कानपुर के रावतपुर इलाके में चार मंजिला अस्पताल जहां हमेशा मरीजों और डॉक्टरों की भीड़ लगी रहती थी, वहां अंदर कदम रखते ही एक अजीब सन्नाटा घेर लेता है. न मरीज, न डॉक्टर, न स्टाफ बस खाली कमरे, बिखरी फाइलें और अधूरी छूटी जिंदगी के निशान. यही वह जगह है, जहां अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का खेल चल रहा था. और इसी जगह से एक सिक्योरिटी गार्ड की जुबान से निकली एक लाइन ने पूरे मामले को साफ कर दिया. 'डॉक्टर साहब और डॉक्टराइन को तो कल ही पुलिस ले गई… उसके बाद सब भाग गए'.
अस्पताल के भीतर का दृश्य किसी फिल्म के अचानक रुक गए सीन जैसा लगता है. रिसेप्शन पर रखी कुर्सियां अपनी जगह पर हैं, लेकिन उन पर बैठने वाला कोई नहीं. काउंटर पर रजिस्टर खुले पड़े हैं, जैसे किसी ने जल्दबाजी में पन्ना पलटा हो और फिर लौटकर न आया हो. डॉक्टर के केबिन में दीवारों पर टंगे सम्मान पत्र और तस्वीरें अब भी मौजूद हैं. मेज पर फाइलें बिखरी हैं, कुछ दवाइयों के डिब्बे खुले पड़े हैं. ऐसा लगता है जैसे यहां काम चल रहा था और अचानक सब कुछ छोड़कर लोग गायब हो गए. इमरजेंसी रूम में टंगी ड्रिप, आधी इस्तेमाल हुई दवाइयां और बेड पर पड़े सिलवटों वाले चादर इस बात की गवाही देते हैं कि यहां हाल ही में मरीज थे. लेकिन अब वहां सिर्फ सन्नाटा है.
गार्ड की गवाही: एक लाइन में पूरा सच
अस्पताल के बाहर तैनात सिक्योरिटी गार्ड से जब बात की गई, तो उसने बेहद सादे शब्दों में पूरी कहानी कह दी. उसने बताया कि वह खुद एक दिन पहले ही ड्यूटी पर आया था. उसी दिन पुलिस आई और अस्पताल के मालिक डॉक्टर दंपति को अपने साथ ले गई. गार्ड के मुताबिक, जैसे ही गिरफ्तारी हुई, अस्पताल का पूरा स्टाफ धीरे-धीरे गायब हो गया. किसी ने कुछ नहीं बताया, बस लोग अपने-अपने रास्ते चले गए.
डॉक्टर दंपति की गिरफ्तारी
पुलिस ने इस मामले में अस्पताल संचालक डॉक्टर दंपति प्रीति आहूजा और सुरजीत सिंह आहूजा को गिरफ्तार किया है. इन्हीं के अस्पताल में अवैध ट्रांसप्लांट होने की आशंका जताई गई है. जांच के दौरान जो शुरुआती तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं. बताया जा रहा है कि ऑपरेशन थिएटर में बिना जरूरी अनुमति के किडनी ट्रांसप्लांट किए जाते थे और इसके लिए मोटी रकम वसूली जाती थी. एक सर्जरी के लिए रोजाना साढ़े तीन से चार लाख रुपये तक की मांग की जाती थी. यह रकम सिर्फ ऑपरेशन की थी इसके अलावा डोनर और रिसीवर के बीच अलग से सौदे होते थे.
कैसे चलता था पूरा नेटवर्क?
जांच में सामने आया है कि यह कोई छोटा-मोटा खेल नहीं था, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के तहत काम हो रहा था. इसमें दलाल, डॉक्टर, अस्पताल प्रबंधन और बाहर के लोगों की एक चेन की तरह जुड़े हुए थे. इस नेटवर्क का एक अहम किरदार शिवम अग्रवाल बताया जा रहा है, जो कथित तौर पर बिचौलिये की भूमिका निभा रहा था. वह जरूरतमंद लोगों को तलाशता, उन्हें पैसों का लालच देता और फिर उन्हें इस सिस्टम में जोड़ देता. इस पूरे मामले में सबसे दर्दनाक पहलू उन लोगों की कहानी है, जो मजबूरी में इस जाल में फंस गए. उत्तराखंड के एक युवक को 10 लाख रुपये का लालच देकर किडनी देने के लिए तैयार किया गया. उसे बताया गया कि उसकी किडनी किसी जरूरतमंद रिश्तेदार के लिए ली जा रही है. आर्थिक तंगी से जूझ रहे उस युवक ने हामी भर दी. लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी. आरोप है कि उसकी किडनी निकालकर उसे 6 लाख रुपये नकद और 3.5 लाख रुपये का चेक दिया गया, जबकि उसी किडनी को एक महिला के परिजनों को 90 लाख रुपये से ज्यादा में बेच दिया गया.
ऑपरेशन के बाद ‘गायब’ कर दिए जाते थे लोग
ऑपरेशन के बाद डोनर और रिसीवर दोनों को कुछ समय तक अस्पताल में रखा जाता था, लेकिन फिर उन्हें अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर दिया जाता था. इसका मकसद साफ था किसी भी तरह का सीधा लिंक न बन पाए. अगर जांच हो भी, तो एक ही जगह से पूरा नेटवर्क पकड़ में न आए. सूत्रों के मुताबिक, डोनर को दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी पहचान भी बदल दी गई. वहीं रिसीवर को किसी और जगह शिफ्ट कर दिया गया. इस पूरे रैकेट का खुलासा तब हुआ, जब डोनर को तय रकम से कम पैसे मिले. उसे बार-बार टाला गया, जिससे परेशान होकर उसने पुलिस का दरवाजा खटखटाया. यहीं से कहानी पलटी. पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच शुरू की. शुरुआती जांच में ही इतने संकेत मिले कि मामला बड़ा है, जिसके बाद कार्रवाई तेज कर दी गई.
छापेमारी और गिरफ्तारी
क्राइम ब्रांच ने देर रात कई अस्पतालों में एक साथ छापेमारी की. इसमें प्रिया हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर, आहूजा हॉस्पिटल और मेडलाइफ हॉस्पिटल शामिल थे. जांच के दौरान कई संदिग्ध दस्तावेज, मरीजों की जानकारी और अन्य सबूत जुटाए गए. अस्पताल संचालकों, डॉक्टर दंपति और दलाल शिवम को हिरासत में लिया गया. इसके अलावा, उस अस्पताल में भी पुलिस पहुंची जहां किडनी पाने वाली महिला को शिफ्ट किया गया था. वहां से भी कई लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया. जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क का जाल छात्रों तक फैला हुआ था. डोनर ‘आयुष’ ने खुद को MBA का छात्र बताया. सूत्रों के अनुसार, एक अन्य मामले में एक छात्रा से करीब 4 लाख रुपये में किडनी डोनेट करवाई गई और बाद में उसे 45 से 50 लाख रुपये में बेचने की आशंका जताई गई.
सिमर चावला