयर कर रही थी. जबकि असलियत यह है कि आमतौर पर केयर यानी देखभाल ऐसे मरीजों की होती है जिनकी बीमारी का इलाज चल रहा हो और ठीक होने की उम्मीद हो. पर हरीश तो AIIMS इसलिए लाया गया था ताकि उसे मौत दी जा सके. इसीलिए इस बयान का यह 'केयर' शब्द कम से कम हरीश के मामले में अजीब सा लगता है. क्योंकि यहां हरीश की जिंदगी नहीं, उसकी मौत की देखभाल यानी केयर करनी थी.
ब्रह्मकुमारी बहनों ने दी थी आखिरी विदाई
वो इसी महीने की 11 तारीख थी, यानी 11 मार्च, जब देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद मार्मिक और ऐतिहासिक फैसला दिया था. हरीश के मां-बाप की गुजारिश पर 13 सालों से एक जिंदा लाश बनकर जो हरीश 4 बाय 6 के बेड पर लेटा हुआ था, उसे इज्जत की मौत देने का फैसला. यानी पैसिव यूथेनेशिया. इस हुक्म के तीन दिन बाद ही 14 मार्च को हरीश को गाजियाबाद के उसके घर से AIIMS ले जाया गया. AIIMS ले जाने से ठीक एक दिन पहले यानी 13 मार्च की यह हरीश की आखिरी जिंदा तस्वीर है. तब ब्रह्मकुमारी की बहनों ने उसे आखिरी विदाई देने उसके घर पहुंची थीं.
अब 14 मार्च की सुबह हो चुकी थी. शनिवार का दिन था. इस घर का यह कमरा अब खाली होने जा रहा था. इस बेड की भी अब इस कमरे में कोई जरूरत नहीं बची थी. सुबह के करीब 11 बजे होंगे. आखिरी सफर पर निकलने से पहले हरीश को बस एक आखिरी सफर करना था, घर से 33 किलोमीटर दूर AIIMS तक का सफर. उसी AIIMS का जहां धीरे-धीरे मशीनें उसकी सांसों की डोर को तोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए न सिर्फ उसकी धड़कनों को खामोश कर देंगी, बल्कि ये खुला मुंह और खुली पलकें भी हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर देंगी.
13 मार्च की दोपहर लगभग एक बजे का वक्त होगा जब हरीश के मां-बाप और भाई उसे एंबुलेंस में बिठाकर घर से विदा करते हुए उसके साथ AIIMS पहुंचे जहां हर मरीज इस उम्मीद से पहुंचता है कि वहां से वह ठीक होकर अपने घर लौटेगा. लेकिन ये दुनिया के शायद वो बदनसीब मां-बाप हैं जो अपने बेटे को देश के सबसे बड़े अस्पताल इसलिए ले जा रहे हैं ताकि वह मरकर लौटे. AIIMS के बाद हरीश की आखिरी मंजिल उसका अपना घर नहीं बल्कि श्मशान होगा.
ये उसी AIIMS में मौजूद इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल है. वैसे इसका पूरा नाम बीआर अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल है. इसी बिल्डिंग की पहली मंजिल पर पैलिएटिव केयर यूनिट यानी पीसीयू डिपार्टमेंट है. असल में पीसीयू में उन मरीजों को ही रखा जाता है जो बहुत दर्द में हों और जिनके दर्द की कोई दवा न हो. बचने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी हो. बस यूं समझ लीजिए कि एक मरीज को आसान और कम तकलीफदेह मौत देने की जो जगह होती है उसे ही पैलिएटिव केयर यूनिट या पीसीयू कहते हैं. सुप्रीम कोर्ट का हुक्म था. तारीख 14 मार्च की तय थी. लिहाजा पीसीयू वॉर्ड में हरीश के लिए एक आखिरी बेड भी तैयार था.
इलाज जिंदगी का नहीं, मौत का
बेशक AIIMS देश का सबसे बड़ा अस्पताल है. लेकिन बदनसीबी देखिए कि जिंदगी बचाने वाले AIIMS के सामने भी पहली बार एक ऐसा केस आया है जिसमें उसे किसी की जिंदगी बचानी नहीं बल्कि जान लेनी है.. वो भी पूरी मर्यादा, इंसानियत, डॉक्टरी के महान पेशे और कानून को ध्यान में रखकर. हरीश जब 14 मार्च की दोपहर AIIMS लाया गया उससे पहले ही AIIMS में धीरे-धीरे उसकी जान लेने की तैयारी शुरू हो चुकी थी. हरीश एकदम से नहीं मरेगा. बल्कि आहिस्ता-आहिस्ता इस तरह उसकी जान ली जाएगी कि शायद जान निकलने की जो तकलीफ होती है उस तकलीफ का उसे अहसास भी न हो.ये डॉक्टर सीमा मिश्रा हैं.
AIIMS की ऑन्को एनेस्थीसिया की हेड ऑफ डिपार्टमेंट. वो डॉक्टर सीमा मिश्रा ही थीं जिनकी निगरानी में हरीश को धीरे-धीरे मौत की आगोश तक पहुंचाना था. सुप्रीम कोर्ट का साफ हुक्म था कि हरीश के हिस्से जो मौत आए वो आसान हो और धीरे-धीरे आए. इस हुक्म पर अमल करना इतना आसान भी नहीं था. वजह ये थी कि डॉक्टर सीमा मिश्रा की अगुवाई वाली डॉक्टरों की टीम को हरीश की जिंदगी छीनने के लिए किश्तों में घंटों के हिसाब से उन चीजों को उससे दूर करना था जो पिछले 13 सालों से उसे मरने नहीं दे रही थीं. और यहीं से हरीश की मौत का सफर शुरू होता है.
14 मार्च को AIIMS लाए जाने के बाद सबसे पहले डॉक्टरों ने उसे उन दवाओं से दूर कर दिया जिनके सहारे वो लाश बनकर भी सांसें ले रहा था. एक-एक लाइफ सेविंग ड्रग किश्तों में बंद किया जा रहा था. एक-एक कर जब सारी दवाएं बंद कर दी गईं तो डॉक्टरों को अहसास हुआ कि हरीश तकलीफ में आ गया है. अब चूंकि मौत आसान और बिना तकलीफ के देनी थी, लिहाजा डॉक्टरों ने जिंदगी बचाने वाली दवाओं को तो हरीश से दूर कर दिया मगर दर्द और तकलीफ कम करने के लिए उसे पेन किलर देना शुरू कर दिया. पेन किलर से सिर्फ दर्द की शिद्दत कम होती है. मौत दूर नहीं जाती.
पैलिएटिव केयर डिपार्टमेंट की जिस पहली मंजिल पर हरीश को रखा गया था, ठीक उसके बराबर वाला एक कमरा हरीश के घरवालों को दिया गया था ताकि आखिरी कुछ दिन और आखिरी लम्हे तक वो अपने बेटे के करीब रहे. लाइफ सेविंग ड्रग्स और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पहले दो दिनों में ही पूरी तरह से हटाया जा चुका था.
इन्हें हटाने के बाद डॉक्टर हरीश के ब्लड प्रेशर, शुगर और दूसरे टेस्ट कर लगातार यह जांच कर रहे थे कि हरीश की हालत कितनी नाजुक होती जा रही है. हरीश की हालत जितनी नाजुक होती, डॉक्टरों की उम्मीदें उतनी बढ़ती जातीं. उम्मीदें जिंदगी के खत्म होने और मौत के आने की.
लाइफ सेविंग ड्रग्स और लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने के बाद हरीश की हालत की जांच कर डॉक्टरों ने पहले चार दिनों में ही अब हरीश को खाना और पानी न देने का फैसला किया. हरीश पिछले 13 सालों से फूड पाइप के जरिए लिक्विड खाना खा रहा था. पर दवाओं की तरह हरीश का खाना-पानी किश्तों में नहीं, बल्कि एक ही बार में पूरी तरह बंद करना था. खाना-पानी बंद होते ही हरीश की हालत सबसे ज्यादा बिगड़नी शुरू हुई. शुगर और यूरिन टेस्ट से डॉक्टर अब हरीश की बिगड़ती हालत और उसके बाद उसकी आखिरी सांस की तारीख और वक्त का अंदाजा लगाने लगे.
कहते हैं कि बिना खाना-पानी के इंसान 10-15 दिन भी जी सकता है. लेकिन हरीश सिर्फ 6 दिन ही भूखा-प्यासा रह सका. सोमवार यानी 23 मार्च की शाम हरीश की हालत सबसे ज्यादा बिगड़नी शुरू हुई. उसकी हालत देखकर डॉक्टरों को लगा कि शायद अगले कुछ घंटों में ही हरीश की सांसें रुक जाएं. लेकिन बिना किसी दवा, लाइफ सपोर्ट सिस्टम और खाना-पानी के भी हरीश ने पूरी रात काट दी. अब 24 मार्च की सुबह हो चुकी थी. मंगलवार का दिन था. सुबह से ही हरीश का पूरा जिस्म जो पहले से ही बेजान था उसकी थोड़ी बहुत हरकत भी बंद होने लगी थी. जो हरीश बीते 13 सालों से मुंह खोलकर गले से इस तरह सांसें लेता और अपनी आंखों की पलकों को बीच-बीच में झपकाता उसकी रफ्तार भी अब कम होने लगी थी. मंगलवार की दोपहर होते-होते बाकी की टेस्ट रिपोर्ट से डॉक्टर समझ चुके थे कि अब बस कुछ घंटे की बात है.
मंगलवार दोपहर 12 बजे की बात रही होगी. बराबर के कमरे में मौजूद हरीश के मां-बाप और भाई-बहन को डॉक्टरों ने पहली बार यह जानकारी दी कि अब शायद हरीश की आखिरी घड़ी आ गई है. इसी के बाद हरीश की मां हरीश के कमरे में जाती हैं और हरीश के करीब बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर देती हैं. थोड़ी देर बाद ही हरीश के पिता, भाई, भाई की पत्नी, बहन और उनके पति सभी हरीश के कमरे में हरीश के पास थे. सब प्रार्थनाएं कर रहे थे.दोपहर तीन बजे का वक्त रहा होगा. जब हरीश की खुलती-बंद होती पलकें अचानक बंद हो गईं.
डॉक्टरों ने फिर से हरीश का चेकअप किया. उसकी सांसों को टटोला. आपस में बात की. मशीनों को पढ़ा. और फिर शाम के ठीक चार बजकर दस मिनट पर पहली बार डॉक्टर ने हरीश की मां को बताया... हरीश मर चुका है. AIIMS लाए जाने के ठीक 248 घंटे बाद आखिरकार हरीश की मौत हो गई. अब चूंकि हरीश की मौत की वजह पहले से मालूम थी, लिहाजा हरीश की मौत के बाद पोस्टमॉर्टम की भी जरूरत नहीं पड़ी. अब हरीश को AIIMS से ही घरवाले श्मशान लेकर जाते हैं.
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25 मार्च सुबह करीब 9 बजे हरीश के परिवार, हरीश के पड़ोसी, सिर्फ हरीश की कहानी सुनकर हरीश को जानने वाले, उससे हमदर्दी रखने वाले AIIMS के करीब ग्रीन पार्क श्मशान पहुंचते हैं. सुबह के 9 बजकर 28 मिनट हुए थे जब हरीश का छोटा भाई आशीष चिता को मुखाग्नि देता है.13 साल का दर्द शायद अब रोशनी और चिता की आग में जल चुका हो. मगर दुनिया की कोई भी आग या रोशनी हरीश के इन मां-बाप के दर्द को शायद ही कभी कम कर पाए. क्योंकि ये वो बदनसीब मां-बाप हैं जिन्होंने पूरे 13 साल तक अपने बेटे की मौत देखी है. चिता तो बस आखिरी रस्म अदायगी थी.
मां-बाप ने भारी मन से दी बेटे को विदाई
हरीश के पिता अशोक राणा बेटे की मौत पर श्मशान आए लोगों के सामने हाथ जोड़कर एक विनती कर रहे हैं. इनकी विनती यह है कि हरीश की मौत पर कोई भी रोएगा नहीं. मगर आखिर में खुद ही रो दिए.(इनपुट:- मनीषा झा)
अमरदीप कुमार / मयंक गौड़